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खजुराहो मंदिर का रोचक इतिहास | All about Khajuraho Temple History in Hindi

खजुराहो मंदिर का रोचक इतिहास | All about Khajuraho Temple History in Hindi

In : Viral Stories By storytimes About :-1 year ago
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खजुराहो मंदिर का रोचक इतिहास | All About Khajuraho Temple History in Hindi

खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर में स्थित है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। यह भारत के मध्य प्रदेश में  छतरपुर जिले में स्थित है। खजुराहो को प्राचीन काल(Ancient times) इसे खजूरपुरा और खजूर वाहिका दोनों नाम से भी जाना जाता था। यहां बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू और जैन मंदिर हैं। मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। भारत के अलावा दुनिया भर के पर्यटक (Tourist) के इस अतिप्रिय सौंदर्य के प्रतीक को देखने के लिए निरंतर आते रहते है। हिन्दू कला और संस्कृति को शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल(Medieval) उत्कीर्ण किया था। संभोग की विभिन्न कलाओं को इन मंदिरों में बेहद खूबसूरती के उभारा गया है।

खजुराहो का इतिहास

खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। यह शहर चन्देल साम्राज्‍य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश और खजुराहो के संस्थापक चन्द्रवर्मन थे। चन्द्रवर्मन मध्यकाल में बुंदेलखंड में शासन करने वाले गुर्जर राजा थे। वे अपने आप का चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। मंदिरों के निर्माण के बाद चन्देलो ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित कर दी। लेकिन इसके बाद भी खजुराहो का महत्व बना रहा।

मध्यकाल के दरबारी कवि चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो के महोबा खंड में चन्देल की उत्पत्ति का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि काशी के राजपंडित की पुत्री हेमवती अपूर्व सौंदर्य की स्वामिनी थी। एक दिन वह गर्मियों की रात में कमल-पुष्पों से भरे हुए तालाब में स्नान कर रही थी। उसकी सुंदरता देखकर भगवान चन्द्र उन पर मोहित हो गए। उन्होंने मानव रूप ले कर  धरती पर आ गए और हेमवती का हरण कर लिया। दुर्भाग्य(misfortune) हेमवती विधवा थी। वह एक बच्चे की मां थी। उन्होंने चन्द्रदेव पर अपना जीवन नष्ट करने और चरित्र(Character) हनन  का आरोप लगाया।

Khajuraho Temple History

Via: Nativeplanet.com

अपनी गलती के पश्चाताप के लिए चन्द्र देव ने हेमवती को वचन दिया कि वह एक वीर पुत्र की मां बनेगी। चन्द्रदेव ने कहा कि वह अपने पुत्र को खजूरपुरा ले जाए। उन्होंने कहा कि वह एक महान राजा(King) बनेगा  राजा बनने पर वह बाग और झीलों से घिरे हुए अनेक मंदिरों का निर्माण करवाएगा। चन्द्रदेव ने हेमवती से कहा कि राजा बनने पर तुम्हारा पुत्र एक विशाल यज्ञ का आयोजन करगा जिससे तुम्हारे सारे पाप धुल जाएंगे। चन्द्र के निर्देशों का पालन कर हेमवती ने पुत्र को जन्म देने के लिए  अपने घर से दूर जा कर  एक छोटे-से गांव में पुत्र को जन्म दिया।

हेमवती का पुत्र चन्द्रवर्मन अपने पिता के समान तेजस्वी, बहादुर और शक्तिशाली था। सोलह साल की उम्र में वह बिना हथियार के शेर या बाघ को मार सकता था। पुत्र की असाधारण वीरता को देखकर हेमवती ने चन्द्रदेव की आराधना की जिन्होंने चन्द्रवर्मन को पारस पत्थर भेंट किया और उसे खजुराहो का राजा बनाया। पारस पत्थर से लोहे को सोने में बदला जा सकता था।

चन्द्रवर्मन ने लगातार कई युद्धों में शानदार विजय प्राप्त की। उसने कालिंजर का विशाल किला बनवाया। मां के कहने पर चन्द्रवर्मन ने तालाबों और उद्यानों से आच्छादित खजुराहो में 85 अद्वितीय मंदिरों का निर्माण करवाया और एक यज्ञ का आयोजन किया जिसने हेमवती को पापमुक्त कर दिया। चन्द्रवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों ने खजुराहो में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया।

 

दर्शनीय स्थल-

1. लक्ष्मी मंदिर- लक्ष्मी मंदिर, लक्ष्मण मंदिर के सामने बना है|

Khajuraho Temple History in Hindi

 

