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जीवन का अर्थ समझाने वाले कबीर के दोहे अर्थ सहित | Couplets of Kabir in Hindi

By yuvraj / About :-8 years ago

कबीर दास के 10 प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित | Couplets of Kabir Das in Hindi

कबीर दास जी इस दोहे के द्वारा यह समझाने कि कोशिश कर रहे हैं कि गुरु का सही महत्व क्या है जीवन में। वह इस बात को भी बताना चाहते हैं कि ईश्वर और गुरु में आपको पहले स्थान पर किसे रखना चाहिए और चुनना चाहिए। इस बात को समझाते हुए कबीर जी कहते हैं गुरु ही वह है जिसने आपको ईश्वर के महत्व को समझाया है और ईश्वर से मिलाया है इसलिए गुरु का दर्ज़ा इस संसार में हमेशा ऊपर होता है।

#1

मनहिं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होइ ।
पाणी मैं घीव नीकसै, तो रूखा खाई न कोइ ॥

अर्थ: मन की इच्छा छोड़ दो.उन्हें तुम अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते. यदि जल से घी निकल आवे, तो रूखी रोटी कोई भी न खाएगा!

#2

कबीर संगति साध की , कड़े न निर्फल होई ।
चन्दन होसी बावना , नीब न कहसी कोई ॥

अर्थ: कबीर कहते हैं कि साधु  की संगति कभी निष्फल नहीं होती. चन्दन का वृक्ष यदि छोटा भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा. वह सुवासित ही रहेगा और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा. अपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा |

#3

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि न माया मरती है और न ही मन में आने वाले ये हजारो- लाखो चंचल विचार मरते हैं परन्तु ये शरीर पता नही कितनी बार मर चुका है लेकिन फिर भी मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती |

#4

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ॥

अर्थ: संत कबीरदासजी अपने दोहे में कहते हैं की मनुष्य का यह स्वभाव होता है की वो दुसरे के दोष देखकर और ख़ुश होकर हंसता है। तब उसे अपने अंदर के दोष दिखाई नहीं देते. जिनकी न ही शुरुवात हैं न ही अंत।

#5

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं उच्च ज्ञान पा लेने से कोई भी व्यक्ति विद्वान नहीं बन जाता, अक्षर और शब्दों का ज्ञान होने के पश्चात भी अगर उसके अर्थ के मोल को कोई ना समझ सके और ज्ञान की करुणा को ना समझ सके तो वह अज्ञानी है, परन्तु जिस किसी नें भी प्रेम के ढाई अक्षर को सही रूप से समझ लिया हो वही सच्चा और सही विद्वान है।

#6

रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय ।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥

अर्थ: रात सो कर बिता दी,  दिन खाकर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की – कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया – इससे दुखद क्या हो सकता है ?

#7

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि न तो ज्यादा बोलना अच्छा होता है और न ही ज्यादा चुप रहना अच्छा होता है | जैसे न तो जरूरत से ज्यादा वर्षा का होना ठीक होता है और न ही जरूरत से ज्यादा धूप का निकलना अच्छा होता है |

#8

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोये
एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंदूंगी तोय ॥

अर्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है, तू क्या मुझे गुन्देगा मुझे अकार देगा, एक ऐसा दिन आयेगा जब मै तुम्हें रौंदूंगी। यह बात बहुत ही जानने और समझने कि बात है इस जीवन में चाहे जितना बड़ा मनुष्य हो राजा हो या गरीब हो आखिर में हर किसी व्यक्ति को मिट्टी में मिल जाना है।

#9

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

अर्थ:  कबीर दास जी कहते हैं सभी लोग दुःख में भगवान् को याद करते हैं, परन्तु सुख के समय कोई भी भगवन को याद नहीं करता। अगर सुख में प्रभु को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों ?

#10

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ॥

अर्थ:  इस दोहे में कबीर दास जी नें एक बहुत ही अच्छी बात लिखी है, वे कहते हैं जब में पुरे संसार में बुराई ढूँढने के लिए निकला मुझे कोई भी, किसी भी प्रकार का बुरा नहीं मिला। परन्तु जब मैंने स्वयं को देखा को मुझसे बुरा कोई नहीं मिला। कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति अन्य लोगों में गलतियाँ ढूँढ़ते हैं वही सबसे ज्यादा गलत और बुराई से भरे हुए होते हैं।

जीवन का अर्थ समझाने वाले कबीर के दोहे अर्थ सहित | Couplets of Kabir in Hindi