महान क्रांतिकारी जतिंद्र मोहन सेनगुप्त की जीवनी | Jatindra Mohan Sengupta Biography In Hindi

महान क्रांतिकारी जतिंद्र मोहन सेनगुप्त की जीवनी | Jatindra Mohan Sengupta Biography In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-8 days ago
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बंगाल के महान क्रांतिकारी ने देश की आजादी में लगा दिया अपना पूरा जीवन अंतिम सांस भी ली जेल में | Jatindra Mohan Sengupta In Hindi

दोस्तों भारत देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था। इस आजादी के लिए भारत के लाखों क्रांतिकारियों ने भाग लिया था और सभी ने एक अलग रास्ते से देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई थी। दोस्तों वैसे भारत देश को आजादी दिलाने की शुरुआत 1857 में ही शुरू हो गई थी। इस आजादी की लहर को आगे ले जाने के लिए समय-समय पर देश के कई क्रांतिकारियों ने अपना योगदान दिया था।

दोस्तों यदि भारत माता की कोख से उन महान क्रांतिकारियों का जन्म नहीं होता तो हम आज भी गुलामी की जंजीरो में कैद रहते । देश के उन वीर क्रांतिकारियों को पता था की साथ मिल कर इस लड़ाई को जीता जा सकता है और ये बात वो सभी लोग समझ चुके थे और इसी राह पर चलकर सभी क्रांतिकारियों ने हर एक दिन आजादी में अपनी भूमिका निभाई  दोस्तों इन महान क्रांतिकारियों में देश को स्वतंत्रता दिलाने में देश के बंगाल प्रान्त के भी कई क्रांतिकारियों का अहम योगदान रहा था।

दोस्तों देश की इस आजादी में बंगाल प्रान्त का एक बड़ा योगदान था। जब भी आजादी के लिए जान देने की बात आती इस प्रान्त के क्रांतिकारी हमेशा देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने के लिए तैयार रहते थे। दोस्तों आज हम ऐसे  ही एक क्रांतिकारीके बारे में आपको बताने वाले है जो इसी प्रान्त से थे। इन्होने देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन गवा दिया था और जब तक उनकी सांसे चल रही थी वो देश को आजाद कराने के लिए ही चल रही थी। वो  महान क्रांतिकारी और देशभक्त है जतिंद्र मोहन. आगे जानते है इनके जीवन के बारे में.

जतिंद्र मोहन सेनगुप्त का आरंभिक जीवन | Early life of Jatindra Mohan Sengupta

इन महान क्रांतिकारी जतिंद्र मोहन सेनगुप्त का जन्म 22 फरवरी 1885 में बरमा गांव के एक जमींनदार परिवार में हुआ था। जतिंद्र मोहन का गांव बरमा ब्रिटिश भारत के चिट्टागोंग जिले में आता था। दोस्तों आज चिट्टागोंग बांग्लादेश का हिस्सा है। जतिंद्र मोहन के पिता का नाम  मोहन सेनगुप्त था इनके पिता एक वकील थे ये विधान परिषद के सदस्य भी थे।

जतिंद्र मोहन ने अपनी शिक्षा कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से की और कॉलेज की पढ़ाई पूर्ण करने के बाद जतिंद्र मोहन कानून की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड चले गए।

जब जतिंद्र मोहन पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए थे तब उनकी मुलाकात एडिथ एलेन ग्रे से हुई दोनों साथ में  कानून की पढ़ाई करते थे जतिंद्र मोहन और एडिथ एलेन ग्रे लंबे समय तक एक दूसरे के साथ रहे और दोनों शादी करने का फैसला किया और दोनों के शादी कर ली । शादी के बाद एडिथ एलेन ग्रे ने अपना नाम बदलकर नेल्ली सेनगुप्त रख लिया।

Jatindra Mohan Sengupta Biography In Hindi

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जतिंद्र मोहन सेनगुप्त के जीवन के प्रमुख कार्य | Major works of Jatindra Mohan Sengupta

इंग्लैंड से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जतिंद्र मोहन अपनी पत्नी के साथ भारत लोट आये। भारत आने के बाद जतिंद्र मोहन ने बैरिस्टर के रूप में काम करने की शुरुआत कर दी.

