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पन्ना धाय के बलिदान की कहानी | Panna Dai Story In Hindi

पन्ना धाय के बलिदान की कहानी | Panna Dai Story In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-2 months ago
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मेवाड़ के वंशज उदयसिंह के प्राणो की रक्षा के लिए पुत्र बलिदान देने वाली पन्ना धाय | Panna Dai History In Hindi

मेवाड़ की धरती वीर सुरों के बलिदान की कहानियो से जानी जाती है अपने कर्म धर्म और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए कई वीरो ने इस धरती को अपने बलिदान से सींचा है उन्हीं में से एक थी मेवाड़ के राजा उदय सिंह की धाय माँ पन्ना धाय. पन्ना धाय ने उदय सिंह की माँ कर्णावती के वचनो को निभाते हुए उनकी मृत्यु के बाद एक बड़े बलिदान के साथ उदयसिंह की परवरिश की.

जिस तरह मारवाड़ को वीरो की भूमि के रूप जाना जाता है सूरवीरो के बलिदान महाराणा प्रताप का की वीरता की तरह इस मारवाड़ की धरती स्मरण होता है उसी तरह पन्ना धाय को भी उनके बलिदान के लिए याद किया जाता है इन्होंने अपनी स्वामी भक्ति के वचनो को निभाते हुए उदयसिंह के प्राणो की रक्षा के लिए अपने पुत्र चंदन का बलिदान दे दिया था अपना सब कुछ स्वामी की वचनों को पर न्योछावर कर दिया वीरो की भूमि में इस वीरांगना पन्ना धाय का जन्म केसरी गांव में हुआ था

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पन्ना धाय के पिता का नाम हरचंद हांकला था जो एक साहसी योद्धा थे इन्होंने राजा राणा संग्राम के साथ कई युद्धों में भाग लिया हरचंद हांकला राणा संग्राम की सेना में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे हरचंद हांकला एक सवामी भक्त और राष्ट्र भक्ति के गुनी और एक सच्चे योद्धा उनकी पुत्री का धायमाता बनाना एक वीर योद्धा के लिए सबसे बड़ी स्वामी भक्ति थी जब रानी कर्णवती के गर्भ से उदयसिंह का जन्म हुआ था तब से उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था और बीमार रहने लगी तब रानी कर्णवती के हालात को देख पन्ना धाय को को उदयसिंह की धाय माँ बनाया गया पन्ना धाय ने अपने इस कर्तव्य को एक वीरांगना की तरह निभाया और साबित कर दिया की वो भी जन्म से एक शेरनी है गुर्जर जाति से होने के बावजूद अपने स्वामी के कर्तव्यों को हर परिस्थिति में बड़ी निष्ठा से निभाया 

मेवाड़ के राजा राणा संग्राम के वीर योद्धा थे लेकिन उनमे मित्र को शत्रु को परखने की अच्छी परख नहीं थी राणा संग्राम दरबार में अपनी तारीफ सुन किसी पर भी जल्द विश्वास कर लेते थे और उनकी इस दयालुता और भोलेपन का फायदा उठाते हुए उनके साथ उनके एक दुश्मन ने छलावा किया उसका नाम था बनबीर वो मेवास दरबार में एक दासी का पुत्र था और वो छल के साथ चित्तोड़ की गद्दी को हासिल करना चाहता था और अपने इसी मकसद से उसने राणा संग्राम के कई वंशजो की बारी बारी हत्या कर दी

धीरे धीरे वो अपने मकसद में सफल हो रहा था एक दिन रात्रि वो महाराजा विक्रमादित्य को मारकर उदयसिंह को मौत की नींद सुलाने के मकसद से महल में चला गया क्योकि उदयसिंह एकमात्र चित्तोड़ का वंसज था जो अब जिन्दा था लेकिन इस बात की खबर पन्ना धाय को लग गई पन्ना धाय उदयसिंह को बनबीर के कहर से बचाना चाहती थी तब उन्होंने उदयसिंह को उठाकर एक बांस की टोकरी में लेता दिया और ऊपर से उनको जुठी  पत्तलों से ढक दिया और महल के उनके एक विश्वासी दरबारी के साथ उनको महल से बाहर भेज दिया पन्ना की आखों में धूल झोकने के लिए पन्ना धाय ने उदयसिंह के पलग पर अपने पुत्र को लेटा दिया जैसे ही बनबीर तेज धार की तलवार के साथ कक्ष में प्रवेश हुआ तब उन्होंने पलग की और इशारा कर दिया जिस पलग पर उदयसिंह की जगह उन्होंने अपने पुत्र चंदन को सुलाया था बनबीर ने उसे उदयसिंह समझकर मौत के घाट उतार दिया

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दूसरी और पन्ना धाय अपने स्वामी कर्तव्य को निभाते हुए अपने पुत्र का बलिदान दे दिया और सारा माजरा देखती रही लेकिन उन्होंने अपनी आखों से एक भी आंसू नहीं निकलते दिया क्योंकि यदि इस बात की खबर बनबीर को लग जाती तो सब उल्ट हो जाता बनबीर के जाने के उन्होंने अपने मरे पुत्र को चूमा और उदयसिंह की रक्षा के लिए उनको सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए महल से निकल गई दोस्तों स्वामी भक्ति को निभाने के लिए पन्ना धाय ने अपने जिगर के टुकड़े का बलिदान कर दिया और एक स्वामिभक्ति का परिचय दिया और मेवाड़ की एकलौते शासक उदयसिंह की प्राणो की रक्षा की

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महल से निकलने के बाद वो उदयसिंह को लेकर कई एक आसरे के लिए निकल पड़ी लेकिन वो महीनो तक उदयसिंह को लेकर कई दरबारों में भटकी लेकिन क्रूर बनबीर के भय से किसी ने पन्ना धाय को शरण नहीं दी इस दौरान उन्होंने कई राजद्रोहियों की नजर से उदयसिंह की रक्षा की आखिर में उन्हें कुम्भलगढ़ में आश्रय मिला उदयसिंह इसी किले में बड़े हुए और एक किलेदार के रूप में सेवक भी बने जब उदयसिंह की आयु 13 साल थी तब मेवाड़ के उमराओ ने उदयसिंह को अपना राजा मान लिया और उनका राज्याभिषेक कर दिया साल 1542 में वो मेवाड़ के महाराणा बन गए

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