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जालोर राजा वीरमदेव व फिरोजा की प्रेम कहानी | Viramdev Firoza Love Story In Hindi

By N.j / About :-11 months ago

जालोर राजा वीरमदेव व फिरोजा की प्रेम कहानी | Viramdev Firoza Love Story In Hindi

भारत के इतिहास में राजा-महाराजाओं के अमर प्रेम के बारे में जाने तो पृथ्वीराज चौहान व संयोगिता व जोधा अकबर का प्रेम इतिहास में हमेशा अमर है। अपने प्यार को पाने के लिए कैसे पृथ्वीराज चौहान ने भरी सभा से संयोगिता को ऊठा कर ले गए थें। अपने राज्यों के साथ तब राजाओं के इतिहास से उनकी प्रेम कहानियां भी उनसे जुड़ी। इसी के बीच आज हम भारतीय इतिहास की उस प्रेम कहानी का जिक्र करने वाले है जब एक हिंदू राजा के प्यार में मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी की बेटी फिरोजा खान को भारत के हिंदू राजा वीरमदेव से प्यार हो गया था। तो चलिए जानते है जालौर के शासक वीरमदेव व फिरोजा खान के प्रेम कहानी के बारें में।

1. वीरमदेव से खिलजी की बेटी फिरोजा का प्यार

खिलजी वंश का इतिहास हम सभी अवगत है 1290 से 1320 तक दिल्ली पर खिलजी वंश का शासन रहा था। इसी शासन काल के दौरान खिलजी शासक अलाउद्दीन खिलजी की बेटी फिरोजा को जालौर के शासक व वीर सपूत “ वीरमदेव ” प्रेम हो गया था। फिरोजा वीरमदेव से इस कदर चाहने लगी थी की वीरमेदव की मौत के बाद फिरोजा ने खुद को भी खत्म कर लिया था।

जालौर के वीर शासक व राजकुमार वीरमदेव चौहान वंश  थें उनके पिता कान्हड़ देव सोनगरा जो मेवाड़ के नजदीक है शासक थें। वीरमदेव में युद्ध की कला के वो सभी गुण बचपन से ही दिखने लगे थें । वीरमदेव कुश्ती की कला में सबसे आगे थें।

यही कारण है जब खिलजी की सेना सोमनाथ मंदिर को लूट कर वापस लोट रही थी। तब इस दौरान जालौर में वीरमदेव व खिलजी की सेना का आमना-सामना हुआ। वीरमदेव ने अपने सैन्य बल के साथ खिलजी सेना को युद्ध में परास्त कर दिया।

जालौर शासक वीरमदेव से हार के बाद बदले की भावना से अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनापति को समझोते के लिए जालौर वीरमदेव के दरबार में भेजा। खिलजी के इस प्रस्ताव को स्वीकारते हुए वीरमदेव दिल्ली खिलजी के दरबार गए। यह पहला मौका था जब वीरमदेव व अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री फिरोजा खान ने एक दुसरे को देखा। वीरमदेव की वीरता व उनकी सुंदरता को देख फिरोजा खान वीरमदेव से प्रेम कर बैठी , साथ ही फिरोजा ने पिता अलाउद्दीन खिलजी से अपने प्यार का जिक्र करते हुए कह दिया की

" अगर वो शादी करेंगी तो जालौर राजा वीरमदेव के साथ वरना जीवनभर कुंवारी ही अपना जीवन जीयेगी। "

फिरोजा की इस जीद्द के आगे अलाउद्दीन खिलजी ने अपने दूत को जालौर दरबार में फिरोजा का रिश्ता भेजा। लेकिन जब वीरमदेव ने खिलजी को यह कहकर वापस भेज दिया कि वो अपने धर्म व कुल के विपरीत जा कर किसी दुसरे धर्म में विवाह नही कर सकतें।

अलाउद्दीन खिलजी ने इस अपमान का बदला लेने के लिए जालौर पर हमला करने के लिए एक बड़ी सेना जालौर की और भेज दी। जालौर में खिलजी की सेना व वीरमदेव की सेना के बीच विनाशकारी युद्ध हुआ पूरे युद्ध में वीरमदेव वीरता के साथ लड़े और अंतिम सांस तक जालौर किले में प्रवेश नही करने दिया , लेकिन अंत में वीरमदेव लड़ते - लड़ते वीरगती को प्राप्त हो गए। इस युद्ध के समय वीरमदेव महज 22 साल के थें।

युद्ध समाप्ति के बाद खिलजी वीरमदेव का सिर काट कर दिल्ली ले गए और फिरोजा के सामने पेश किया कहा जाता है कि “ जब वीरमदेव का सिर फिरोजा के सामने पेश किया तब वीरमदेव का सिर घूम गया था।

फिरोजा वीरमदेव की मौत की खबर सुन काफी दुखी हुई उन्होंने बाद में वीरमदेव के सिर का अंतिम संस्कार किया और बाद में नदी में कूद कर अपनी जान दे दी । इस तरह एक सच्चें प्रेम का अंत हुआ।

जालोर राजा वीरमदेव व फिरोजा की प्रेम कहानी | Viramdev Firoza Love Story In Hindi