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जामवन्त आज भी जिंदा हैं, जानिए उनके जीवन का रहस्य | Life Story of Jamwant

जामवन्त आज भी जिंदा हैं, जानिए उनके जीवन का रहस्य | Life Story of Jamwant

In : Viral Stories By storytimes About :-11 months ago
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इन कारणों के आधार पर जिन्दा है जामवन्त | All About Life Story of Jamwant in Hindi

जामवन्त को ऋक्षपति कहा जाता है। यह ऋक्ष बिगड़कर रीछ हो गया जिसका अर्थ होता है भालू अर्थात भालू के राजा। लेकिन क्या वे सचमुच भालू मानव थे? रामायण आदि ग्रंथों में तो उनका चित्रण ऐसा ही किया गया है। ऋक्ष शब्द संस्कृत के अंतरिक्ष शब्द से निकला है।

दुनियाभर में प्रचलित पौराणिक कथाओं में इस तरामंडल को अलग-अलग नमो से पुकारा जाता है, लेकिन यूनान में  सप्तऋषि तारामंडल मंडल को बड़ा भालू (larger bear) कहा जाता है। इस तरामंडल के संबंध में प्राचीन यूनान और भारत में कई दंतकथाएं प्रचलित हैं।

पुराणों से पता चलता है कि वशिष्ठ, अत्रि, विश्वामित्र, दुर्वासा, अश्वत्थामा, राजा बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम, मार्कण्डेय ऋषि, वेद व्यास और जामवन्त आदि कई ऋषि, मुनि और देवता सशरीर आज भी जीवित हैं। कहते हैं कि जामवन्तजी बहुत ही विद्वान् हैं। वेद उपनिषद् उन्हें कण्ठस्थ हैं। वह निरन्तर पढ़ा ही करते थे और इस स्वाध्यायशीलता के कारण ही उन्होंने लम्बा जीवन प्राप्त किया था।  जामवन्त ही परशुराम और हनुमान के बाद एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके तीनों युग में होने का वर्णन मिलता है और कहा जाता है कि वे आज भी जिंदा हैं। लेकिन राजा बलि के काल सतयुग में जन्म लेने के कारण जामवन्तजी कि उम्र परशुराम और हनुमान से भी लंबी उम्र है। परशुराम से बड़े हैं जामवन्त और जामवन्त से बड़े हैं राजा बलि।

प्राचीन भारत में रामायण काल के समय तीन प्रकार की संस्कृतियों का अस्तित्व था। उत्तर भारत में राजा दशरथ जो आर्य संस्कृति जिसके प्रमुख थे, दक्षिण भारत में अनार्य संस्कृति जिसका प्रमुख रावण था और तीसरी संस्कृति देश के मध्य भारत में आरण्यक संस्कृति (जनजातीय और आदिवासी) के रूप में अस्तित्व में थी जिसके संरक्षक महर्षि अगस्त्य मुनि थे। अगस्त मुनि, वनवासियों के गुरु व मार्ग-दर्शक थे। अस्त्य मुनि के शिष्य ऋक्ष और वानर, बाली, सुग्रीव, जामवन्त, हनुमान, नल, नील आदि थे।

#1 रीछ राज / जामवन्त का जन्म

Jamwant is alive

जामवन्त जी की माता एक गन्धर्व कन्या थी। माना जाता है कि जामवन्त का जन्म ‍अग्नि के पुत्र के रूप में देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता के लिए हुआ था।

जामवन्तजी सृष्टि के आदि में प्रथम कल्प के सतयुग में उत्पन्न हुए थे। वामन अवतार को जामवन्त ने अपने सामने ही देखा था। वे राजा बलि के काल में भी थे। भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग धरती मांग कर बलि को चिरंजीवी होने का वरदान देकर पाताल लोक का राजा बना दिया था। जामवन्तजी वामन अवतार के समय अपनी युववस्था में थे। जामवन्त को चिरं‍जीवियों में शामिल किया गया है जो कलियुग के अंत तक रहेंगे।

#2 अग्नि पुत्र जामवन्त

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प्राचीन काल में देवताओं के पुत्रों का जैसे इंद्र पुत्र, सूर्य पुत्र, चंद्र पुत्र, पवन पुत्र, वरुण पुत्र, ‍अग्नि पुत्र आदि का अधिक वर्णन मिलता है। उक्त देवताओं को स्वर्ग का निवासी कहा गया है। एक ओर जहां हनुमानजी और भीम को पवन पुत्र माना गया है, वहीं जामवन्तजी को अग्नि पुत्र कहा गया है। जामवन्त की माता एक गंधर्व कन्या थी। जब पिता देव और माता गंधर्व थीं तो वे कैसे रीछमानव हो सकते हैं?

