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स्वतंत्रता सेनानी, उद्योगपति जमनालाल बजाज का जीवन परिचय | Jamnalal Bajaj Biography In Hindi

स्वतंत्रता सेनानी, उद्योगपति जमनालाल बजाज का जीवन परिचय | Jamnalal Bajaj Biography In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-10 months ago
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दोस्तों आज हम बात करेंगे भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और उद्योगपति  मानवशास्त्री रहे जमनालाल बजाज की भारत के राष्ट्रपिता कहें जाने वाले महात्मा गाँधी के काफी करीबी और उनके सच्चे उनुयारी के रूप में आज उन्हें इतिहास में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है की गाँधी जी जमनालाल बजाज को अपने पुत्र के समान समझते थे तो चलिए दोस्तों अब आगे जानते है जमनालाल के जीवन के बारे में.

  • नाम - जमनालाल बजाज
  • जन्म दिनांक - 04 नवम्बर 1884 
  • जन्म स्थान - सीकर, ब्रिटिश भारत
  • पिता का नाम - कनीराम बजाज
  • माता का नाम - बिरधी भाई 
  • पत्नी का नाम - जानकी देवी
  • संतान - कमलाबाई, कमलनयन, उमा, रामकृष्ण, मदलसा 
  • व्यवसाय -  समाजसेवक, राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी, उद्योगपति
  • मृत्यु दिनांक - 1 फ़रवरी 1942 (उम्र 57) वर्धा

जमनालाल बजाज का आरंभिक जीवन | Early life of Jamnalal Bajaj

जमनालाल बजाज का जन्म राजस्थान जयपुर के एक छोटे से गांव काशी वास में एक गरीब किसान कनीराम के घर 4 नवम्बर, 1889 को हुआ था। महाराष्ट्र वर्धा, के एक बड़े व्यापारी बच्छराज ने जमनालाल बजाज को 5 वर्ष की आयु में गोद ले लिया। बच्छराज राजस्थान के ही सीकर जिले के रहने वाले थे बच्छराज के पूर्वज सदी पहले अपना गांव छोड़कर नागपुर में बस गए थे। विलासिता और ऐश्वर्य से भरा वातावरण होने के बाद भी  जमनालाल बजाज के के बचपन पर कोई असर नहीं पड़ा। क्योंकि जमनालाल बजाज का बचपन से ही अध्यात्म की और झुकाव ज्यादा था । जब जमनालाल की उम्र 10 साल थी तब उनकी सगाई जानकी देवी से हो गई। जब जमनालाल जी की उम्र 13 साल  हुई तब इनकी शादी कर दी गई उस समय इनकी पत्नी जानकी की उम्र महज 9 साल थी। इन दोनों का  विवाह वर्धा में बड़ी धूमधाम से हुआ।अनुसार गांव वर्धा में खोले गए विधालय विनोबा सत्याग्रह आश्रम में शिक्षा के लिए भेजा । साल 1922 में अपनी पत्नी को लिखे एक पत्र जमनालाल जी ने कहा की "मैं हमेशा से यही सोचता आया हूं कि तुम और हमारे बच्चे मेरे ही कारण किसी प्रकार की प्रतिष्ठा अथवा पद प्राप्त न करें। यदि कोर्इ प्रतिष्ठा अथवा पद प्राप्त हो, तो वह अपनी-अपनी योग्यता के बल पर हो। यह मेरे, तुम्हारे, उनके सबके हित में है।"

Jamnalal Bajaj Biography

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अखिल भारत के कोषाध्यक्ष के पद पर होने के कारण जमनालाल जी ने खादी वस्त्रों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए देश के कई भागो में दौरा किया। ताकि देश के बेरोजगार लोगो को इसका फायदा मिल सके साल 1935 में गाँधी जी  'अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ' की नींव रखी। इस योजना से प्रसन्न हो कर इस संघ के लिए जमनालाल बजाज ने अपना एक विशाल बगीचा गाँधी जी को दे दिया। इस बगीचे का नाम गाँधी जी ने स्वर्गीय मगनलाल गांधी के नाम पर 'मगनाडी' रख दिया। साल 1936 में हुए 'अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन', के बाद जमनालाल जी ने वर्धा में पश्चिम और पूर्व में हिंदी को प्रसारित करने के लिए एक समिति की स्थापना की जिसका नाम "राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' रखा इस समिति की स्थापना के कुछ समय बाद ही जमनालाल बजाज को 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन', के मद्रास से अध्यक्ष बन गए। इस पद का मन रखते हुए जमनालाल बजाज ने राष्ट्रभाषा आंदोलन को एक नई दिशा दी और देश में हिन्दू मुस्लिम एकता एवं देश में छुआछूत की प्रथा को ख़त्म करने में जुट  गए। जमनालाल जी भारत देश के ऐसे पहले नेता थे जिन्होंने अपने गांव वर्धा में अपने पूर्वजों के द्वारा बनाये गए  'लक्ष्मीनारायण मंदिर' के द्वार साल 1928 में हमेशा के लिए अछूतों  के लिए खोल दिए । जमनालाल जी और उनकी पत्नी जानकी देवी अपने अतिथियों की आव-भगत का काफी ख्याल रखते थे।

