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अंग्रेजो के खिलाफ सेना बनाकर पहली लड़ाई लड़ने वाली रानी चेन्नम्मा | Kittur Rani Chennamma In Hindi

अंग्रेजो के खिलाफ सेना बनाकर पहली लड़ाई लड़ने वाली रानी चेन्नम्मा | Kittur Rani Chennamma In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-8 months ago
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राजाओ और महाराजो के इतिहास को जब भी याद किया जाता है तब उनमे कई साहसिक रानियों की गाथाएं भी मिलती है जिनके राष्ट्र पर जोखिम आने पर कई बड़े योगदान शामिल है और इस लिस्ट में आज हमने रानी चेन्नम्मा का इतिहास आज खोल दिया है रानी चेन्नम्मा जो भारत के कर्णाटक कित्तूर राज्य  की रानी थी दोस्तों रानी चेन्नम्मा को सन 1824 में अंग्रेजो के खिलाफ पहली बार एक सेना बना कर लड़ने वाली रानी के रूप में आज भी जाना जाता है रानी चेन्नम्मा साहसिक शक्ति वाली नारी थी उन्होंने दो बार अंग्रेजी सेना को धूल भी चटाई और आज देश में रानी चेन्नम्मा को देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले पहले शासक के रूप में भी जाना जाता है

रानी चेन्नम्मा का इतिहास कर्नाटक दक्षिण भारत उसी स्थान से जहां से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई  का स्वतंत्रता संग्राम से इतिहास जुड़ा है इन्होंने अपनी सेना के साथ अंग्रेजो से लोहा लिया था और स्वतंत्रता के इसी संघर्ष के दौरान वो वीरगति को भी प्राप्त हुई थी दोस्तों रानी चेन्नम्मा अंग्रेजो के चलाये गए " कपा कर " के खिलाफ जंग लड़ने वाली पहली महिला थी उनके इस संघर्ष को आज भी कित्तूर में हल साल 22-24 अक्टूबर में एक त्यौहार के रूप में मनाया जाता है

Kittur Rani Chennamma In HindiSource clipground.com

स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ने में पहली शासक रानी चेन्नम्मा का जन्म भारत के कर्णाटक राज्य के बिलगावी जिले में 23 अक्तूबर 1778 ई को काकटि ग्राम में हुआ था चेन्नम्मा दक्षिणी भारत के कर्णाटक के राज्य कित्तूर की रानी थी जब देश अंग्रेजो की कैद में था तब कित्तूर जो मैसूर के उत्तर है वो स्वतंत्र राज्य था रानी  चेन्नम्मा का यह राज्य काफी विकसित और धनवान था राज्य में  हीरे-जवाहरात के बाजार थे दूर राज्यों से व्यापारी इस राज्य में आकर व्यापार करते थे जब रानी चेन्नम्मा अपनी युवावस्था में थी तभी उन्होंने घुड़ सवारी तलवारबाजी , और तीरंदाजी का हुनर सीख लिया था उनका विवाह अपने पड़ोसी राज्य के देसाई परिवार के राजा मल्लासर्ज से हुआ

विवाह के पश्चात रानी चेन्नम्मा के जीवन में एक बड़ा संकट आ गया और शादी के कुछ दिन बाद ही उनके पति का निधन हो गया उनके एक संतान हुई उसका का भी निधन हो गया और तब उनके सामने राज्य की गद्दी को संभालने का सबसे बड़ा संकट उनके सामने खड़ा हो गया कित्तूर राज्य का शासक कोई नहीं था और इस गद्दी को उत्तराधिकारी देने के लिए रानी चेन्नम्मा एक पुत्र गोद लिया उनके इस फैसले को अंग्रेजो ने स्वीकार नहीं किया ऐसा माना जाता है की अंग्रेजो और रानी चेन्नम्मा के बीच लड़ाई का यह पहला कारण था 