2. वराह मंदिर

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3. लक्ष्मण मंदिर, खजुराहो

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4. कंदरिया महादेव मंदिर

कंदरिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में विशालतम है। यह अपनी भव्यता(Grandiosity)र संगीतमयता के कारण प्रसिद्ध है। इस विशाल मंदिर का निर्माण महान चन्देल राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में किया था। लगभग 1050 ईसवीं में इस मंदिर को बनवाया गया। यह एक शैव मंदिर है। तांत्रिक समुदाय को प्रसन्न करने के लिए इसका निर्माण किया गया था। कंदरिया महादेव मंदिर लगभग 107 फुट ऊंचा है। मकर तोरण इसकी मुख्य(Main)शेषता है। मंदिर के संगमरमरी लिंगम में अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार यहां सर्वाधिक मिथुनों की आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियां और भीतर 246 आकृतियों की गणना की थीं।

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5.  सिन्ह मंदिर

यह मंदिर कंदरिया महादेव मंदिर और देवी जगदम्बा मंदिर के बीच बना है |

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6. देवी जगदम्बा मंदिर

कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के उत्तर में जगदम्बा देवी का मंदिर है। जगदम्बा देवी का मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था और इसका निर्माण 1000 से 1025 ईसवीं के बीच किया गया था। सैकड़ों वर्षों पश्चात यहां छतरपुर के महाराजा ने देवी पार्वती की प्रतिमा(statue)पित करवाई थी इसी कारण इसे देवी जगदम्बा मंदिर कहते हैं। यहां पर उत्कीर्ण मैथुन मूर्तियों में भावों की गहरी संवेदनशीलता शिल्प की विशेषता है। यह मंदिर शार्दूलों के काल्पनिक चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। शार्दूल वह पौराणिक पशु था जिसका शरीर शेर का और सिर तोते, हाथी या वराह(Barah) होता था।

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7. सूर्य (चित्रगुप्त) मंदिर

खजुराहो में एकमात्र सूर्य मंदिर है जिसका नाम चित्रगुप्त है। चित्रगुप्त मंदिर एक ही चबूतरे पर स्थित चौथा मंदिर है। इसका निर्माण भी विद्याधर के काल में हुआ था। इसमें भगवान सूर्य की सात फुट ऊंची प्रतिमा कवच(Armor)रण किए हुए स्थित है। इसमें भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। मंदिर की अन्य विशेषता यह है कि इसमें एक मूर्तिकार(Sculptor) काम करते हुए कुर्सी पर बैठा दिखाया गया है। इसके अलावा एक ग्यारह सिर वाली विष्णु की मूर्ति दक्षिण की दीवार पर स्थापित है।

बगीचे के रास्ते में पूर्व(East) ओर पार्वती मंदिर स्थित है। यह एक छोटा-सा मंदिर है जो विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर को छतरपुर के महाराजा प्रताप सिंह द्वारा 1843-1847 ईसवीं के बीच बनवाया गया था। इसमें पार्वती की आकृति को गोह पर चढ़ा हुआ दिखाया गया है। पार्वती मंदिर के दायीं तरफ विश्वनाथ मंदिर है जो खजुराहो का विशालतम मंदिर है। यह मंदिर शंकर भगवान से संबंधित है। यह मंदिर राजा धंग द्वारा 999 ईसवीं(A.D.) बनवाया गया था। चिट्ठियां लिखती अपसराएं, संगीत का कार्यक्रम और एक लिंगम को इस मंदिर में दर्शाया गया है।

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8. विश्वनाथ मन्दिर

शिव मंदिरों में अत्यंत महत्वपूर्ण विश्वनाम मंदिर का निर्माण काल सन् 1002-1003ई. है। पश्चिम समूह की जगती पर स्थित यह मंदिर अति सुंदरों में से एक है। इस मंदिर का नामाकरण शिव के एक और नाम विश्वनाथ पर किया गया है। मंदिर की लंबाई89और चौड़ाई 45' है। पंचायतन शैली का संधार प्रासाद यह शिव भगवान को समर्पित है। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ- साथ गर्भगृह के केंद्र में नंदी पर आरोहित शिव प्रतिमा स्थापित की गयी है।

