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भगवान श्री राम की बहन सांता का जीवन सच | Bhagwan Ram Sister Shanta In Hindi

By N.j / About :-2 years ago

वचनों के कारण राजा दशरथ ने दी थी पुत्री शांता की कुर्बानी | Ram Sister Shanta

दोस्तों बचपन से लेकर आज तक हम लोग रामायण की कहानी सुनते और पढ़ते आये है। रामायण में हमने श्री राम और उनके भाइयों का प्रेम देखा है एवं श्री राम ने अपने पिता के वचनों का मान रखते हुए 14 साल का वनवास पूर्ण किया था। लेकिन ये सब तो हमने देखा और पढ़ा भी है लेकिन दोस्तों रामायण में हमने श्री राम की बहन सांता को ना तो रामानंद सागर द्वारा निर्मित रामायण में देखा और ना ही उनके बारे में कभी सुना। लेकिन दोस्तों आज हम आपको भगवान श्री राम की बहन सांता के बारे में बातयेंगे लेकिन दोस्तों आप सोच रहे होंगे की जब श्री राम की बहन थी तो इनका रामायण में कहीं उल्लेख क्यों नहीं है तो चलिए दोस्तों इसकी पूर्ण सच्चाई जानते है. 


भगवान राम के पिता महाराज दशरथ अयोध्या के राजा थे । महाराज दशरथ के तीन पत्नियां थी कौशल्या,केकई,  और सुमित्रा. राजा दशरथ के चार पुत्र थे जिसमे सबसे बड़े भगवान राम , भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न  इन सब के बारे में हमने रामायण में देखा लेकिन ये बात कम ही लोग जानते है की राजा दशरथ के इन चार पुत्रो के अलावा भी एक इनकी बड़ी बहन सांता थी । सांता की माँ रानी कौशल्या थी। सांता बचपन से एक सुंदर और हर क्षेत्र में निपूर्ण थी। यही कारण है की सांता को युद्ध कला, साहित्य एवं  पाक कला का बोध था। सांता ने अपने युद्ध कौशल से हमेशा राजा दशरथ का मन जीता और अपने पिता को गौरवान्वित किया

एक बार रानी कौशल्या की बहन वर्षिणी और उनके पति अंग देश के राजा रोमपद अयोध्या आते है । रानी कौशल्या की बहन के कोई संतान नहीं थी। जब सभी लोग अयोध्या के दरबार में बैठ कर एक दूसरे से बातें कर रहे थे तब  वर्षिणी की नजर कौशल्या की पुत्री सांता पर पड़ी। वर्षिणी सांता की कुशलता व शालीनता को देख कर काफी प्रसन्न हुई और कहने लगी यदि भगवान मेरी गोद में कभी बच्चा दे तो वो सांता जैसी शालीन  और सुशील हो. उसी समय राजा दशरथ भी दरबार में मौजूद थे उन्होंने वर्षिणी  की बात सुनते ही उनको सांता को गोद देने का वचन दे दिया। एक दोहे के अनुसार  "रघुकुल की रित प्राण जाई पर वचन न जाई " अपने वचनो को निभाया और अपनी पुत्री सांता को अंग के राजा रोमपद एवं रानी वर्षिणी को गोद दे दिया.

राजा रोमपद के संतान नहीं होने के कारण सांता अंग राज्य की राजकुमारी बन गई। एक बार दरबार में राजा रोमपद और अपनी गोद ली हुई पुत्री के साथ अपने विचार विमर्श कर रहे थे तभी अचानक उनके दरबार में एक गरीब ब्राह्मण अपनी याचना ले कर आया लेकिन दूसरी और राजा रोमपद अपनी पुत्री के साथ वार्ता में इतने व्यस्त थे की उन्होंने  दरबार में आये ब्राह्मण की याचना पर ध्यान ही नहीं दिया। ब्राह्मण को बिना कोई बात किये दरबार से जाना पड़ा ये बात देवताओं के राजा इंद्र को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने वरुण देवता को ये आदेश दिया की अब अंगदेश में कभी बारिश नहीं होनी चाहिए। वरुण देवता ने आज्ञा का पालन करते हुए अंगदेश में बारिश की एक बून्द भी नहीं गिरने दी अंगदेश में बारिश ना होने से पुरे राज्य में हाहाकार मच गया और अंगदेश की पूरी प्रजा भूख और प्यास से मरने लगी । अपने राज्य में ये हालात देख राजा रोमपद काफी घबरा गए और इस समस्या से निजात पाने के लिए रोमपद ऋषि शृंग के पास गए और उनको वर्षा की समस्या के बारे में बताया ऋषि शृंग उनको राज्य में यज्ञ करने के बारे में कहते है। ऋषि शृंग आदेशानुसार वो राज्य में यज्ञ करवाते है। यज्ञ संपन्न होने के बाद इंद्रदेव इससे काफी प्रसन्न होते है और अंग राज्य में वर्षा करते है। वर्षा होने के बाद पुरे अंग राज्य में सूखा ख़त्म हो गया और ऋषि श्रृंग के इस यज्ञ से खुश हो कर राजा रोमपद अपनी पुत्री सांता का विवाह ऋषि श्रृंग के साथ कर देते है.

