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बिरसा मुंडा का जीवन परिचय | Life Story Of Birsa Munda In Hindi

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बिरसा मुंडा का जीवन परिचय एवं इतिहास | Life Story of Birsa Munda in Hindi
- नाम - बिरसा मुंडा
- बिरसा मुंडा का जन्म - 15 जून 1875
- जन्म भूमि - राँची, झारखण्ड
- पिता का नाम - सुगना मुंडा
- माता का नाम - कर्मी हटू
- प्रसिद्धि का कारण - क्रांतिकारी
- आंदोलन- भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
- विशेष योगदान - बिरसा मुंडा ने अनुयायियों को संगठित करके दो दल बनाए। एक दल मुंडा धर्म का प्रचार करता था और दूसरा राजनीतिक कार्य।
- राष्ट्रीयता- भारतीय, ब्रिटिश राज
- मृत्यु - 9 जून 1 900
- मृत्यु स्थान - राँची जेल
जीवन परिचय एवं इतिहास
भारत के आदिवासी आंदोलनों के महानायक बिरसा मुंडा आज भी न केवल आदिवासी लोगों के बीच बल्कि पूरे विश्व में संघर्ष के लिए अग्रणी माने जाते हैं। ‘धरती आबा’यानि पृथ्वी के पिता के नाम से प्रसिद्ध बिरसा मुंडा आदिवासी लोगों के बीच में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं । भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के बाद हुए प्रसिद्ध आदिवासी विद्रोहों में बिरसा मुंडा के नेतृव में हुए विद्रोह का महत्वपूर्ण स्थान है। बिरसा मुंडा द्वारा किए गये संघर्ष और आदिवासी एकीकरण की छाप, अभी भी झारखंड, बिहार,उड़ीसा,छत्तीसगढ़ इत्यादि के सभी क्षेत्रों में देखी जा सकती है । सन 1895 से 1900 तक चले बिरसा मुंडा के महाविद्रोह ‘ऊलगुलान‘ ने जंगल-जमीन एवं अपने मूल अधिकारों के लिए साहूकार –जमींदार के साथ-साथ अंग्रेजी राजस्व व्यवस्था के खिलाफ भी आवाज उठाई थी। यह बिरसा मुंडा आंदोलन ही था जिसने छोटा नागपुर टेनन्सी एक्ट, 1908 लागू करवाया जो अभी भी विद्यमान है।
15 नवंबर 1875को झारखंड के रांची में कृषक परिवार मेंजन्मे बिरसा मुंडा के पिता सुगना मुंडा एवं माता करमी हातू थे । उन्होंने मिशनरी स्कूल में अध्ययन किया था।बिरसा मुंडा पर हिन्दू वैष्णव धर्म का भी प्रभाव हुआ था । किंतु उनकी असाधारण नेतृत्व क्षमता एवं उनके द्वारा आने वाले स्वर्ण युग की भविष्यवाणी के कारण अन्य क्षेत्रों के संथल इत्यादि लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। ये सभी अंग्रेजों द्वारा लागू की जा रहीं वन नीतियों एवं जमींदारों –साहूकारों द्वारा हो रहे उत्पीड़न एवं बिचौलियों के शोषण से दुखी थे। उनकी परंपरागत जीवन शैली का लोप हो रहा था एवं उनके जीवन यापन के संसाधनों का ह्रास हो रहा था । अंग्रेज़ो द्वारा ईसाई मिशनरियों को दिये जा रहे संरक्षण के कारण इन आदिवासी एवं जंजातीय लोगों को ऐसा प्रतीत होने लगा की उनका धर्म भी संकट में है। इन आदिवासी लोगों को अंग्रेज़ो के अलावा साहूकार-जमींदार एवं बिचौलियों ने भी अपने लाभ के लिए उपयोग किया । इन लोगों को वे दिकु कहते थे । इन सभी समस्याओं के बीच बिरसा मुंडा ने ये उद्घोषित किया की ईश्वर ने उन्हें आदिवासी लोगो के उत्थान एवं कल्याण के लिए नियुक्त किया है । इस उद्घोषणा के साथ ही बिरसा मुंडा के चमत्कारी प्रभाव की ख्याती आदिवासी इलाकों में फैल गयी । जल्द ही हजारों आदिवासी इन्हें भगवान मानकर इनका अनुसरण करने लगे । फिर ये बात फ़ैल गयी की बिरसा मुंडा सभी समस्याओं का समाधान कर देंगे एवं उनका खोया हुआ राज्य वापस दिलाएँगे । एक तरफ आदिवासी मुंडा संप्रदाय में गरीबी के कारण समस्याएँ थीं तो दूसरी तरफ इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882 ने उन्हें भूमि अधिकारों से वंचित कर दिया था।