एक दूसरी मान्यता के मुताबिक भगवान ब्रह्मा ने दो पैरों पर चल सकने वाला और मानवो से संवाद (बात - चित) करने वाला एक रीछ मानव बनाया था। पुराणों के अनुसार वानर और मानवों की तुलना में अधिक विकसित रीछ जनजाति का उल्लेख मिलता है। वानर और किंपुरुष के बीच की यह जनजाति अधिक विकसित थी। हालांक‍ि इस संबंध में अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है।

#3 जामवन्त राम युग में

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जामवन्त त्रेतायुग में भी बूढ़े हो चले थे। राम के काल में उन्होंने भगवान राम की सहायता की थी। कहते हैं कि जामवन्तजी समुद्र को लांघने में सक्षम थे लेकिन त्रेतायुग में वह बूढ़े हो चले थे। इसीलिए जामवन्तजी ने हनुमानजी से इसके लिए विनती थी कि आप ही समुद्र लांघिये। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में जामवन्त का नाम विशेष उल्लेखनीय है। जामवंत जी का एक विशेष काम था हनुमानजी को उनकी शक्तियाँ याद दिलाना। 

माना जाता है कि कुंभकर्ण से जामवन्तजी आकार-प्रकार में तनीक ही छोटे थे। जामवन्त को अनुभवी और परम ज्ञानी माना जाता था। उन्होंने ही हनुमानजी से हिमालय में प्राप्त होने वाली चार दुर्लभ औषधियों का वर्णन किया था जिसमें से एक संजीविनी थी।

मृत संजीवनी चैव विशल्यकरणीमपि।
सुवर्णकरणीं चैव सन्धानी च महौषधीम्‌॥- युद्धकाण्ड 74-33

विशल्यकरणी (शरीर में घुसे अस्त्र निकालने वाली), सन्धानी (घाव भरने वाली), सुवर्णकरणी (त्वचा का रंग ठीक रखने वाली) और मृतसंजीवनी (पुनर्जीवन देने वाली)।

#4 जामवन्तजी का अहंकार

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राम व रावण के युद्ध में रामसेना के सेनापति जामवन्तजी थे। जब भगवान राम युद्ध की समाप्त‌ि के बाद विदा होकर अयोध्या लौटने लगे तो जामवन्तजी ने राम जी से कहा कि प्रभु इतना बड़ा युद्ध हुआ मगर मुझे पसीने की एक बूंद तक नहीं गिरी, तो उस समय प्रभु श्रीराम मुस्कुरा दिए और चुप रह गए। श्रीराम समझ गए कि जामवन्तजी के भीतर अहंकार प्रवेश कर गया है।

जामवन्त ने श्री राम से कहा, प्रभु युद्ध में सबको लड़ने का अवसर मिला परंतु मुझे अपनी वीरता दिखाने का कोई अवसर नहीं मिला। मैं युद्ध में भाग नहीं ले पाया और युद्ध करने की मेरी कामना मेरे मन में ही रह गई। उस समय भगवान श्री राम ने जामवन्तजी से कहा, तुम्हारी ये इच्छा अवश्य पूर्ण होगी जब मैं अगला अवतार धारण करूंगा। तब तक तुम इसी स्‍थान पर रहकर तपस्या करो।

#5 जामवन्तजी द्वापर युग में

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इंद्रदेव स्यमंतक मणि नमक हिरे को धारण करते हैं। कहा जाता हैं कि प्राचीनकाल में कोहिनूर को ही स्यमंतक मणि कहा जाता था। 
लेकिन कई स्रोतों के अनुसार लगभग 5,000 वर्ष पहले ही कोहिनूर हीरा मिला था और यह प्राचीन संस्कृत इतिहास में लिखे अनुसार स्यमंतक मणि नाम से प्रसिद्ध रहा था। कोहिनूर हीरा दुनिया के सभी हीरों का राजा है। यह बहुत काल तक भारत के क्षत्रिय शासकों के पास रहा फिर यह मुगलों के हाथ लगा। इसके बाद अंग्रेजों ने इसे हासिल किया और अब यह हीरा ब्रिटेन के म्यूजियम में रखा है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है कि कोहिनूर हीरा ही स्यमंतक मणि है? अभी तक इस पे कोई शोध नहीं हो सका। 