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9. नन्दी मंदिर

नन्दी मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के सामने बना है

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10. पार्वती मंदिर

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पूर्वी समूह-

पूर्वी समूह के मंदिरों को दो विषम समूहों(Groups) बांटा गया है। जिनकी उपस्थिति आज के गांधी चौक से आरंभ हो जाती है। इस श्रेणी के प्रथम चार मंदिरों का समूह प्राचीन(Ancient)जुराहो गांव के नजदीक है। दूसरे समूह में जैन मंदिर हैं जो गांव के स्कूल के पीछे स्थित हैं। पुराने गांव के दूसरे छोर पर स्थित घंटाई मंदिर को देखने के साथ यहां के मंदिरों का भ्रमण शुरू किया जा सकता है। नजदीक ही वामन और जायरी मंदिर भी दर्शनीय स्थल हैं। 1050 से 1075 ईसवीं के बीच वामन मंदिर का निर्माण किया गया था। विष्णु के अवतारों में इसकी गणना की जाती है। नजदीक ही जायरी मंदिर हैं जिनका निमार्ण 1075-1100 ईसवीं के बीच माना जाता है। यह मंदिर भी विष्णु भगवान को समर्पित(Dedicated)। इन दोनों मंदिरों के नजदीक ब्रह्मा मंदिर हैं जिसकी स्‍थापना 925 ईसवीं में हुई थी। इस मंदिर में एक चार मुंह वाला लिंगम है। ब्रह्मा मंदिर(Temple) संबंध ब्रह्मा से न होकर शिव से है।

1. वामन मंदिर

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2. जावरी मंदिर

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3. जैन मंदिर

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दक्षिणी समूह-

इस भाग में दो मंदिर हैं। एक भगवान शिव से संबंधित दुलादेव मंदिर है और दूसरा विष्णु से संबंधित है जिसे चतुर्भुज मंदिर कहा जाता है। दुलादेव मंदिर खुद्दर नदी के किनारे स्थित है। इसे 1130 ईसवी में मदनवर्मन द्वारा बनवाया गया था। इस मंदिर में खंडों पर मुंद्रित दृढ़ आकृतियां हैं। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण 1100 ईसवीं में किया गया था। इसके गर्भ में 9 फुट ऊंची विष्णु की प्रतिमा(statue) संत के वेश में दिखाया गया है। इस समूह के मंदिर को देखने लिए दोपहर का समय उत्तम माना जाता है। दोपहर में पड़ने वाली सूर्य की रोशनी इसकी मूर्तियों(Statues) आकर्षक बनाती है।

1. चतुर्भुज मंदिर

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यह मंदिर जटकारा ग्राम से लगभग आधा किलोमीटर दक्षिण(South) स्थित है। यह विष्णु मंदिर निरधार प्रकार का है। इसमें अर्धमंडप, मंडप, संकीर्ण अंतराल के साथ- साथ गर्भगृह है। इस मंदिर की योजना सप्ररथ है। इस मंदिर का निर्माणकाल (Construction) जवारी तथा दुलादेव मंदिर के निर्माणकाल के मध्य माना जाता है। बलुवे पत्थर से निर्मित खजुराहो का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें मिथुन प्रतिमाओं(Statues) सर्वथा अभाव दिखाई देता है। सामान्य रूप से इस मंदिर की शिल्प- कला अवनति का संकेत करती है। मूर्तियों के आभूषण के रेखाकन मात्र हुआ है और इनका सूक्ष्म(Subtle)कन अपूर्ण छोड़ दिया है। यहाँ की पशु की प्रतिमाएँ(Statues)वं आकृतियाँ अपरिष्कृत तथा अरुचिकर है। अप्सराओं सहित अन्य शिल्प विधान रुढिगत हैं, जिसमें सजीवता और भावाभिव्यक्ति का अभाव माना जाता है। फिर भी, विद्याधरों का अंकन आकर्षक(Attractive)र मन को लुभाने वाली मुद्राओं में किया गया है। इस तरह यह मंदिर अपने शिल्प, सौंदर्य तथा शैलीगत विशेषताओं के आधार पर सबसे बाद में निर्मित(made)लादेव के निकट बना हुआ माना जाता है।

2. दुल्हादेव मंदिर

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खजुराहो के प्रमुख संग्रहालय-

