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राजा पोरस का जीवन एवं इतिहास | All About of King Porus in Hindi

राजा पोरस का जीवन एवं इतिहास | All About of King Porus in Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-12 months ago
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राजा पोरस का जीवन एवं इतिहास | All About of King Porus in Hindi

राजा पुरुवास या राजा पोरस का राज्य पंजाब में झेलम से लेकर चेनाब नदी तक फैला हुआ था। वर्तमान लाहौर के आस-पास इसकी राजधानी थी। राजा पोरस पोरवा राजवंश के वशंज थे, जिनका साम्राज्य पंजाब में झेलम और चिनाब नदियों(rivers) तक और उपनिवेश ह्यीपसिस तक फैला हुआ था।

Life and history of King Porusvia : ytimg.com

राजा पोरस और सिकन्दर की कहानी(story) काफी मशहूर है जिसे ना केवल ऐतिहासिक(Historic) लेखो में बल्कि लोगो की जुबान पर भी इनके बीच हुए युद्ध की कहानी याद है | यूनानी इतिहास में ना केवल सिकन्दर की बहादुरी की प्रशंसा है बल्कि पोरस की प्रशंसा भी की गयी है | आइये आज हम आपको उस महान राजा पोरस की जीवनी से परिचय करवाते है |

Life and history of King Porusvia : amarujala.com

राजा पोरस पौरवो का राजा था जिनका साम्राज्य झेलम और चिनाब नदी के बीच फैला हुआ था | पौरवो का उद्गम महाभारत काल का माना जाता है | जो राजा चन्द्र वंश निकले वो चन्द्रवंशी कहलाये थे | ययाति नामक एक राजा इसी प्रकार का एक चन्द्रवंशी राजा था जिसके दो पुत्र थे पुरु और यदु | पुरु के वंशज पौरव कहलाये और यदु के वंशज यादव कहलाये | इसलिए राजा पोरस एक चन्द्रवंशी राजा था जो ययाति का वंशज था | चन्द्रवंशी होने के कारण उसका पराक्रम और बल अकल्पनीय था | पौरव ही वो शासक थे जिन्होंने फारसी राजाओ डेरियस और जरक्सीज को युद्ध में पराजित किया था | साइरस दा ग्रेट महान युद्धों में भारतीय योद्धाओ के साथ युद्ध करते हुए मारा गया था |

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महायुद्ध के दौरान सिकन्दर की रणनीति और पोरस की बहादुरी

सिकंदर जानता था कि पोरस जैसे पराक्रमी राजा को हराना(beat) इतना आसान नहीं है। इसलिए उसने चालाकी से काम लिया। झेलम नदी(river) के किनारे पर उसने अपनी सेना खड़ी कर दी और ऐसा दिखावा करने लगा मानो वे लोग नदी पार करने का रास्ता ढूंढ रहे हों। कई दिन इस तरह बीतने पर पोरस के पहरेदार कुछ कम चौकन्ने हो गए। इसी बीच सिकन्दर नदी(river) की दिशा में करीब 17 मील ऊपर हज़ारों सैनिकों और घुड़सवारों के साथ नदी पार कर गया।.

Life and history of King Porusvia : rochhak.com

पोरस की सेना अभी भी यही मान रही थी कि सिकन्दर नदी(river) पार करने का रास्ता ढूंढ रहा है जबकि सिकन्दर(Alexander) दूसरी और से खुद उनके समीप(Near) पहुँच चुका था। अचानक हुए हमले से पोरस की सेना घबरा(Nervous) गयी लेकिन फिर भी उन्होंने कड़ा मुकाबला किया।

बारिश के कारण पोरस के रथ मिट्टी वाली ज़मीन पर सहजता(Easiness) से आगे नहीं बढ़ पा रहे थे और कीचड़ में धसे जा रहे थे। लेकिन पोरस की सेना में शामिल हाथियों ने सिकन्दर की सेना के पसीने छुड़ा दिए और पोरस की सेना को संभलने का मौका मिल गया। पर इसी बीच नदी के उस पार इंतज़ार करने का नाटक कर रहे सिकन्दर के सेनिको ने भी नदी(river) पार कर हमला बोल दिया।

लड़ाई 

सिन्धु और झेलम को पार किए बगैर पोरस के राज्य में पैर रखना मुश्किल था। राजा पोरस अपने क्षेत्र(area) की प्राकृतिक स्थिति, भूगोल और झेलम नदी की प्रकृति से अच्छी तरह वाकिफ थे। महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। पुरु ने इस बात का पता लगाने की कोशिश नहीं की कि यवन सेना की शक्ति का रहस्य क्या है? यवन सेना का मुख्य बल उसके द्रुतगामी(Quickgoing) अश्वारोही तथा घोड़ों पर सवार फुर्तीले तीरंदाज थे।