जमनालाल बजाज  के जीवन के प्रमुख कार्य | Major Activities of Jamnalal Bajaj Life

Jamnalal Bajaj Biography

जमनालाल बजाज ने अपने अंतिम त्याग में देश के पशुधन के कार्य को चुना और गाय को उसका प्रतीक चुना ।जमनालाल बजाज इस कार्य में एकाग्रता और लगन के साथ जुट गए। जीस की हम अपने शब्दो में कोई मिसाल नहीं दे सकते । जमनालाल जी का प्रथम उद्देश्य गो-सेवा करना था। ये काम देश में पहले भी चल रहा था लेकिन बिलकुल कछुआ चाल चल रहा था। इस बात से जमनालाल जी को बिलकुल संतोष नहीं था। दोस्तों जमनालाल जी इस कार्य को और और तेज चलना चाहते थे और इस काम को इतना तेज चलाया की वो खुद ही चल बसे । दोस्तों यदि गाय को जिंदा रखना है तो हमें भी गया की रक्षा में अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। जमनालाल जी अपने कार्यकर्ताओं केवल आर्थिक मदद ही नहीं करते थे वो उनके बच्चो की शिक्षा चिकित्सा आदि की व्यवस्था भी उपलब्ध करवाते थे। और उन लोगो के बच्चों की सूची भी रखते थे और शादी का पूरा खर्च उठाते थे ।इस कारण गाँधी जी जमनालाल जी को "शादी काका" के नाम से भी पुकारते थे।

जमनालाल बजाज 'राय बहादुर' की पदवी से सम्मान | 'Rai Bahadur' Jamnalal Bajaj

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साल 1918 में जमनालाल जी को सरकार ने 'राय बहादुर' की पदवी से सम्मानित किया.इस विषय पर जमनालाल जी ने गाँधी जी से सलाह मांगी तब गाँधी जी ने कहा "नये सम्मान का सदुपयोग करो सम्मान और पदवी इत्यादि खतरनाक चीजे हैं।उनका सदुपयोग की जगह दुरुपयोग अधिक हुआ है।"में चाहता हु की तुम इनका सही से सदुपयोग करो यह तुम्हारी देशभक्ति या आध्यात्मिक उन्नति के आडे नहीं आयेगा।" साल 1920 में असहयोग का प्रस्ताव कलकत्ता में अधिवेशन पारित हुआ। तब जमनालाल जी ने अपनी ये पद्द्वी वापिस लोटा दी।

जमनालाल बजाज का जयपुर सत्याग्रह | Jaipur Satyagraha Jamnalal Bajaj In Hindi

Jamnalal Bajaj Biography

Source www.jamnalalbajajfoundation.org

जमनालाल के काफी प्रयत्नों के कारण ही जयपुर में साल 1931 में 'जयपुर राज्य प्रजा मंडल' की स्थापना हुई । ये मंडल 1936 में सक्रिय रूप से कार्य करने लगा। लेकिन अचानक जयपुर में 30 मार्च 1938 को राज्य की सरकार ने एक आदेश निकला की सरकार की अनुमति के बिना कोई भी जयपुर में किसी भी तरह की सार्वजानिक संस्था की स्थापना नहीं कर सकता है । इस आदेश का सीधा निशाना प्रजा मंडल की व्यवस्थाओ को व्यर्थ करना था। और मंडल का वार्षिक अधिवेशन 8 और 9 मई जमानालाल बजाज की अध्यक्षता में पहले ही घोषित किया जा चूका था। उस समय जयपुर के एक अंग्रेज दिवान बीकैम्प सेंटजान को जमनालाल जी की बढ़ती लोकप्रियता बिलकुल पसंद नहीं थी। 4 जुलाई 1938 को इस मामले और आग पकड़ ली और बात काफी आगे बढ़ गई । जयपुर पुलिस ने एक रेलगाड़ी गोलिया बरसा दी। जिसमे कई राजपूतो की मौत हो गई । ये घटना आज की तरह फेल गई और सीकर के जाट और राजपूत भड़क उठे जब लगा की राज्य में खून की नदियां बहने लगेगी तब इस शर्मनाक घटना का पता जमनालाल जी को लगा तब उन्होंने सोचा इन दोनों में जल्द सुलह हो जाये। सीकर जमनालाल जी का जन्म स्थल था। उन्होंने लोगो हिंसा नहीं करने की हिदायत दी।

जमनालाल जी का अंतिम समय | Jamnalal Bajaj Death Information In Hindi

साल 1941 में "व्यक्तिगत सत्याग्रह" से मिली जेल से रिहाई के बाद  महात्मा गाँधी की अनुमति ले कर जमनालाल जी अपनी  माँ से मिलने देहरादून गए थे। वापस वर्धा लौटने के बाद 11 फ़रवरी 1942 को  जमनालाल जी के मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।