खजुराहो के विशाल मंदिरों को टेड़ी गर्दन से देखने के बाद तीन संग्रहालयों को देखा जा सकता है। वेस्टर्न ग्रुप के विपरीत स्थित भारतीय पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में मूर्तियों को अपनी आंख के स्तर पर देखा जा सकता है। पुरातत्व विभाग के इस संग्रहालय को चार विशाल गृहों में विभाजित किया गया है जिनमें शैव, वैष्णव, जैन और 100 से अधिक विभिन्न आकारों की मूर्तियां हैं। संग्रहालय में विशाल मूर्तियों के समूह को काम करते हुए दिखाया गया है। इसमें विष्णु की प्रतिमा को मुंह पर अंगुली रखे चुप रहने के भाव के साथ दिखाया गया है। संग्रहालय(museum) चार पैरों वाले शिव की भी एक सुन्दर मूर्ति है।

जैन संग्रहालय में लगभग 100 जैन मूर्तियां(Sculptures) है  जबकि ट्राईबल और फॉक के राज्य संग्रहालय में जनजाति समूहों द्वारा निर्मित पक्की मिट्टी की कलाकृतियां, धातु शिल्प, लकड़ी शिल्प, पेंटिंग, आभूषण, मुखौटों और टेटुओं को दर्शाया गया है।

भारतीय पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में प्रवेश शुल्क 5 रूपये रखा गया है। Western group के  टिकट के साथ इस संग्रहालय में मुफ्त प्रवेश किया जा सकता है। सुबह दस से शाम साढे चार बजे तक यह संग्रहालय खुला रहता है। शुक्रवार को यह संग्रहालय बन्द रहता है। शुल्‍क: जैन संग्रहालय सुबह सात बजे से शाम छ: बजे तक खुला रहता है और इसमें कोई प्रवेश(enter)शुल्क नहीं लिया जाता।

राज्य संग्रहालय( museum) शुल्क के रूप में 20 रूपये लिए जाते हैं। यह दोपहर बारह बजे से शाम आठ बजे तक खुला रहता है। सोमवार और सार्वजनिक अवकाश वाले दिन यह बन्द रहता है।

भ्रमण के लिहाज से काफी ये प्रसिद्ध स्थल-

कालिंजर और अजयगढ़ का दुर्ग-

मैदानी इलाकों से थोड़ा आगे बढ़कर विन्ध्य (Vindhy) पहाड़ी हिस्सों में अजयगढ़ और कालिंजर के किले हैं। इन किलों का संबंध चन्देल वंश के उत्थान और पतन से है। 105 किलोमीटर दूर स्थित कालिंजर का किला है। यह एक प्राचीन(Ancient) काल है। प्राचीन काल में यह शिव भक्तों की कुटी थी। इसे महाभारत और पुराणों के पवित्र स्थलों की सूची में शामिल किया गया था। इस किले का नामकरण(Naming) शिव के विनाशकारी रूप काल से हुआ जो सभी चीजों का जर अर्थात पतन करते हैं। काल और जर को मिलाकर कालिंजर बना। इतिहासकारों का मत है कि यह किला ईसा पूर्व(A.D )है। महमूद गजनवी के हमले के बाद इतिहासकारों का ध्‍यान इस किले की ओर गया। 108 फुट ऊंचे इस किले में प्रवेश के लिए अलग-अलग शैलियों के सात दरवाजों (doors) पार करना पड़ता है। इसके भीतर आश्चर्यचकित कर देने वाली पत्थर की गुफाएं हैं। चोटी पर भारत के History  की याद दिलाती हिन्दू और मुस्लिम शैली की इमारतें हैं। कहा जाता है कि कालिंजर के भूमितल से पतालगंगा नामक नदी बहती है जो इसकी गुफाओं को जीवंत बनाती है। बहुत से बेशकीमती(Priceless) पत्थर यहां बिखर पड़े हैं।

खजुराहो से 80 किलोमीटर दूर अजयगढ़ का दुर्ग है। यह दुर्ग (fort) शासन के अर्द्धकाल में बहुत महत्वपूर्ण था। विन्ध्य की पहाड़ियों की चोटी पर यह किला स्थित है। किले में दो प्रवेश द्वार हैं। किले के उत्तर में एक दरवाजा और दक्षिण-पूर्व में तरहौनी द्वार है। दरवाजों तक पहुंचने के लिए चट्टान पर 45 मिनट की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। किले के बीचों बीच अजय पलका तालाव नामक झील है। झील के अन्त में जैन मंदिरों के अवशेष बिखर पड़े हैं। झील के किनारे कुछ प्राचीन काल के स्थापित मंदिरों को भी देखा जा सकता है। किले की प्रमुख विशेषता(Specialty) ऐसे  तीन मंदिर हैं जिन्हें अंकगणितीय विधि से सजाया गया है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने कुछ समय पहले इस किले की देखभाल का जिम्मा उठाया है।