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गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन परिचय | Gopal Krishna Gokhale Biography In Hindi

गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन परिचय | Gopal Krishna Gokhale Biography In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-11 months ago
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गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन परिचय | Gopal Krishna Gokhale Biography In Hindi

  • नाम - गोपाल कृष्ण गोखले 
  • जन्म दिनांक -  9 मई 1866, बॉम्बे प्रेसीडेंसी
  • पिता का नाम - कृष्णा राव गोखले
  • माता का नाम - वालुबाई गोखले
  • शिक्षा – सन 1884 में एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक
  • पेशा - प्रोफ़ेसर और राजनीतिज्ञ
  • राजनीतिक पार्टी - इंडियन नेशनल कांग्रेस, डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी
  • जीवनसाथी का नाम - पहली शादी सन 1880 में, दूसरी शादी  सन 1887 में.
  • संतान - 2 बेटियाँ
  • संस्थापक - सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडियन सोसाइटी
  • उपलब्धियां: महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरु, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मार्ग दर्शकों में से एक, सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी के संस्थापक
  • मृत्यु - 1 9 फरवरी 1915, मुंबई

गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मार्गदर्शकों में से एक थे। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। गांधीजी उन्हें अपना राजनैतिक गुरु मानते थे। राजनैतिक नेता होने के आलावा वह एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने एक संस्था “सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी” की स्थापना की जो आम लोगों के हितों के लिए समर्पित थी। देश की आजादी और राष्ट्र निर्माण में गोपाल कृष्ण गोखले का योगदान अमूल्य है।

गोपाल कृष्ण गोखले का आरंभिक जीवन 

आपका (गोपाल कृष्ण गोखले) जन्म 9 मई 1866 को बम्बई प्रान्त के रत्नागिरी जिले के कोतलुक गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम कृष्ण राव गोखले एवं माता का नाम वालूबाई गोखले था| जो कोल्हापुर रियासत के एक सामंती रजवाड़े कागल में कार्यरत थे। प्रारंभ में कृष्णराव वहां एक साधारण क्लर्क थे, किंतु धीरे-धीरे उन्नति करके वे रियासत पुलिस के इन्स्पेक्टर बन गए थे। जब आपकी आयु मात्र 13 वर्ष की थी तभी पिता का देहांत हो गया और उन्हें शिक्षा प्राप्ति के लिए कठोर संघर्ष करना पड़ा | उनकी प्रारंभिक शिक्षा कांगला में शुरू हुई। यहीं जब वे तीसरी कक्षा के छात्र थे, तब एक ऐसी घटना घटी जिसने गोखले को पूरे स्कूल का चहेता और सम्मानीय बना दिया।आपने अपनी आगे की  शिक्षा कोल्हापुर के राजाराम हाईस्कूल में  प्राप्त की। आप अद्भुत प्रतिभा के धनी थे| आपने जीवन में बड़ी तेजी से उन्नति की | आपने सन् 1884 में मात्र 18 वर्ष की आयु में मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की और 20 वर्ष की आयु में पूना के अंग्रेजी स्कूल में अध्यापक हुए , जो आगे चलकर विख्यात फर्ग्युसन कॉलेज के रूप में विकसित हुआ | गोखले इस कॉलेज से 1902 ई. में प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुए |

गोपाल कृष्ण गोखले की शिक्षा

आप उस समय के किसी भी भारतीय द्वारा पहली बार कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने वाले चंद लोगों में से एक थे। आप शिक्षा के महत्त्व को भली-भांति समझते थे। आपको अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण आप बिना किसी हिचकिचाहट और अत्यंत स्पष्टता के साथ अपने आप को अभिव्यक्त कर पाते थे। इतिहास के ज्ञान और उसकी समझ ने आपको स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली को समझने और उसके महत्व को जानने में मदद की| स्नातक की पढाई के बाद आप अध्यापन की ओर बढ़े और पुणे के न्यू इंग्लिश स्कूल में सहायक शिक्षक का कार्य करने लगे। वर्ष 1885 में आप पुणे चले गए और डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के अपने सहयोगियों के साथ फर्ग्यूसन कॉलेज के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए। आपने फर्ग्यूसन कॉलेज को अपने जीवन के करीब दो दशक दिए और कॉलेज के प्रधानाचार्य बने। आपने 1886 में 20 वर्ष की उम्र में सामाजिक जीवन में प्रवेश किया। इस दौरान आप महादेव गोविन्द रानाडे के संपर्क में आये। रानाडे एक न्यायाधीश, विद्द्वान और समाज सुधारक थे जिन्हे आपने अपना गुरु बना लिया।

