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15 रूपये की नौकरी कर बन गए 1600 करोड़ की कंपनी के मालिक | Sudip Dutta Success Story In Hindi

15 रूपये की नौकरी कर बन गए 1600 करोड़ की कंपनी के मालिक | Sudip Dutta Success Story In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-4 months ago
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"हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी"

दोस्तों जीवन में जब जिंदगी अपने इम्तिहान लेना शुरू करती तब व्यक्ति का असली रूप सामने आता है की वो इस इम्तिहान का किस तरह सामना करता है कई लोग इस स्थिति में खुद को संभाल नहीं पाते तो कुछ लोग इस दौरान कुछ ऐसा कर गुजरते है की वो पूरी दुनिया के लिए मिशाल बन जाते है दोस्तों ऐसी ही एक शख्सियत है Ess Dee Aluminium LTD कंपनी के फाउंडर सुदीप दत्ता जो एक समय इस कंपनी में मजदूरी का कार्य करते थे और रोज के 15 रूपये से यहां काम करते थे दोस्तों रोज 15 रूपये मजदूरी से काम करने वाले सुदीप दत्ता आज 1600 करोड़  की कंपनी के मालिक है दोस्तों आज हम सुदीप दत्ता की इस सक्सेस के बारे में जानने वाले की कैसे उन्होंने अपने हार्ड वर्क से इस मुश्किल कार्य को आसान बना दिया तो चलिए दोस्तों इसकी शुरुआत करते है.

साल 1972 में पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर के छोटे से गांव में सुदीप दत्ता का जन्म हुआ था उनके पिता इंडियन आर्मी में थे लेकिन सुदीप दत्ता के जीवन में मुश्किलों का दौर बचपन में ही शुरू हो गया था जब साल 1971 में इंडो पाक युद्ध छिड़ा तब उनके पिता को गोली लग गई और उन्हें लकवा हो गया तब उनके परिवार पर संकटो का बोझ आ गया  पूरा घर अब उनके बड़े भाई पर निर्भर हो गया था और अब वही घर का अब एकमात्र साहरा थे लेकिन उनके परिवार के पीछे समस्या लगी ही रही थोड़े दिन बाद उनके बड़े भाई का भी स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और वे बीमार हो गए घर में उनकी बीमारी का इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होने के कारण उनके भाई की भी मौत हो गई अपने बड़े बेटे की मौत का सदमा सुदीप के पिता भी ज्यादा दिन नहीं सह पाते और उनकी भी मौत हो जाती है घर में इन परिस्थितियों के चलते महज 17 साल की छोटी सी उम्र में पुरे घर का बोझ सुदीप दत्ता के कंधो पर आ जाता है वो हर रोज अपनी जिंदगी से जंग लड़ अपने परिवार की देखभाल कर रहे थे

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परिवार में आयी इन परिस्थितियों के चलते सुदीर दत्ता को अपने परिवार चलाने के लिए कुछ तो करना था या तो अपनी पढ़ाई छोड़ कर कही मजदूरी करना या फिर किसी होटल पर चाय बनाना लेकिन उन्होंने जिंदगी बदलने के लिए अलग ही तरीका सोचा उन्होंने अपने दोस्तों की सलाह ली और फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की स्टोरी से प्रभावित हो कर मुंबई के लिए निकल पड़े सुदित दत्ता बताते है की बचपन से ही कुछ अलग करने का सपना देखने वालो को जीवन की ये परिस्थिया कुछ करने का मौका देती है

साल 1988 में मुंबई जाने के बाद उन्होंने रोज 15 रूपये की मजदूरी वाला काम ढूंढा और काम करना शुरू कर दिया वहां वे पैकिंग लोडिंग और डिलवरिंग का कार्य करते थे इस काम को करते हुए वो इस कार्य की बिजनेस के बारे में जानने लगे थे उस कंपनी में उनके साथ समान काम करने वाले कुल 12 मजदुर थे वो समय उनके जीवन का कठिन समय था एक ही कमरे में सभी लोगो का रहना खाना पीना होता था ऐसी स्थिति में उन्होंने करीब 3 साल वहां गुजारे 3 साल बाद यानी 1991  में सुदीप दत्ता जिस कंपनी में काम कर रहे थे उस कंपनी के मालिक को बिजनेस में भारी नुकसान हो गया और तब कंपनी के मालिक ने इस फैक्ट्री को बंद करने का निर्णय लिया

और दोस्तों यही से शुरू हुई सुदीप दत्ता की स्टोरी सुदीप ने इस मौके को जाने नहीं दिया और अपनी आज तक की बचत और दोस्त रिश्तेदारों से मांग कर कुल 16000 रूपये जमा कर इस फैक्ट्री के मालिक के पास इसे खरीदने के लिए पहुंच गए लेकिन दोस्तों इतनी बड़ी फैक्ट्री को महज 16000 रूपये नहीं ख़रीदा जा सकता था लेकिन दूसरी और फैक्ट्री मालिक बिजनेस में हुए नुकसान से परेशान था इस वजह से वो उन रुपयों में ही मान गए 

