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स्वर्ग और नर्क केवल हमारी सोच है हकीकत तो कुछ और है

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Heaven and Hell
स्वर्ग और नरक लोक केवल अनुभव हैं
तो तीन लोक कौन से हैं यहाँ का पता कोई नहीं लगा सका है यह संसार जिसे भौतिक वास्तविकता भी कहा जाता है, पांच तत्वों के मिश्रण से ही इंसान का शरीर बनता है । फिर भी यदि किसी जीव के लिए इन पांच तत्वों का खेल खत्म हो जाता है, तब भी यह जीवन चलता रहता है। मरने के उपरांत भी जो जीवन रहता है, उसे दो अलग अलग भागो में विभाजित किया गया है 1 स्वर्ग और 2 नरक।
एक बार यदि आपने अपना शरीर छोड़ दिया तो आपके पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता। आपके पास सोचने समझने की क्षमता नहीं होती, क्योंकि आपके शरीर के साथ-साथ आपकी समझ भी आपके पास नहीं रहती है । इसलिए की आपका विवेक जा चुका है, इस कारण आप केवल अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही चलते हैं। इंग्लिश में नरक को ‘हेल’ और स्वर्ग को ‘हेवन’ कहा जाता है, बौद्ध धर्म में इनको ऊपरी और निचली दुनिया कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि एक संसार ऊपर और एक नीचे है देखा जाए तो हम सब पदार्थों से निर्मित हैं, फिर भी हम एक दूसरे से अलग हैं। कोई डर में है, कोई गुस्से में, कोई बेचैन है तो कोई मजे में और कोई प्यार में। सभी में घटक एक ही हैं, लेकिन हर किसी का व्यवहार अलग-अलग होता है।
सिर्फ " पृथ्वी लोक " पर ही हमारे पास ( सोचने समझने ) की शक्ति होती है
मानव जीवन का महत्व इसलिए माना गया है की , क्योंकि आपके पास सोचने समझने की क्षमता है। आप अपने विवेक का इस्तेमाल करके खुद को आगे बढ़ा सकते हैं। ‘हेल’ और ‘हेवन’ शब्द तो गलत संकेत देते हैं। तो चलिए ऐसा करते हैं कि हम एक दुनिया को सुखद और दूसरी को दुखद दुनिया कह लेते हैं।
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अगर आपने कोई शरीर धारण किया हुआ है और फिर भी अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करते, तो आप अपनी प्रवृत्ति के अनुसार बहते चले जाएंगे।क्योंकि आपका विवेक जा चुका है, इस वजा से आप अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही चलते हैं , यदि आपने अपनी प्रवृत्ति कष्टरूपी बना रखा है, तो आप उसे रोक नहीं पाएंगे । और यह कष्ट तब तक चलता रहता है, जब तक कि उसकी ऊर्जा उस के साथ दूसरा या किसी प्राणी को दूसरा शरीर नहीं मिल जाता है। इन दुखी और सुखी दुनिया में रहने वाले प्राणियों को भिन्न-भिन्न श्रेणियों में बांटा गया है। यक्ष, गंधर्व, देव जैसे प्राणी आनंदमय होते हैं, परंतु वे सभी आनंद के अलग-अलग स्तरों में होते हैं।
स्वर्ग और नर्क में बस प्रवृत्तियाँ के द्वारा आपको चलना होता है
इन तीन तरह के लोकों में से केवल भौतिक संसार में ही बुद्धि और विवेक सक्रिय होता है, आप में अंतर करने की क्षमता होती है। आप अपने से इतर कुछ बना सकते हैं। बाकी बची दो दुनिया में आप अपने ही द्वारा बनाई गई प्रवृत्तियों के अनुसार या तो कष्ट में रहते हैं या मजे करते हैं। अर्थात यह है आपका वहां कोई बस नहीं चलता है ।
केवल पृथ्वी पर बुद्धि की क्षमता उपलब्ध है
हालांकि आपके पास भेद करने की, अंतर करने की क्षमता होती है, फि र भी आप उसका इस्तेमाल यदा-कदा ही करते हैं। अगर आपकी बुद्धि और अंतर करने की क्षमता वाकई में सक्रिय है तो आप अपनी प्रवृत्ति के वश में नहीं आएंगे। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी कार्मिक प्रवृत्ति क्या है और किस तरह से बाहरी ताकतें आपको उकसा रही हैं, आप हर पल वैसे ही होंगे जैसे आप होना चाहते हैं। इस तरह की कोई भी संभावना, क्षमता और शक्ति केवल तभी कारगर है, जब आप इस संसार में प्राणी के रूप में मौजूद हैं। दुखद और सुखद दोनों ही तरह की दुनिया में आपके पास ऐसी कोई संभावना, क्षमता और शक्ति नहीं होती।
देवता भी पृथ्वी पर आना कहते हैं
भारत कई कहानियां हैं, जिसमें यह वर्णन है कि देवता भी अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए अपनी मर्जी से मानव रूप को धारण करते है और धरती पर जन्म लेते हैं और जरुरी तप या साधना करते है । ऐसा इसलिए क्योंकि केवल मानव में ही भेद करने की क्षमता पायी जाती है । आप इस संसार में नहीं, दूसरे संसार में हों। लेकिन इस समय यह संसार ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां आपके पास अंतर करने की क्षमता है। इसलिए आप अपनी इस शक्ति को काम में ले और आनंद प्राप्त करें ।
स्वर्ग और नर्क केवल हमारी सोच है हकीकत तो कुछ और है