 महादेव गोविन्द रानाडे गोखले की बुद्धिमता और कर्तव्य-परायणता से बहुत प्रभावित थे और आपने अपना सार्वजनिक जीवन जस्टिस रानाडे के शिष्य के रूप में आरम्भ किया | आपने अपने गुरु की भावना को यथार्थ रूप से ग्रहण किया और वे कभी भी रानाडे द्वारा निर्धारित मृदुता और मधुर तर्कसंगतता के रास्ते से नही हटे | जस्टिस रानाडे ने आपको  बम्बई प्रदेश की मुख्य राजनितिक संस्था “सार्वजनिक सभा “का सचिव बना दिया और शीघ्र ही वे अपने प्रांत के प्रमुख व्यक्तियों में गिने जाने लगे | वे इस संस्था के प्रमुख क्वार्टरली रिव्यु (Quarterly Review) के सम्पादक नियुक्त हुए | चार वर्ष तक वे समाज सुधार के संबध पत्रिका “सुधारक” के भी सम्पादक रहे | आपने बाल गंगाधर तिलक की साप्ताहिक पत्रिका “मराठा” के लिए नियमित रूप से लेख लिखे। अपने लेख के माध्यम से आपने लोगों के अन्दर छिपी हुई देशभक्ति को जगाने की कोशिश की 22 वर्ष की अल्प आयु में ही आप बम्बई विधान परिषद के सदस्य मनोनीत किये गये | सरकार की भूमि राजस्व संबधी निति पर आपने परिषद को बहुत ही प्रभावोत्पादक भाषण दिए | 1889 ई. में आप कांग्रेस के सदस्य बन गये और वे कई वर्षो तक बम्बई प्रदेश के मंत्री रहे|

गोपाल कृष्ण गोखले जीवन संघर्ष

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सन 1892 के अधिनियम की कमियों पर आपने तर्कपूर्ण ढंग से प्रकाश डाला | सन 1902 में आपको केन्द्रीय विधान परिषद का सदस्य चुना गया और जीवन के अंतिम समय तक वे उस पद पर आसीन रहे | परिषद में आपके बजट भाषण बहुत ही तर्क एवं तथ्यों से पूर्ण तथा आकर्षक होते थे | आपने ब्रिटिश शासन के अधीन भारत” पर एक सार्वजनिक भाषण दिया जिसकी बहुत सराहना हुई| आपने 1903 में अपने एक बजट-भाषण में कहा था कि भावी भारत दरिद्रता और असंतोष का भारत नहीं होगा बल्कि उद्योगों, जाग्रत शक्तियों और संपन्नता का भारत होगा. वे पाश्चात्य शिक्षा को भारत के लिए वरदान मानते थे और इसका अधिकाधिक विस्तार चाहते थे. उनका मानना था कि देश की तत्कालीन दशा में पाश्चात्य शिक्षा का सबसे बड़ा कार्य भारतीयों को पुराने, जीर्ण-शीर्ण विचारों की दासता से मुक्त कराना होगा.