उस दूर में में कर्नाटक समेत पूरा भारत अंग्रेजो के अधीन था  तब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के गर्वनर लॉर्ड डलहौजी ने के फरमान जारी किया जिसका नाम था "गोद निषेध" यानी जिन भी राजवंशो की खुद की संतान नहीं है और वो गोद ले कर किसी को गद्दी पर बैठा रहे है तो वो निषेध है

देश की इस छोटे से राज्य पर कित्तूर पर राजगदद्दी के बारे में जानकारी लगी क्योंकि कित्तूर एक संपन राज्य था इसके चलते बिट्रिश सरकार इससे इनकार कर दिया और इस राज्य को अपने अधीन करने की ठान ली बिट्रिश सरकार ने कित्तूर राज्य का आधा हिस्सा देने का लालच देकर कर्णाटक राज्यों के कुछ देशद्रोहियों को अपने में शामिल कर लिया जब इस बात की खबर रानी चेन्नम्मा को लगी तब उन्होंने अंग्रेजो को साफ शब्दों में कहा की यह उनके राज्य का मामला इसमें आप दखलअंदाजी ना करें साथ ही रानी ने अपने प्रजा को आश्वासन दिया की जब तक मेरी रगों में खून दौड़ रहा है तब तक कित्तूर राज्य को अंग्रेजो को राज्य घुसने नहीं देखीं

Kittur Rani Chennamma In Hindi

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रानी चेन्नम्मा ने कित्तूर में बिट्रिश सरकार की नापाक हरकतों को देखते हुए बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गवर्नर को एक संदेश भिजवाया लेकिन उनके इस संदेश का बिट्रिश सरकार ने कोई जबाब नहीं दिया तब रानी चेन्नम्मा ने सोचा की अब यह अंग्रेज मानने वाले नहीं है और तब उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष करने की ठान ली दोस्तों रानी चेन्नम्मा वो पहली रानी थी जिन्होंने अपने राज्य की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सेना का गठन किया था जब इस बात की भनक अंग्रेजो को लगी तो वर्ष 1824  ने अंग्रेजो ने 200000 सैनिक और 400 से ज्यादा बंदूक धारी सेना कित्तूर पर हमला करने के लिए भेज दी

युद्ध के लिए रानी चेन्नम्मा ने पहले से ही तैयारी कर ली थी दोनों सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया युद्ध के पहले दिन अंग्रेजी सेना को भरी नुकसान हुआ इस दौरान बिट्रिश सेना के कलेक्टर और राजनैतिक एजेंट जॉन थावकेराय को मार दिया गया रानी चेन्नम्मा का मुख्य साथ  बलप्पा इस युद्ध में अंग्रेजी सेना पर कहर बन कर टूट पड़ा उसे अंग्रेजी सेना के दो बड़े अधिकारियो को बंधी बना लिया लेकिन बाद में बिट्रिश सरकार के साथ संधि होने के कारण उन्हें छोड़ दिया गया और युद्ध को रोक दिया लेकिन दूसरी और ब्रिटिश अधिकारी चैपलिन ने युद्ध को जारी रखा

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और अंग्रेजो ने मद्रास और मुंबई से सेना की टुकड़िया बुला कर फिर से कित्तूर किले की घेराबंदी कर दी लेकिन कित्तूर की सेना के साहस के कारण अंग्रेजी सेना को फिर पीछे भागना पड़ा युद्ध रुका नहीं और अंग्रेज 2 दिन बाद फिर से आ गए लगातार चल रहे युद्ध में कित्तूर के कई साहसी सैनिक बलिदान दे छूके थे लेकिन बचें हुए सेनिको के साथ फिर चेन्नम्मा ने अंग्रेजो की विशाल सेना का सामना किया लेकिन इस बार उनके सैनिक काफी हारे थके थे और अंग्रेजो ने बैल्होंगल किले पर अपना आधिपत्य जमा लिया कित्तूर की रानी चेन्नम्मा 21 फरवरी 1829 को शहीद हो गई और उनके साथियो को अंग्रेजो ने पकड़कर फांसी पर लटका दिया और पुरे कित्तूर राज्य को लूट लिया

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