इस मणि के लिए भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध करना पड़ा था। भगवान श्रीकृष्ण को जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा था क्यों की उन पर मणि चोरी करने का आरोप था और जिसे वो असिद्ध करना चाहते थे। दरअसल, यह मणि भगवान सूर्य ने भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित को दी थी।

यह मणि सत्राजित ने अपने देवघर में रखी थी। वहां से प्रसेनजित उनका भाई वह मणि पहनकर आखेट के लिए चला गया। जंगल में एक सिंह ने उसे और उसके घोड़े को मार दिया और मणि अपने पास रखी ली। जाम्बवंतजी ने सिंह के पास मणि देखकर सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को अर्जित करके वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने अपने पुत्र इसको खिलौने के रूप में दे दी। इधर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है।

तब जाम्बवंतजी से श्रीकृष्ण को यह मणि हासिल करने के लिए युद्ध करना पड़ा। अपने आपको जाम्बवंत ने जब युद्ध में हारता देखा तब उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को पुकारा और उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को अपने रामस्वरूप में आना पड़ा। तब जाम्बवंत ने अपने आपको समर्पण कर दिया और अपनी भूल स्वीकारी और उन्होंने मणि भी दी और श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप मेरी पुत्री जाम्बवती से विवाह करें।

इसके बाद जाम्बवती-कृष्ण के संयोग से  साम्ब नामक महाप्रतापी पुत्र का जन्म हुआ। इस साम्ब के कारण ही कृष्ण कुल का नाश हो गया था। श्रीकृष्ण ने कहा कि इस मणि को धरोहर के रूप में रखने का अधिकारी वो ही है जो ब्रह्मचारी और संयमी व्यक्ति है अत: श्रीकृष्ण ने वह मणि अक्रूरजी को दे दी। उन्होंने कहा कि अक्रूर, इसे तुम ही अपने पास रखो। तुम जैसे पूर्ण संयमी के पास रहने में ही इस दिव्य मणि की शोभा है। श्रीकृष्ण की विनम्रता देखकर अक्रूर नतमस्तक हो उठे।

#6 जाम्बवंतजी की जामथुन नगरी

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कहा जाता है कि जामवन्त ने जामथुन नामक नगरी बसाई थी। यह प्राचीन नगरी मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहां एक गुफा मिली है जो जामवन्त का निवास स्थान माना जाता है।

बरेली की गुफा : उत्तर प्रदेश के बरेली के पास जामगढ़ में भी एक प्राचीन गुफा है। कहा जाता है कि यहां जामवन्तजी हजारों वर्ष तक रहे थे। बरेली से लगभग सोलह किलोमीटर दूर विंध्याचल की पहाड़ी पर पुराकाल से ही गणेश-जामवन्त की प्रतिमा स्थापित हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि जामवन्तजी द्वारा स्थापित यह प्रतिमा प्रतिवर्ष एक तिल के बराबर बढ़ती जा रही है।

#7 जामवन्त तपोगुफा

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जामवन्त की तपोस्थली जम्मू और कश्मीर के जम्मू नगर के पूर्वी छोर पर स्थित एक गुफा मंदिर को मन जाता है। इस गुफा में कई पीर-फकीरों और ऋषियों ने ज़्ह तपस्या की है इसलिए इसको 'पीर खोह्' के नाम से भी जाना जाता है। डोगरी भाषा में खोह् का अर्थ गुफा होता है।

श्रद्धालु पीर खोह् तक पहुंचने के लिए मुहल्ला पीर मिट्ठा के रास्ते गुफा तक जाते हैं। मंद‌िर की दीवारों पर देवी-देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं। आंगन में श‌िव मंद‌िर के सामने पीर पूर्णनाथ और पीर स‌िंध‌िया की समाधिंया हैं। जामवन्त गुफा के साथ एक साधना कक्ष का निर्माण किया है जो तवी नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।