ठीक उसी प्रकार उन्होंने सरकर को ये विचार दिया कि प्राथमिक शिक्षा को छह से दस वर्षो तक के बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और इसके खर्चे को सरकार और संस्थाएं उठाएं. सरकार इस बात के लिए राज़ी नहीं थी. उसका मानना था कि शिक्षा के प्रसार से अंग्रेज़ी साम्राज्य को दिक्कत होगी. गोखले ने अपनी तर्क बुद्धि से उन्हें समझाया कि सरकार को अनपढ़ लोगों से ही डरना चाहिए, पढ़े-लिखों से नहीं.सन 1904 ई. में ब्रिटिश सरकार ने आपको सी.आई.ऍफ़( C.I.F.) का खिताब दिया | सन 1905 ई. में आपको कांग्रेस के बनारस अधिवेशन के अध्यक्ष पद से सुशोभित किया |आप  केवल 39 वर्ष की आयु में इस गौरवपूर्ण पद पर पहुचने वाले प्रथम व्यक्ति थे | इसके बाद आप अनेक वर्षो तक कांग्रेस के उदारवादी पक्ष के कर्णधार का कार्य करते रहे | आप व्यवहारिक राजनैतिक बुद्धि के धनी थे, जो ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासकों की न्याय और उदारता की भावना को उकसा कर हिंदुस्तान को उनके साम्राज्य के भीतर ही स्वायत्तता दिलाने के पक्षधर थे. लेकिन ये बात तिलक और गरम दल के सदस्यों के गले नहीं उतरती थी. गोखले का विचार था कि उग्रवादी साधनों से भारत का अहित होगा. एक बार लार्ड हार्डिंग ने उनसे पूछ लिया - ‘तुम्हें कैसा लगेगा अगर मैं तुम्हें ये कह दूं कि एक महीने में ही ब्रिटिश ये देश छोड़ देंगे?’ उनका जवाब था, ‘मुझे बेहद ख़ुशी होगी लेकिन इससे पहले कि आप लोग लंदन पंहुचें हम आपको वापस आने के लिए तार (टेलीग्राम) कर देंगे.’

 आपने विविध रूपों में देश की सेवा की | आपने सन् 1897 , 1905 , 1906, 1908, 1912, 1913 और 1914 में कुल मिलाकर 7 बार इंग्लैंड की यात्रा की | इनमे से कुछ यात्राये आपने भारतीय प्रतिनिधि के रूप में ब्रिटेन के समक्ष भारत का दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए की थी | 1897 में आप बेब्ली आयोग के समक्ष भारत का दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए इंग्लैंड गये थे | बेब्ली आयोग दो मुख्य प्रश्नों पर विचार के लिए नियुक्त किया गया | पहला  , क्या भारत पर कोई ऐसा वित्तीय भार है जिसे न्याय की दृष्टि से इंग्लैंड को वहन करना चाहिये ? और दूसरा भारतीय वित्त की समीक्षा | 1905 में आपने हाबहाउस विकेंद्रीकरण आयोग के समक्ष अपने विचार रखे |

1905 में आप  उस प्रतिनिधि मंडल के सदस्य होकर इंग्लैंड गये जो ब्रिटिश राजनीतिज्ञों को यह समझाने-बुझाने के लिए गया था कि बंग-भंग संबधी अधिनियम न बनाया जाये लेकिन विवेकपूर्ण आग्रह का ब्रिटिश नेताओं पर कोई प्रभाव नही पड़ा | आपने सन् 1909 के सुधारों का पहले तो स्वागत किया लेकिन बाद में सुधारों के व्यावहारिक रूप पर घोर निराशा प्रकट करते हुए आपने नौकरशाही के कार्यो की कटु आलोचना की | सितम्बर 1912 में भारतीय लोक सेवाओं की विभिन्न समस्याओं तथा कार्यप्रणाली के संबध में जांच करने के लिए इस्लिंगटन की अध्यक्षता में के शाही आयोग नियुक्त किया गया आप इस आयोग के सदस्य थे |

