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समाजसेवी ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय और समाज के लिए किये गए कार्य | Jyotiba Phule Biography in Hindi

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समाज में फैली बाल विवाह,छूआछूत ,जातिगत भेदभाव जैसी कुरीतियों से लड़ाई लड़ने वाले समाजसेवी ज्योतिबा फुले | Mahatma Jyotiba Phule In Hindi
अपना पूरा जीवन लोगो की हितो की लड़ाई लड़ने वाले ज्योतिबा फुले को 19वीं सदी के सबसे बड़े समाज सुधारक के रूप आज भी याद किया जाता है ज्योतिबा फुले एक महान समाज सुधारक तो थे ही साथ में एक क्रांतिकारी, एक अच्छे विचारक,लेखक, एक दार्शनिक भी थे
ज्योतिबा फुले ने अपना पूरा जीवनकाल समाजसेवा में बिताया उन्होंने समाज में फैली कई बड़ी कुरीतियों को खत्म करने की लड़ाई लड़ी समाज में होने बाल विवाह,छूआछूत ,जातिगत भेदभाव, साथ ही सती प्रथा का उन्होंने हमेशा विरोध किया महिलाओ को समाज में उनका अधिकार दिलाने और उनके हको मजबूत करने के लिए उनकी शिक्षा का समर्थन किया समाज में विधवा महिलाओ के पुर्नविवाह का समर्थन किया साथ ही देश में किसानो के के प्रति उनके हक़ की लड़ाई में उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया
दलितों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले मसीहा डॉ. भीमराव अंबेडकर जी भी ज्योतिबा फुले को अपना गुरु मानते थे दोस्तों आज हम स्टोरी टाइम्स के इस लेख के माध्यम से देश के सबसे बड़े समाज सेवी ज्योतिबा फुले के जीवन में किये गए महान कार्यो का उल्लेख इस लेख में करने वाले है तो चलिए इसकी शुरुआत करते है
समाजसेवी ज्योतिबा फुले का जन्म व परिवार - Mahatma Jyotiba Phule Birth And Family
समाज के हितो की लड़ाई लड़ने वाले 19 वी सदी के महान समाजसेवी ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल, साल 1827 महाराष्ट्र के सतारा जिले कटगुण गांव की पावन धरा पर एक माली परिवार में हुआ ज्योतिबा फुले का पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव गोन्हे,ज्योतिराव गोविंदराव फुले था
ज्योतिबा फुले का जन्म गरीब परिवार में हुआ इस वजह से उनका बचपन घर की आर्थिक तंगी के बीच गुजरा ज्योतिबा फुले का पिता का नाम गोविंदराव था और इनकी माता का नाम चिमणा बाई था ज्योतिबा फुले जब 1 साल के थे तब उनकी माता का देहांत हो गए है
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तब उनके पिता काफी दुखी हुए क्योकि उनका अब कोई सहारा नहीं था तब ज्योतिबा फुले का बचपन का साहरा बनी दाई सगुना बाई इन्होंने ज्योतिबा फुले को एक मा की तरह प्यार तरह दुलार कर बचपन में लालन पोषण किया दोस्तों ज्योतिबा फुले के परिवार के बारे में ऐसा कहा जाता है की उनका परिवार अपने घर का खर्च और आम जरूरतों की पूर्ति के लिए बाग बगीचों में माली का काम किया करते थे और घरो में जा कर फूलो की माला बेचते थे कहा जाता है की इसी वजह से इनका परिवार पीढ़ियों से "फुले " नाम से जाना जाता है
जातीय भेदभाव की वजह से निकाले गए स्कूल से
ज्योतिबा फुले जब 7 साल के थे तब उनकी शिक्षा के लिए उन्ही के गांव में स्कूल में दाखिला दिलाया गया तब उन्हें स्कूल में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा यही नहीं उनको इस वजह से उनको स्कूल से भी निकाल दिया गया
लेकिन दोस्तों ज्योतिबा फुले इस बात को लेकर कभी परेशान नहीं हुए वो इस बात से टूट नहीं ज्योतिबा फुले लक्ष्य के प्रति अडिग रहे और स्कूल से निकाले जाने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी उन्होंने अपनी दूसरी मा सगुना बाई के मद्द से अपनी पढ़ाई को जारी रखा
साल 1847 में उनके पढ़ाई के प्रति उनके हुनर और प्रतिभा को देखकर उनके घर के पास ही में रहने वाले उर्दू-फारसी के शिक्षक ने उनका दाखिला एक अंग्रेजी स्कूल में करवा दिया और यही से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण की
