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कारगिल युद्ध के बाद मेजर देवेन्द्र पाल सिंह का संघर्ष पूर्ण जीवन | Major Devender Pal Singh

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मेजर देवेन्द्र पाल सिंह ने कैसे बनाए 2 वर्ल्ड रिकॉर्ड | Major Devender Pal Singh
15 जुलाई 1999, भारत पाकिस्तान कारगिल युद्ध | India Pakistan Kargil War
कारगिल युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था | इस युद्ध का कारण पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों के कारण भारत की सेना से युद्ध हुआ था। पाकिस्तान ने भारत की नियंत्रण रेखा पार करके भारत की जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी। पाकिस्तान ने दावा किया की लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी है लेकिन युद्ध में मिले सभी दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओ के बयानों से ये साबित हुआ की पाकिस्तान की सेना इस युद्ध में पूर्ण रूप से शामिल थी। लगभग 30,000 भारतीय सैनिक और करीब 5,000 से भी ज्यादा घुसपैठिए थे।30,000 भारतीय सैनिको में से एक मेजर देवेन्द्र पाल सिंह थे। जो पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए बहुत बुरी तरह से घायल हो चुके थे। एक तोप का गोला उनके पास आकर फट गया था इस कारण से मेजर देवेन्द्र पाल सिंह बहुत बुरी तरह घायल हो गए। जिस कारण उन्हें पास के फौजी चिकित्सालय ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। मेजर देवेन्द्र पाल सिंह को नजदीकी मुर्दाघर ले जाया गया, तब एक अन्य डॉक्टर ने जाँच की तो पता लगा की अभी तक उनकी सांसे चल रही है।
25 वर्ष का वो नौजवान फौजी जो मरने को तैयार नहीं था।
मोर्टार बम के इतनी पास से फटने के बाद किसी सामान्य व्यक्ति का बचना नामुनकिन है। मेजर देवेन्द्र पाल सिंह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे वे मौत से लड़ने को तैयार थे। लहूलुहान हुए मेजर देवेन्द्र पाल सिंह की अंतड़िया खुली हुई थी। चिकित्सको के पास कुछ अंतड़ियों को काटने के आलावा कोई और रास्ता नहीं था | देवेन्द्र पाल सिंह को बचाने के लिए उनका एक पैर काट दिया गया था। लेकिन किसी भी कीमत पर वो मरने के लिए तैयार नहीं थे। मेजर देवेन्द्र पाल सिंह ने इस हादसें में न केवल अपना पैर खोया बल्कि वे कई तरह की शारीरिक चोटों और समस्याओ से घिर चुके थे देवेन्द्र पाल सिंह जी की सुनने की क्षमता कम हो चुकी थी और उन के पेट का कई बार ऑपरेशन किया गया था। आज इतने वर्षों के बाद भी कम से कम 40 टुकड़े उनके शरीर में अलग अलग भागो में मौजूद है जिन्हे निकाला नहीं जा सकता है। मेजर की इच्छाशक्ति और मजबूत इरादों से उनकी जान तो बच गई लेकिन अब उन्होंने नया जीवन जीना सीखना था। उन्होंने निश्चय किया की अब वे अपनी अपंगता के बारे में और नहीं सोचेंगे उन्होंने अपनी इस कमजोरी को एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया।
उन्होंने अपना आत्मविश्वास बनाए रखा
वे एक वर्ष तक चिकित्सालय में ईलाज करवाते रहे, और किसी को भी विश्वास नहीं था की मेजर एक बार फिर से वापस से चल पाएगे। लेकिन देवेन्द्र ने खुद को अपंग स्वीकार नहीं किया और निश्चय किया की अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वो अपनी बैशाखी के सहारे चलना शुरू कर देंगे। और कुछ ही समय के बाद मेजर को कृत्रिम पैर लगा दिया गया। लेकिन मेजर के लिए कृत्रिम पैर से चलना इतना आसान नहीं था मेजर को रोजाना बहुत अधिक दर्द सहना पड़ता था लेकिन उस दर्द को उन्होंने सहन करना सीखा लिया था। तथा मेजर ने हार नहीं मानी और आपने मनोबल को कम नहीं होने दिया। देवेन्द्र हर रोज सुबह 3.00 बजे उठ जाते थे और अपना अभ्यास शुरू कर देते थे। कुछ महीने के अभ्यास के बाद देवेन्द्र 5 किलोमीटर तक चलने लग गए। मेजर की कोशिश कुछ महीने बाद रंग लाई और वे अपने कृत्रिम पैर के साथ मैराथन में दौड़ने लगे। फिर उन्हें साउथ अफ्रीका में फाइबर ब्लेड से बने अच्छे कृत्रिम पैरों के बारे में जानकारी मिली जो अधिक लचीले और दौड़ने के लिए बहुत अच्छे थे। और इस तरह धीरे-धीरे उनकी दौड़ने की गति बढ़ती गई और उन्होंने अपनी विकलांगता को हरा दिया
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17 वर्ष बाद आज देवेन्द्र भारत के एक सफल ब्लेड रनर बन गए । उनके नाम आज 2 वर्ल्ड रिकॉर्ड है देवेन्द्र कई मैराथन में दौड़ चुके है और आज भी वे थके नहीं है। 42 वर्षीय देवेन्द्र ब्लेड रनर होने के साथ -साथ एक सफल वक्ता भी है। वे अपने लोगो को प्रेरित करने के लिए The Challenging Ones.नाम से एक ग्रुप भी चलते है|
कारगिल युद्ध के बाद मेजर देवेन्द्र पाल सिंह का संघर्ष पूर्ण जीवन | Major Devender Pal Singh