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अपनी इंग्लैंड की यात्राओं में आपने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति तथा उसके पत्र इंडिया को सक्रिय बनाने में भी प्रसंशनीय कार्य किया | सर विलियम बैडरबर्न के सहयोग से आपने इस पत्र को भारतीय आकांक्षाओ का एक ओजस्वी एक यथार्थवादी प्रवक्ता बना दिया | सन् 1910 व 1912 में आपने इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल में नेटाल के करारबद्ध भारतीय श्रमिको की सहायता के लिए प्रस्ताव रखे | इन श्रमिको की स्थिति आज के बंधुआ श्रमिको से भी बदतर थी |सन् 1912 में आप गांधीजी के निमन्त्रण पर दक्षिण अफ्रीका गये और वहाँ उन्हें गांधीजी के नेतृत्व में भारतीय सत्याग्रहीयो तथा दक्षिण अफ्रीका की सरकार के बीच समझौता कराने में सफलता मिली | आपने गांधीजी को सूचित किया कि पंजीकरण के काले अधिनियम को रद्द कर दिया जाएगा और तीस पौंड के घूर्णित कर को समाप्त कर दिया जाएगा |

महात्मा गांधी  अफ्रीका से  आने पर राजनीति में आ गए, आपके निरीक्षण में 'सर्वेट्स ऑफ इंडिया सोसायटी(SOIS) ' की शुरुआत की, जिसमें  देश लोग सम्मिलित होकर देश की सेवा कर अच्छे से  सकें, पर इसकी  संस्था  की सदस्यता के लिए गोखले जी सभी  सदस्य की बहुत ही कठिन परीक्षण करके सदस्यता प्रदान करते रहे । सदस्यता से सम्बन्ध में घटना के बारे में बताते है की -  मुंबई म्युनिस्पैलिटी में एक श्री अमृत लाल ठक्कर इंजीनियर थे । वो ये चाहते थे, गोखले जी की संस्था में शामिल  होकर राष्ट्र-सेवा से उऋण हो सकें। अमृत लाल वी. ठक्कर ने खुद गोखले जी से बिना मिले एवं  सोसाइटी में शामिल होने के लिए देव जी से प्रार्थना-पत्र लिखवाया। अमृतलाल जी ये चाहते थे कि गोखले जी सोसाइटी में शामिल  करने की अनुमति  दें तो मुंबई की म्युनिस्पैलिटी से त्यागपत्र दे दिया जाए, पर इन्होने दो घोड़ों पर सवार होना स्वीकार नही किया और साफ शब्दों में कह दिया कि यदि सोसाइटी की सदस्यता चाहिए   तो पहले मुंबई के म्युनिस्पैलिटी पद से इस्तीफा दें।गोखले जी  की इस कठोर भावना के सामने इंजी. अमृतलाल वी. ठक्कर को इस्तीफा देना पड़ा और तब जाकर सोसाइटी की सदस्यता उनको मिली । इंजी महोदय गोखले जी की इस नीति एवं निर्धारण की वजह से  राष्ट्रीय के प्रति भावनाओं से ओत-प्रोत एवं  सेवा क्षेत्र में भारत के  विश्रुत 'ठक्कर बापा ' नाम पड़ा ।

गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु

आपको गांधीजी अपना राजनितिक गुरु मानते थे और आपके मन में गांधीजी के लिए गहरा स्नेह और सम्मान था | गांधीजी आपको पुण्यात्मा गोखले कहा करते थे | आपकी निर्दोष  देशभक्ति और आकर्षक व्यक्तित्व का ब्रिटेन के नेताओं पर गहरा प्रभाव पड़ा था | अपनी चारित्रिक श्रेष्टता , गम्भीर सत्यनिष्ठा और मातृभूमि की अनवरत सेवा से आप भारत तथा विदेशो में अनेक लोगो की प्रसंशा और सम्मान के पात्र बन गये थे | उनकी कर्तव्यनिष्ठा ने उन्हें भारी सम्मान दिलाया था लेकिन यह सब कुछ उनके स्वास्थ्य के मूल्य पर ही हो पाया था गोपाल कृष्ण गोखले मधुमेह और दमा के मरीज थे और अत्यधिक बोलने से गोखले के स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा और 19 फरवरी 1915 की 48 वर्ष की अल्प आयु में उनका देहावसान हो गया |

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