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अंजू बॉबी जॉर्ज का संघर्षपूर्ण जीवन | Anju Bobby George Life Story In Hindi

अंजू बॉबी जॉर्ज का संघर्षपूर्ण जीवन | Anju Bobby George Life Story In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-11 months ago
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अंजू बॉबी जॉर्ज का ओलम्पिक में मुश्किलों से भरा सफ़र | Anju Bobby George Life Story In Hindi

भारतीय खिलाड़ियों की दुनिया में आज अंजू बॉबी का आज स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। खेलकूद की दुनिया अंजू ने अपनी पहचान लम्बी छलांग में बनाई तथा विश्व स्तर पर अपना झंडा घाड़ दिया। आज अंजू बॉबी का जन्म केरल के कोट्टायम जिले के छोटे से गाँव चीरनचीरा में सन उन्नीस अप्रैल उन्नीस सत्तर को हुआ था। "अंजू मार्कोस " अंजू के बचपन का नाम  था और सेंट एनी गर्ल्स स्कूल चंग ताचेरी स्कूल में  इन्होने अपनी बचपन की पढ़ाई  की थी। तथा अंजू  ने अपनी बाल्यावस्था में ही एथेलेटिक्स स्पर्धाओं में भाग लेना शुरू कर दिया था के.टी. मार्कोस अंजू के पिता का नाम  था और उनकी माँ का नाम ग्रेसी था। अंजू के माता -पिता में बचपन से ही अपनी बच्ची को प्रेरित और प्रोत्साहित किया करते थे। फर्नीचर व्यापारी थे अंजू के पिता।

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अंजू मार्कोस के स्कूल ने लम्बी कूद ,थ्रो तथा दौडने के लिए अलग से कार्यक्रम बनाकर उसे अभ्यास का पर्याप्त मौका दिया। इसके बाद अंजू सीके केश्वरन स्मारक हाई स्कूल , कोरुथोडू चली गई। अंजू की कला को सर थॉमस ने चमकाया और तब अंजू ने स्कूल को लगा तारा 13वे साल ओवर आल ख़िताब दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान था। उसने लम्बी कूद ऊंची कूद 100 मीटर दौड़ और हैप्थलोन आदि सभी खेलो की।

पी.टी .उषा अंजू की आदर्श  थी। अंजू का विवाह रोबर्ट बॉबी जोर्ज से हुआें के नाम लम्बी कूद का विश्व रिकॉड है। और रोबर्ट बॉबी लम्बी कूद के लिए विश्व में प्रशिद्ध है। अंजू के घर और ससुराल में दोनों तरफ खेलों का माहौल था उनके नाम लम्बी कूद ट्रिपल जम्प में अपना करियर छोड़ दिया ताकि अपना पूरा समय अपनी पत्नी अंजू को दे सके अंजू के अनुसार वह आज जहां पर भी है वह अपने पति की वजह से है। विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में लम्बी कूद में कांस्य पदक जीतने  पर अंजू में कहा की देश का नाम रोशन करने पर में गर्व महसूस करती हूँ और मेरे दुवारा जीते हुए पदक को राष्ट्र समर्पित घोषित करती हूँ वास्तक में यह बहुत बड़ी बात है क्योकि दुनिया के 210 देशो ने भाग लिया था और पुरे 210 देशो के प्रतियोगियों को हराकर अंजू में य पदक जीता था। अंजू पहले भारतीय महिला थी जिस के द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।

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अंजू ने अपने पुरे खेल जीवन में बहुत ही विशिष्ट उपलब्धिया प्राप्त की है किस के कारण अंजू आज पुरे विश्व में प्रशिद्ध है। अंजू विश्व एथेलेटिक्स में सबसे पहले  जितने वाली महिला थी। अंजू ने सन 2003 में पेरिस में विश्व एथलेटिक चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता और भारत का नाम रोशन किया। वर्ष 1999 में अंजू ने दक्षिण कोरिया एथलेटिक्स चैपियनशिप में रजत पदक जीता। वर्ष 2001 में अंजू ने लम्बी कूद का रिकॉड बनाया। अंजू ने सबसे लम्बी छलांग लगाई अंजू की लगाई गई छलांग की लम्बाई 6.74 थी। अंजू को पूरी दुनिया में 13वी रेंकिग भी मिल चुकी है।