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इतिहासकार मानते हैं‍ कि पुरु को अपनी वीरता और हस्तिसेना पर विश्वास था लेकिन उसने सिकंदर को झेलम नदी पार करने से नहीं रोका और यही उसकी भूल थी। लेकिन इतिहासकार यह नहीं जानते है कि झेलम नदी(river) के इस पार आने के बाद सिकंदर बुरी तरह फंस गया था, क्योंकि नदी पार करने के बाद नदी में बाढ़ आ गई थी।

जब सिकंदर ने आक्रमण किया तो उसका गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने स्वागत किया और आम्भी ने सिकंदर की गुप्त रूप से सहायता की। आम्भी राजा पोरस को अपना दुश्मन समझता था। सिकंदर ने पोरस के पास एक संदेश भिजवाया जिसमें उसने पोरस(poras) से सिकंदर के समक्ष समर्पित करने की बात लिखी थी, लेकिन पोरस ने तब सिकंदर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

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जासूसों और धूर्तताके बल पर सिकंदर के सरदार युद्ध जीतने के प्रति पूर्णतः विश्वस्त थे। राजा पुरु के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर सिकंदर ने झेलम पार की। राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी 7 फुट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली(Powerful) गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े। पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे ll

भारतीयों के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों भी मार गिरा सकता था। इस युद्ध(War) में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली। सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए। यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया। कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा(risk) नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है l राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन(land) पर गिरा दिया l ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था l

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सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए सामने खड़ा था l सिकंदर बस पलभर का मेहमान था कि तभी राजा पुरु ठिठक गया l यह डर नहीं था, शायद यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, बहरहाल तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहां से भगा ले गए l और इस तरह सिकंदर अपना इकलौता और आखरी युद्ध हार गया l पोरस महान द्वारा सिकंदर को इतनी क्षति पहुंचाई गई की सिकंदर वापस अपने घर जाते समय बिच बेबीलोन में ही मर गया l

पृष्ठभूमि

पोरस पर उपलब्ध एकमात्र जानकारी यूनानी स्रोतों से है इतिहासकारों ने हालांकि तर्क दिया है कि उनके नाम और उनके डोमेन के स्थान पर आधारित पोरस को ऋगवेद में उल्लेखित पुरू जनजाति के वंशज होने की संभावना थी। इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद ने कहा कि पोरस यदुवंशी शोरसेनी हो सकता था। उन्होंने तर्क दिया कि पोरस के मोहरा सैनिकों ने हेराकल्स का एक बैनर जिसे मेगस्थनीस ने देखा था, जो पोरस के बाद भारत की यात्रा पर चन्द्रगुप्त द्वारा मथुरा के शोरसैनियों के साथ स्पष्ट रूप से पहचाने गए थे।

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मेगास्थनीस और एरियन के हेराकल्स कुछ विद्वानों द्वारा कृष्ण के रूप में और अन्य लोगों(people) द्वारा उनके बड़े भाई बलदेव के रूप में पहचाने गए हैं, जो शोरसेनीस के पूर्वजों और संरक्षक देवताओं दोनों थे। इशहरी प्रसाद और अन्य, उनकी अगुवाई के बाद, इस निष्कर्ष का अधिक समर्थन इस तथ्य में पाया गया कि शोरसेनियों का एक हिस्सा कृष्णा के निधन के बाद पंजाब और आधुनिक अफगानिस्तान से मथुरा और द्वारका के लिए पश्चिम(West) की ओर पलायन कर रहा था और वहां नए राज्य स्थापित किए थे।

मृत्यु

अगर हम पोरस को राजा पर्वतक ही समझे तो उसकी मृत्यु एक विषकन्या द्वारा हुई थी। और कुछ इतिहासकार यह बताते हैं कि सिकंदर के एक खास सेनानायक यूदोमोस ने राजा पोरस को 321 ईसा पूर्व से 315 ईसापूर्व समयकाल में कत्ल कर दिया था l इसके अलावा एक तर्क यह भी है की चन्द्रगुप्त मौर्य के करीबी आचार्य चाणक्य ने पोरस की हत्या करवा दी थी। ताकि वह आगे चल कर उनके विजय अभियान(campaign) में रोड़ा ना बन सके। पोरस नाम के महान योद्धा के जीवन प्रसंग भले ही संदेह और रहस्य से भरपूर हों, पर उनकी वीरता(Valor) पर कोई संदेह नहीं कर सकता है।