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बिरसा मुंडा एवं अन्य आदिवासी लोग स्वयं को जंगली क्षेत्रों के मूल निवासी मानते थे । बिरसा के विचारों में हम दो मुख्य तत्व पाते हैं जिन्होंने बिरसा मुंडा विद्रोह को भी दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । इनमें प्रथम है , आदिवासी समाज सुधार जिसमें मुंडा आदिवासी लोगों को शराब ना पीने, अपने गाँव की साफ सफाई एवं जादू टोना या अंधविश्वास पर विश्वास न करना सम्मिलित हैं । दूसरा है, ईसाई मिशनरियों, भूस्वामियों एवं साहूकारों-जमींदारों का विरोध । बिरसा मुंडा के विचारों में ये बाहरी लोग मुंडाजीवनशैली का विनाश कर रहे थे।
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बिरसा मुंडा नें अपने अनुयायियों को 1895 में इकट्ठा कर मुंडा लोगो के पुराने अतीत को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया । उन्होनें एक स्वर्ण युग (सतयुग ) का आश्वासन दिया जिसमें मुंडा लोगों को अपने आदिवासी अधिकार फिर से प्राप्त होंगे, वे नदियों का शीतल जल पियेंगे एवं अपने खेतों में फसलें उगाएँगे । वे पुनः अपने राजा स्वयं होंगे एवं ईमानदारी से अपने जंगलों का उपयोग करेंगे। किंतु ये विचार अंग्रेजों को राजनीति से पूर्ण एवं उनके साम्राज्य के लिए खतरा प्रतीत हुए क्योंकि अंग्रेजों को लगा की बिरसा मुंडा ईसाई मिशनरियों , साहूकारों-जमींदारों एवं अंग्रेज़ सरकार को आदिवासी इलाकों से खदेड़ कर अपने साम्राज्य की स्थापना करना चाहता है । बिरसा मुंडा संघर्ष ने जल्द ही उन सभी तत्वों को ग्रहण कर लिया जो कि एक प्रभावशाली एवं व्यापक संघर्ष की आधारशिला रखते हैं । किंतु जैसे ही ये संघर्ष व्यापक हुआ अंग्रेजोंने इसका दमन करने का निश्चय कर लिया तथा बिरसा मुंडा को 1895 मे गिरफ्तार कर लिया गया एवं दंगा फैलाने के आरोप में दो वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया। 1897 में जेल से निकलने के बाद बिरसा मुंडा नें फिर से अपने अनुयायियों को इकट्ठा करना आरम्भ किया। बिरसा मुंडा ने गावों में भ्रमण कर रैलियों एवं संवाद के द्वारा लोगों को राजनैतिक रूप से जागृत कर संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
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अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बिरसा मुंडा ने 6000 मुंडा आदिवासी लोगों का दल तैयार किया, उन्होनें पुलिस स्टेशन एवं चर्च पर आक्रमण किए एवं साहूकारों एवं जमीदारों की सम्पत्तियों पर छापे मारे।मुंडा संघर्ष में सफ़ेद झंडे का उपयोग किया गया जो कि बिरसा राज का प्रतीत था।किन्तु इनके पास युद्ध के परंपरागत हथियार ही थे जैसे धनुष-बाण, तलवार, कुल्हाड़ी इत्यादि। इस कारण मुंडा संघर्ष अंग्रेजों के सामने अधिक दिनों तक टिक नहीं पाया।फ़रवरी 1900 की शुरुआत में बिरसा मुंडा को पुनः पकड़ लिया गया और जून में कालरा से जेल में ही उनकी मृत्यु हो गयी। इसके पश्चात बिरसा मुंडा संघर्ष धीरे-धीरे खत्म हो गया ,किन्तु इस संघर्ष के कारण अंग्रेज़ो को ऐसे कानून बनाने पड़े जिससे आदिवासी लोगों की जमीन आसानी से बाहरी लोग न ले सकें। बिरसा मुंडा संघर्ष ने एक बार पुनः ये साबित कर दिया की अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष सफलता पूर्वक किया जा सकता है। इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था की इसमें स्थानीय प्रतीकों, चिन्हों एवं परंपरागत शैलियों का उपयोग किया गया जो कि पूर्णतः आदिवासी मान्यताओं के अनुकूल थीं। इस कारण इस आंदोलन को व्यापक आधार मिला।
‘धरती-आबा’ के नाम से प्रसिद्ध बिरसा मुंडा के नाम पर भारतीय सरकार नेबिरसा मुंडा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी एवं बिरसा मुंडा ट्राइबल यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान बनाकर सम्मानित कियाहै। बिरसा मुंडा आज भी आदिवासी सम्प्रदायों में प्रेरणा और आदर्श के स्त्रोत बने हुए हैं । किन्तु आजादी के 72 वर्षों के पश्चात भी आदिवासी लोगों को प्राप्त भू –अधिकारों की समालोचना की जाये तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे अब भी उन अधिकारों से वंचित हैं, जिनके लिए बिरसा मुंडा ने जन –आंदोलन किया था।
बिरसा मुंडा का जीवन परिचय | Life Story Of Birsa Munda In Hindi