अपने जीवन पर बीती इन बातों के बाद ज्योतिबा फुले को आभास हुआ की शिक्षा के माध्यम से ही समाज के दलितों को न्याय दिलाया जा सकता है और इस तरीके के से इन्हें इनका हक़ दिलाया जा सकता है शिक्षा के प्रति उन्होंने अपने विचार भी प्रकट किये जो इस तरह है
"विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी।
नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया।
वित्त बिना शूद गये, इतने अनर्थ, एक अविद्या ने किये।।" - ज्योतिबा फुले
जातिगत भेदभाव और धर्म की इस दिवार तोडना चाहते थे
जातिगत भेदभाव के बीच अपने बचपन बिता चुके ज्योतिबा फुले धर्म और जातिगत के बीच रूढ़िवादी दिवार को गिराना चाहते थे
और समाज से इस भेदभाव को जड़ से खत्म करने के लिए ज्योतिबा फुले भगवन गौतम बुद्ध महान संत कबीर, संत दादू दयाल , संत तुकराम , और रामानंद के लिखे गए साहित्यो पर भी गहन अध्यन किया था
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ज्योतिबा फुले हिन्दू समाज में फैले अंधविश्वास जातिगत भेदभाव , की विरोधी थे
ज्योतिबा फुले समाज में फैली इन कुरूतियो को व्यक्ति के विकास में सबसे बड़ी बाधा मानते हे और समाज के बीच बनी इस जातिगत रूढ़िवादी दिवार को पूर्ण से समाज से उखाड़ फेकना चाहते थे और उनको इसमें सफलता भी मिली समाज में फैली कुरीतिया और उच्च जाती से निम्न जाती के लोगो के भेदभाव में भी सुधार आया और उनकी इसी पहल से देश को आज आधुनिक भारत के निर्माण में मदद हुई है
दलित गरीब और किसान के लिए किये काम - Public Work Mahatma jyotiba Phule
उस सदी में दलितों के साथ काफी बुरा बर्ताव होता था उन्हें किसी भी सावर्जनिक स्थल पर खुद से पानी पीने की अनुमति नहीं थी और इसी बात से गुस्सा हो कर उन्होंने दलितों को समाज में न्याय दिलाने की ठानी और उन्होंने दलितों के लिए पानी पीने के लिए अपने घर में एक कुआ खुदवाया उनकी इस पहल से उन्हें न्याय पालिका का अध्यक्ष बनाया गया बाद में उन्होंने दलितों के लिए सावर्जनिक स्थानों पर पानी की टंकिया लगवाई
ज्योतिबा फुले दलितों के साथ समाज में गरीब और असहाय लोगो की मदद के लिए "सत्यशोधक समाज" की उनकी इस पहल से प्रभावित होकर साल 1988 में उन्हें "महात्मा" की उपाधि भी दी गई
साथ ही उन्होंने देश के किसानो के लिए भी मांग उठाई और सभी मजदूरी करने वाले मजदूरों के लिए सप्ताह में 1 दिन की छुट्टी का मुद्दा उठाया
महिलाओ के हक़ की लड़ाई -बाल विवाह, सती प्रथा विरोध विधवा विवाह को दिया समर्थन
ज्योतिबा फुले ने समाज में हर वर्ग को सुधारने और उनके बीच पनप रही कुरूतियो को मिटाने में जीवन भर लगे रहे उन्होंने समाज में महिलाओ की दशा सुधारने के लिए उनको उनका हक़ दिलाने के लिए अनेक काम किये उन्होंने समाज में हो रहे बाल विवाह और सतीप्रथा का विरोध किया और विधवा विवाह का समर्थन किया इन्होंने साल 1871 में विधवा महिलाओ के लिए विधवा आश्रम भी खोला था
ज्योतिबा फुले की प्रमुख किताबें - Jyotiba Phule Books
- छत्रपति शिवाजी
- किसान का कोड़ा,
- तृतीय रत्न,
- ब्राह्मणों का चातुर्य,
- अछूतों की कैफियत
- राजा भोसला का पखड़ा,
महात्मा ज्योतिबा फुले का अंतिम समय - Jyotiba Phule Death
अपने जीवन के अंतिम क्षणों महात्मा ज्योतिबा फुले को पैरालिसिस हो गया जिस वजह से उनके शरीर में काफी कमजोरी आ गई जीवन के 63 साल जीने के बाद 28 नवंबर 1890 को पुणे में उनका निधन हो गया
दोस्तों आज भी उनके द्वारा किसान दलित वंचित , शोसित लोगो के लिए जो जीवन भर काम किया था उनके इस कार्य के लिए देश आज भी उन्हें देश के सबसे बड़े समाज सुधारक के रूप में पूजते है देश उनके इस बलिदान को हमेशा याद रखेगा - धन्यवाद
समाजसेवी ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय और समाज के लिए किये गए कार्य | Jyotiba Phule Biography in Hindi