लेकिन इसके लिए उस कंपनी मालिक ने सुदीप के सामने दो शर्ते रखी पहली शर्त थी की अगले दो साल तक इस कंपनी को जो भी मुनाफा होगा वो इस फैक्ट्री के मालिक को देना होगा और इस शर्त के लिए सुदीप तैयार हो जाते है एक समय था जब वो इस कंपनी में मजदुर बन कर आये थे और आज वो उसी कंपनी की मालिक बन गए है लेकिन कहानी यही नहीं खत्म हुई थी अब उनके खंधो पर परिवार और कंपनी को खरीदने के लिए जो पैसा उधार लिया था उसकी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई थी

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जब उन्होंने इस एलुमिनियम पैकेजिंग इंडस्ट्री की कंपनी को ख़रीदा था था तब यह इंडस्ट्री एक बुरे दौर से गुजर रही थी उस समय इस इंडस्ट्री के शेयर केवल दो ही कंपनियों के हाथ में थे पहली थी जिंदल लिमिटेड और दूसरी थी इंडिया फॉयल ये दोनों कंपनिया मार्केट में काफी बड़ी और मजबूत थी और एक छोटी सी कंपनी जो हाल ही में बर्बादी के कगार पर खड़ी थी उसे लेकर इन दो बड़ी कंपनियों से मुकाबला करना उनके सामने एक चुनौती थी तब मार्केट में पैकेजिंग को लेकर आयी नई तकनीक को अपने साथ जोड़कर मार्केट में अपनी पहचान ज़माने लगे उन्होंने कभी भी अपनी उम्मीदों को नहीं हारने दिया और लगातार एक साल तक मेहनत करते रहे और हर प्रोजेक्ट में वो खुद कंपनी को इस बारे में समझाते थे की उनकी कंपनी की पैकेजिंग मार्केट में चल रही बाकि कंपनियों से अलग है

ऐसे ही उन्होंने छोटी छोटी कंपनियों से आर्डर लेना शुरू किया और अपनी कंपनी का काम चालू किया धीरे धीरे उनकी कंपनी मार्केट में मजबूत होने लगी तब उनको SUN PHARMA और Nestle जैसी बड़ी कंपनियों से काम मिलने लग गया

तब से सुदीर जी को अपने जीवन में कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा और यही समय था जब वो पहली बार जीवन में सफलता की सीढ़िया चढ़ना शुरू हुए थे की मार्केट में अनिल अग्रवाल की वेदांता कंपनी ने पैकेजिंग इंड्रस्टी में कदम रखता है उस दौर में वेदांता बड़ी कंपनियों की लिस्ट में शामिल था और इतनी बड़ी कंपनी के साथ मार्केट में मुकाबला करना सुदीप जी के लिए एक बड़ी चुनौती था लेकिन सुदीप जी ने इस हालात से निराश न होते हुए अपने प्रोडक्ट में और अधिक मेहनत की और अपने प्रोडक्ट को और बेहतर बनाया आखिर में वेदांता कंपनी को सुदीप दत्ता के आगे हार माननी पड़ी और साल 2008 में सुदीप जी ने 130 करोड़ रूपये देकर अनिल अग्रवाल से उनकी वेदांता कंपनी खरीद लिया सुदीप जी के जीवन का ये सबसे बड़ा फैसला था

Sudip Dutta Success Story In Hindi

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इतनी बड़ी कंपनी के मालिक बनने के बाद भी सुदीप रुकते नहीं है और अपने प्रोडक्ट पर मेहनत करते रहते है और खुद की फर्मा पैकेजिंग इंडस्ट्री में पहचान बनाने में लग जाते है साल 1998 से 2000 तक उन्होंने कलकत्ता से लेकर 12 बड़े शहरो में अपने प्रोडक्ट यूनिट की स्थापना की

दोस्तों आज सुदीप दत्ता की ESS DEE ALUMINIUM PVT LTE कंपनी भारत की पैकेजिंग फिल्ड में नंबर 1 कंपनी बन चुकी है और दोस्तों थोड़े समय बाद वर्ल्ड की दो टॉप पैकेजिंग में भी सुदीप दत्ता की कंपनी शामिल होने वाली है साथ ही आज इनकी कंपनी बॉम्बे स्टॉक  और नेशनल स्टॉक  में भी अपनी जगह बना चुकी है

उनके पैकेजिंग फिल्ड में बेहतर सोच के लिए नारायण मूर्ति भी कहा जाता है दोस्तों आज वर्तमान में उनकी कंपनी की मार्केट वेल्यू 1600 करोड़ रूपये से भी अधिक है अपने जीवन में इतना कुछ हासिल करने के बाद भी आज भी वो एक साधारण व्यक्ति की तरह अपना जीवन जीते है और इस बात का सबसे बड़ा सबूत ये है की आज भी उनकी कंपनी में काम करने वाले लोग उन्हें दादा कहकर बुलाते है उन्होंने अपने जीवन से सीखकर गरीब और असहाय लोगो के लिए सुदीप दत्ता फॉउंडेशन भी खोली है 

दोस्तों हमें सुदीप दत्ता सक्सेस स्टोरी से एक सीख मिलती है की जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो  उससे हार न मानते हुए उसका सामना करना चाहिए किसी ने सही कहा है जो लोग संघर्ष के दौर में कोशिश करना नहीं छोड़ते उनको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता.

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