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महाराजा रणजीत सिंह का जीवन एवं इतिहास | All About Maharaja Ranjit Singh in Hindi

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महाराजा रणजीत सिंह का जीवन एवं इतिहास | All About Maharaja Ranjit Singh in Hindi
रणजीत सिंह का जन्म सन 1780 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) जाट सिक्ख महाराजा महां सिंह के घर हुआ था l
एक मुसलमान खुशनवीस ने अनेक सालों की साधना(Practice) और श्रम से कुरान शरीफ की एक बहुत सुन्दर प्रतिलिपि सोने और चाँदी से बनी स्याही से तैयार की. उस प्रतिलिपि(copy) को लेकर वह पंजाब और सिंध के अनेक नवाबो के पास गया. सभी ने उसके काम और कला की तारीफ की लेकिन कोई भी उस प्रतिलिपि(Copy) को खरीदने के लिए तैयार न हुआ. खुशनवीस उस प्रतिलिपि का जो भी राशि(amount) मांगता था l वह सभी को अपनी क्षमता से अधिक लगता था.
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दुखी होकर खुशनवीस लाहौर आया और महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति से मिलाl सेनापति ने उसके काम की बड़ी तारीफ की लेकिन इतनी ज्यादा राशि देने में उसने खुद को अयोग्य पाया. महाराजा रणजीत सिंह ने भी यह बात सुनी और उस खुशनवीस को अपने पास बुलवायाl खुशनवीस ने कुरान शरीफ की वह प्रतिलिपि(copy) महाराज को दिखाई.
महाराजा रणजीत सिंह ने बड़े सम्मान से उसे उठाकर अपने सिर में लगाया और वजीर को हुक्म दिया- ” खुशनवीस को उतनी राशि दे दी जाय, जितना वह चाहता है और कुरान शरीफ की इस प्रतिलिपि को मेरे कोष(Treasury) में रख दिया जाय ”.
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महाराज के इस काम से सभी को ताज्जुब हुआ. फ़क़ीर अजीजुद्दीन ने पूछा- हुजूर, आपने इस प्रतिलिपि के लिए बहुत बड़ी कीमत दी हैl लेकिन वह तो आपके किसी कार्य की नहीं है क्योंकि आप सिख है और यह मुसलमानों की धर्मपुस्तक है.
महाराज ने इसका उत्तर दिया- फ़क़ीर साहब, ईश्वर(god) की यह इच्छा है की मैं सभी धर्मो को एक नजर से देखूँ.
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1798 ईसा. में लाहौर का राज्यपाल पद और राजा की किताब मिलने के बाद उनके कर्तुत्व सच्चा मान मिला। उन्होंने खुद के दम पर अमृतसर शहर जीता और सतलज नदी तक का प्रदेश काबु में किया।
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रणजीतसिंह ने अंग्रेजो की शक्ति को समय रहते ही पहचान लिया था। उन्हें हराने के लिये रणजीतसिंह ने अच्छे दर्जे की सेनाये तैयार कि। खुद की तोफों की फॅक्ट्री निकाली। उनके सैनिकों में सिख, मुस्लिम, गुरखे, पठान, बिहारी, डोगरा ये शामिल थे l आशिया के कुछ(some) ही परन्तु उत्तम सैनिकों में उनके सैनिकों का समावेश होता था l
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रणजीतसिंह का राज्यप्रशासन बहुत अच्छा थाl सिर्फ सिखों(Sikh) का ही कल्याण ऐसा उनका लक्ष कभी भी नहीं थाl कर में से 50 % उत्पादन(production) का हिस्सा जमा करके राज्य पर खर्चा किया जाता था।
1809 को ब्रिटिशो से हुये अमृतसर तह के अनुसार सतलज के पश्चिम(West) के तरफ का क्षेत्र रणजीतसिंह के राज के निचे आया। अफगान(Afghan) राजा शाह्शुजा उन्होंने कि हुई मदत के बदले में दुनिया का प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा फिर से भारत में आयाl अंग्रेजो से उन्होंने व्यापारी(Businessman) करार किया था। रणजीतसिंह जब तक है तब तक ये प्रदेश उनके काबु में नहीं आयेंगा ये सच्चाई अंग्रेजो ने पहचान ली थी।
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1839 को रणजीतसिंह की मौत(death) होने के बाद उनके सरदारों में सत्ता के लिये मुकाबला(competition) हुआ। अंग्रेजो ने इसका फायदा उठाया और पंजाब के सिंह का राज्य खत्म हुआ।
धार्मिक सद्भाव
पंजाब के लोक जीवन और लोक कथाओं में महाराजा रणजीत सिंह से सम्बन्धित अनेक कथाएं कही व सुनी जाती हैं। इसमें से अधिकांश कहानियाँ उनकी उदारता, न्यायप्रियता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान को लेकर प्रचलित हैं। उन्हें अपने जीवन में प्रजा का भरपूर प्यार मिला। अपने जीवन काल(Life span) में ही वे अनेक लोक गाथाओं और जनश्रुतियों का केंद्र बन गये थे।
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कश्मीर और कोहिनूर
बात सन् 1812 की है। पंजाब पर महाराजा रणजीत सिंह का एक छत्र राज्य था। उस समय महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर के सूबेदार अतामोहम्मद के शिकंजे से कश्मीर को मुक्त कराने का अभियान शुरू किया था। इस अभियान से भयभीत(Frightened) होकर अतामोहम्मद कश्मीर छोड़कर भाग गया। कश्मीर अभियान के पीछे एक अन्य कारण भी था। अतामोहम्मद ने महमूद शाह द्वारा पराजित शाहशुजा को शेरगढ़ के किले(fort) में कैद कर रखा था।
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उसे कैदखाने से मुक्त कराने के लिए उसकी बेगम वफा बेगम ने लाहौर(Lahore) आकर महाराजा रणजीत सिंह से प्रार्थना की और कहा कि मेहरबानी कर आप मेरे पति को अतामोहम्मद की कैद से रिहा करवा दें, इस अहसान के बदले बेशकीमती कोहिनूर हीरा आपको भेंट कर दूंगी। शाहशुजा के कैद हो जाने के बाद वफा बेगम ही उन दिनों अफगानिस्तान की शासिका थी। इसी कोहिनूर को हड़पने के लालच में भारत पर आक्रमण करने वाले अहमद शाह अब्दाली के पौत्र जमान शाह को स्वयं उसी के भाई महमूद शाह ने कैदखाने(prison) में भयंकर यातनाएं देकर उसकी आंखें निकलवा ली थीं।
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जमान शाह अहमद शाह अब्दाली के बेटे तैमूर शाह का बेटा था, जिसका भाई था महमूद शाह। अतः महाराजा रणजीति सिंह स्वयं चाहते थे कि वे कश्मीर को अतामोहम्मद से मुक्त करवाएं। अत: अवसर आने पर महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर(Kashmir) को आजाद करा लिया। उनके दीवान मोहकमचंद ने शेरगढ़ के किले को घेर कर वफा बेगम के पति शाहशुजा को रिहा कर वफा बेगम के पास लाहौर(Lahore) पहुंचा दिया।
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