अपने वचनो के अनुसार राजा दशरथ ने अपनी पुत्री सांता को अंग राजा रोमपद को दे तो दिया था लेकिन सांता के बाद उनके कोई संतान नहीं थी और  वो इस बात से काफी परेशान होने लगे और एक दिन वो  ऋषि श्रृंग के पास जाते है और अपने दरबार में पुत्र कामाक्षी यज्ञ करने के लिए बोलते है । तब ऋषि श्रृंग राजा दशरथ के साथ अयोध्या जाते है और अयोध्या की पूर्व दिशा की और एक जगह पर राजा दशरथ के लिए पुत्र कमिक्षी यज्ञ करते है(दोस्तों ऋषि श्रृंग ने यह यज्ञ अपने आश्रम में किया था और आज भी इनकी मुर्तिया यहां स्थापित है ) इस यज्ञ  के संम्पन होने के बाद प्रसाद के रूप में खीर रानी कौशल्या को दी जाती है। तीनो रानियाँ इस प्रसाद को ग्रहण करती और फलस्वरूप सबसे छोटी रानी सुमित्रा के दो पुत्र जन्म लेते  है - लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न और रानी कौशल्या की कोख से ज्येष्ठ पुत्र राम का जन्म होता है एवं रानी केकई को भरत की प्राप्ति होती है.

राजा दशरथ के पुत्री सांता के त्याग के बाद इस तरह चार पुत्र हुए थे। लेकिन पुत्री त्याग के कारण राजा दशरथ और रानी कौशल्या के बीच मतभेद काफी बढ़ जाते है। सांता के बारे में अयोध्या के चारो राजकुमारों को बिलकुल ध्यान नहीं था लेकिन समय के साथ श्री राम ने अपनी माता कौशल्या के इस दुख के बारे में पूछते है तब श्री राम को अपनी बड़ी बहन सांता के बारे में पता लगता है उसी समय श्री राम अपनी माँ कौशल्या को अपनी बहन सांता से मिलवाते है और उसी दिन से राजा दशरथ और रानी कौशल्या के बीच मतभेद खत्म हो जाते है।

वाल्मीकि रामायण में राजा दशरथ की पुत्री  सांता का उल्लेख तो नहीं मिलता है लेकिन  दक्षिण के पुराणों सांता का वर्णन मिलता है। 

आज भारत देश के कुल्लू में श्रृंग ऋषि का मंदिर है यहां से 60 किलोमीटर की दुरी पर ही सांता का मंदिर बना हुआ है। ऐसा कहा जाता है की अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए अपनी पुत्री सांता का त्याग किया था। वैसे सांता पूर्ण रूप से युद्ध में कुशल थी लेकिन वो कुल को आगे नहीं बढ़ा सकती थी । इसी कारण राजा दशरथ को सांता का त्याग करना पड़ा. जब राजा दशरथ  के चारो पुत्र अपनी बहन से मिलते है तब सांता अपने त्याग के लिए उसका फल मांगती है और सदैव चारो भाइयों को साथ रहने का वचन देती है। चारो भाई अपनी बहन के इस वचन का मान रखते और जीवन भर चारो एक दूसरे की परछाई बन कर साथ रहते है।

भगवान श्री राम की बहन सांता का जीवन सच | Bhagwan Ram Sister Shanta In Hindi