फरीदपुर में आयोजित हुए बंगाल प्रांतीय सम्मलेन में जतिंद्र मोहन ने चिट्टागोंग की और से प्रतिनिधित्व किया था । ये उनके राजनीतिक करियर की पहली शुरुआत थी। इस सम्मेलन के बाद जतिंद्र मोहन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। इन्होंने बर्मा आयल कंपनी की यूनियन कमेटी बनाने के लिए कंपनी के कर्मचारियों को इकट्ठा किया था।

साल 1921 में में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बंगाल रिसेप्शन समिति में जतिंद्र मोहन अध्यक्ष के लिए चयन हुआ था। उसी वर्ष बर्मा आयल कम्पनी के कर्मचारियों ने देश में हड़ताल की थी और उस समय जतिंद्र मोहन कर्मचारी यूनियन के सेक्रेटरी भी थे।

जतिंद्र मोहन ने असहकार आंदोलन में अपना योगदान देने के लिए अपने वकील का काम भी छोड़ दिया था। असहकार आंदोलन की अहम भूमिका में महात्मा गांधी थे। साल 1923 में जतिंद्र मोहन बंगाल विधानसभा के सदस्य नियुक्त हुए थे ।

साल 1925 में  चित्तरंजन दास मृत्यु होने के कारण बंगाल स्वराज पार्टी के अध्यक्ष पद रिक्त हो गया था बाद में जतिंद्र मोहन अध्यक्ष का पद दिया गया साथ ही जतिंद्र मोहन प्रांतीय कांग्रेस समिति  के अध्यक्ष भी बन गए थे।  जतिंद्र मोहन सेनगुप्त ने कलकत्ता के मेयर पद पर 10 अप्रैल 1929  से 29 अप्रैल 1930 तक काम किया था। देश के लोगो को अंग्रेजी शासन के खिलाफ भड़काने और देश में भारत -बरमा बॅटवारे  का विरोध के मामले में उन्हें 30 अप्रैल 1930  रंगून में आयोजित एक सभा से गिरफ्तार किया गया था।

जतिंद्र मोहन सेनगुप्त का अंतिम समय | Jatindra Mohan Sengupta 
Death

देश में हो रही राजनितिक गतिविधियों में जतिंद्र मोहन हमेशा सक्रिय रहते थे। इस कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। उन्हें जनवरी 1932 में गिरफ्तार किया गया गिरफ्तार कर उन्हें पुणे की जेल में बंदी बना कर रखा गया और बाद में उन्हें वहां से दार्जिलिंग में बंदी बना कर रखा गया वहां से उन्हें रांची भेजा गया इसी दौरान उनकी तबीयत खराब हो गई और 23 जुलाई 1933  को जब वो  रांची के जेल में में कैद थे तब उनका निधन हो गया।

दोस्तों जतिंद्र मोहन सेनगुप्त 1885-1933 में ऐसे पहले क्रांतिकारी थे। जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई थी।

जब जतिंद्र मोहन कानून की शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए थे । लेकिन जब वो इंग्लैंड से पढ़ाई कर वापस लोटे थे तब उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई अपने देश की सेवा करने में लगा दी। उस दौर किसी भी क्रांतिकारी को झूठे मामलो में फंसाकर अंग्रेजी हुकूमत जेल में डाल देती थी। और उन देशभक्तो को बचाना काफी जरुरी था।

और वो इन्हें अंग्रेजों के जुल्मों से बचाने के लिए उनका मुकदमा लड़ते थे । और उन्हें इन मामलो से बरी करवाते थे । जतिंद्र मोहन ने अपने क़ानूनी शिक्षा के ज्ञान से कई क्रांतिका को बचाया था और देश को आजाद कराने के लिए राजनीतिक तरीको से भी कोशिश करते रहे.

दोस्तों इस क्रन्तिकारी ने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा दिया और देश के सेवा करते करते उनकी जेल में ही मृत्यु हो गई थी।

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