उन्होंने मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेलो में कांस्य पदक जीता था। इसके बाद अंजू ने सन 2002 में बुसान एशियाई खेलो में स्वर्ण पदक जीता। वर्ष 2004 में हुए एथेंस ओलम्पिक में अंजू को ध्वजवाहक का सामान प्राप्त हुआ  इन तमाम पदक को जितने के लिए अंजू को देश का खेल सम्मान "रसजीवा गाँधी खेल रत्न अवार्ड " दिया गया । वर्ष 2005 में हीरो हौंडा अकादमी” ने एथेलेटिक्स में अंजू को श्रेष्टतम  खिलाडी नाम दिया। दिसंबर 2006 में हुए दोहा एशियाई खेलो में उन्होंने रजत पदक प्राप्त किया ।

साल 1999 में एक बार उन्हें लगए की अब में नहीं खेल पाउगी और मेरी खेल का जीवन अब खत्म हो जायगा।परन्तु दक्षिण एशियाई  एथलेटिक्स चैंपियनशिप  में उन्होंने रजत पदक जीत लिया।परन्तु उनके टकुने में गहरा घाव लग गया था इस घाव के कारण सिडनी ओलम्पिक में भाग नहीं ले पाई और पुरे दो साल तक उन्हें खेल से दूर रहन पड़ा |

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वर्ष 2001 में अंजू पुन: उभरी और 6.74 मीटर लम्बी कूद का रिकॉड बनाय। और इसके बाद अंजू ने भारत के ट्रिपल जम्प के राष्ट्रिय चैंपियन रोबर्ट बॉबी जोर्ज की सहायता ली उस के बाद में रोबर्ट बॉबी जोर्ज के साथ दुनिया का जाने माने एथेलीट माइक पावेल से प्रशिक्षण लिया तथा एथेंस ओलम्पिक खेलो तक जारी किया और उनके खेल में सुधर आया।भारतीय ओलम्पिक संघ और सैमसंग इंडिया लिमिटेड ने मिकार एथेंस में होने वाले 2004 के ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ियों को प्रयोजित करने का निर्णय लिया ।

सैमसंग ने एक ओलम्पिक फंड शुरू किया जिसमे भारत के टॉप एथेलीटस को स्पोंसरशिप प्रदान की । टॉप एथेलीटस को स्पोंसरशिप ने पांच खिलाड़ियों के नाम लिए गए उन पांच खिलाड़ियों में अंजू का भी नाम था इस टॉप एथेलीटस में सभी खिलाड़ियों के लिए सभी प्रकार की ट्रेनिंग व्यवस्था की गई थी। इस  एथेलीटस से अंजू को अपनी ट्रेनिंग में काफी सहायता मिली।

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13 अगस्त 2004 को शुरू होने वाले एथेंस ओलम्पिक में भारतीय ध्वजवाहक का सम्मनाअंजू को दिया गया था और पहले ध्वजवाहक के लिए सबसे ऊपर नाम कर्नल मल्लेश्वरी का था। था इस के अलावा लिएंडर पेस, अंजलि भागव तथा धराज पिल्लै आदि का नाम सूची में था। लेकिन अंत में भारतीय टीम का नेतृत्व अंजू को दिया गया और भारतीय ध्वजवाहक सम्मान भी अंजू बॉबी जोर्ज को दिया गया। अंजू को ये सभी पदक अंजू के पति रोबर्ट जोर्ज व अंजू को द्रोणाचर्य पुरुस्कार से नवाजा गया।

यह पुरुस्कार अंजू और उन के पति को 21 सितम्बर 2004 को राष्ट्रियपति के दुवारा प्रदान कियेगे। उनको पुरुस्कार के अलावा पांच लाख रूपये भी दिए गया ।इस प्रकार अंजू में अपने खेल जीवन में कई कड़ी मुस्किलो का सामना करके तथा अपनी महंत से आज कई पदक प्राप्त कई लिए है और भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम स्पर्ण पनो में लिखा दिया। वे युवा खिलाडियों की प्रेरणा स्त्रोत एवं पथ प्रदर्शक का कार्य करती रहेगी |