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खुदीराम बोस की जीवनी | Khudiram Bose Biography In Hindi

By N.j / About :-8 years ago

युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस की जीवनी | All About Khudiram Bose Biography In Hindi

  • नाम -  खुदीराम बोस
  • जन्म - 3 दिसंबर 1889
  • जन्म स्थान - मिदनापुर पश्चिम बंगाल
  • पिता का नाम - त्रिलोक्यानाथ  बोस
  • माता का नाम - लक्ष्मीप्रिय देवी
  • शिक्षा - तमलुक हैमिल्टन हाई स्कूल, मिदनापुर कॉलेजिएट स्कूल
  • प्रमुख योगदान - भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, क्रांतिकारी
  • मृत्यु - 11 अगस्त 1908 (18 वर्ष की आयु), कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत (मुजफ्फरपुर में जज पर बम फेंकने के आरोप में फांसी दे दी गई  )

भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास महान वीरों और उनके सैकड़ों साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है। ऐसे ही क्रांतिकारियों की सूची में एक नाम खुदीराम बोस का है। खुदीराम बोस एक भारतीय युवा क्रांतिकारी थे जिनके बलिदान ने ने सम्पूर्ण देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी। खुदीराम बोस देश की आजादी के समय उम्र मात्र 19 साल थी इस उम्र में फाँसी पर चढ़ गये। इस वीर पुरुष की शहादत से सम्पूर्ण देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी। इनके वीरता को अमर करने के लिए गीत लिखे गए और इनका बलिदान लोकगीतों के रूप में देश में मुखरित हुआ। खुदीराम बोस के सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जो बंगाल में लोक गीत के रूप में प्रचलित हुए।

खुदीराम बोस का बचपन व परिवार

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 ई. को बंगाल में मिदनापुर ज़िले के हबीबपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम त्रिलोक्यानाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिय देवी था। खुदीराम बोस के सिर से माँ- बाप का साया छोटी सी उम्र में ही उतर गया इसलिए उनका लालन-पालन उनकी बड़ी बहन ने किया। उनके मन में देशभक्ति की भावना इतनी प्रबल थी कि उन्होंने स्कूल के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। सन 1902 और 1903 के दौरान अरविंदो घोष और भगिनी निवेदिता ने मेदिनीपुर में कई जन सभाएं की और क्रांतिकारी समूहों के साथ भी गोपनीय बैठकें आयोजित की। खुदीराम भी अपने शहर के उस युवा वर्ग में शामिल थे जो अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन में शामिल होना चाहता था। खुदीराम प्रायः अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद(Imperialism) के ख़िलाफ़ होने वाले जलसे-जुलूस में शामिल होते थे तथा नारे लगाते थे। उनके मन में देश प्रेम इतना कूट-कूट कर भरा था कि उन्होंने 9 कक्षा के पूर्ण होते ही पढ़ाई छोड़ दी और देश की आजादी में मर-मिटने के लिए जंग-ए-आज़ादी में कूद पड़े।

खुदीराम बोस क्रांतिकारी सफ़र

20 वी शदी के प्रारंभ में स्वाधीनता आन्दोलन की प्रगति को देख अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन की चाल चली जिसका घोर विरोध हुआ। इसी दौरान सन् 1905 ई. में बंगाल विभाजन के बाद खुदीराम बोस स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपना क्रांतिकारी जीवन सत्येन बोस के नेतृत्व में शुरू किया था। मात्र 16 साल की उम्र में उन्होंने पुलिस स्टेशनों के पास बम रखा और सरकारी कर्मचारियों को निशाना बनाया। वह रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हो गए और ‘वंदेमातरम’ के पर्चे वितरित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन 1906 में पुलिस ने बोस को दो बार पकड़ा – 28 फरवरी, सन 1906 को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बांटते हुए बोस पकडे गए पर पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रहे। इस मामले में उन पर राजद्रोह(Treason) का आरोप लगाया गया और उन पर अभियोग चलाया परन्तु गवाही न मिलने से खुदीराम निर्दोष छूट गये। दूसरी बार पुलिस ने उन्हें 16 मई को गिरफ्तार(Arrested) किया पर कम आयु होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। 6 दिसंबर 1907 को खुदीराम बोस ने नारायणगढ़ नामक रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गवर्नर  बच गया । वर्ष 1908 में उन्होंने वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर नामक दो अंग्रेज अधिकारियों(officials) पर बम से हमला किया लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया और वे बच गए।

किंग्सफोर्ड की हत्या का प्लान

देश में बंगाल के विभाजन विरोध में लाखों लोग सडकों पर उतर आये उनमे से कई भारतीयों को उस समय कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। किंग्सफोर्ड की नजर खास तोर से उन क्रान्तिकारियों पर रहती थी और वो उन्हें भारी सजा से दण्डित करता था अंग्रेजी हुकुमत ने किंग्सफोर्ड के कार्य से खुश होकर उसकी पदोन्नति कर दी और मुजफ्फरपुर जिले में सत्र न्यायाधीश(Judge) बना दिया। क्रांतिकारियों ने किंग्सफोर्ड को मारने का निश्चय किया और इस कार्य के लिए चयन हुआ खुदीराम बोस और प्रफुल्लकुमार चाकी का। मुजफ्फरपुर पहुँचने के बाद इन दोनों ने किंग्सफोर्ड के बँगले और कार्यालय की निगरानी की। 30 अप्रैल 1908 को चाकी और बोस बाहर निकले और किंग्सफोर्ड  के बँगले के बाहर खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे। खुदीराम ने अँधेरे में ही आगे वाली बग्गी(Buggy) पर बम फेंका पर उस बग्गी में  किंग्सफोर्ड नहीं बल्कि दो यूरोपियन महिलायें थीं जिनकी मौत हो गयी। अफरा-तफरी के बीच दोनों वहां से नंगे पाँव भागे। भाग-भाग कर थक गए खुदीराम वैनी रेलवे स्टेशन पहुंचे और वहां एक चाय वाले से पानी माँगा पर वहां मौजूद  police वालों को उन पर शक हो गया और बहुत मशक्कत के बाद दोनों ने खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया। 1 मई को उन्हें स्टेशन से मुजफ्फरपुर लाया गया। उधर प्रफ्फुल चाकी भी भाग-भाग कर भूक-प्यास से तड़प रहे थे। 1 मई को ही त्रिगुनाचरण नामक ब्रिटिश सरकार में कार्यरत एक आदमी ने उनकी मदद की और रात को ट्रेन में बैठाया पर रेल यात्रा के दौरान British police में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर को शक हो गया और उसने मुजफ्फरपुर पुलिस को इस बात की जानकारी दे दी। जब चाकी हावड़ा के लिए ट्रेन बदलने के लिए मोकामाघाट स्टेशन पर उतरे तब पुलिस पहले से ही वहां मौजूद थी। अंग्रेजों के हाथों मरने के बजाए चाकी ने खुद को गोली मार ली और शहीद हो गए।

खुदीराम की गिरफ्तारी व फांसी

खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया और फिर फांसी की सजा सुनाई गयी। 11 अगस्त सन 1908 को उन्हें फाँसी दे दी गयी। उस समय उनकी उम्र मात्र 18 साल और कुछ महीने थी। खुदीराम बोस इतने निडर थे कि हाथ में गीता लेकर ख़ुशी-ख़ुशी फांसी चढ़ गए।

खुदीराम बोस की जीवनी | Khudiram Bose Biography In Hindi