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अंतिम सांस तक लड़ने वाले परमवीर चक्र सम्मानित - मेजर सोमनाथ शर्मा | Major Somnath Sharma In Hindi

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भारत माता के की रक्षा के लिए शहादत के इतिहास में कई वीरों का गुणगान है। इन्हीं वीरो की शहादत है जिस वजह से आज हम खुली हवा व एक आजाद देश में अपने हकों के साथ जी रहें है। देश के लिए शहादत में एक नाम शामिल थें महज 24 साल की उम्र में देश के लिए बलिदान देने वाले देशप्रेमी मेजर सोमनाथ शर्मा । सोमनाथ शर्मा देश के वो वीर सपूत थें जिन्हें देश की रक्षा के लिए पहला सबसे बड़ा सैन्य पुरस्कार “ परमवीर चक्र ” देकर उनकी शहादत को सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें मरणोपरांत दिया गया था। मेजर सोमनाथ शर्मा के वीरता भरे कुछ शब्द जो उन्होंने भारत-पाक संघर्ष के दौरान बोले जो उनके अंतिम शब्द थें
“ दुश्मन हमसे केवल पचास गज की दूरी पर है।
हमारी गिनती बहुत कम रह गई है।
हम भयंकर गोली बारी का सामन कर रहे हैं । फिर भी मैं एक इंच भी पीछे नही हटूंगा और अपनी आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक डटा रहूंगा।” - मेजर सोमनाथ शर्मा
साल 1947 में उनकी शहादत के बाद 26 जनवरी 1950 को “ गणतंत्र ” के अवसर पर मेजर सोमनाथ के पिता मेजर जनरल अमर नाथ को सोमनाथ की शहादत के लिए मरणोपरांत भारत के प्रथम राष्ट्रपती डां राजेन्द्र प्रसाद ने सैन्य शक्ति का सबसे बड़ा सम्मान “ परमवीर चक्र ” दिया।
यह है वीर मेजर सोमनाथ की कहानी
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देश का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान “ परमवीर चक्र ” से मरणोंपरात पहली बार सम्मानित होने वाले वीर सपूत मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 24 जनवरी 1923 को हिमाचल के डाढ़ गांव में हुआ था। एक सैन्य परिवार में जन्म होने के चलते सोमनाथ में बचपन से ही देश के लिए कुछ करने का जज्बा पेदा हो गया था। सोमनाथ के पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भारतीय सेना में डॉक्टर थें। मेजर सोमनाथ की शुरुआती शिक्षा उनकी पोस्टिग के आधार पर अलग-अलग जगहां से हुई। पिता के रिटायरमेंट के बाद वो नेनिताल के शेरवुडा से आगे पढ़े। मेजर सोमनाथ को जीवन में देशभक्ति की सबसे बड़ी प्रेरणा के मामा किशनदत्त वासुदेव जो 4/19 हैदराबादी बटालियन में लैफ्टिनेंट थें, जो 1942 में मलाया में जापानियों से संघर्ष करते हुए शहीद हो गए थें। उनके पिता व मामा के साथ उनके परिवार में उनके बड़े भाई सुरेंद्र लेफ्टिनेंट जनरल इंजीनियरिंग कोर व छोटे भाई वीएन शर्मा आर्म्ड कोर व बहन कमल शर्मा व मनोरमा शर्मा भी भारतीय सेना में रह कर सेवा दे चुके है।
हुए सेना में भर्ती
सोमनाथ शर्मा ने अपने मामा के बलिदान व परिवार से प्रेरित हो कर 22 फरवरी 1942 को सेना में भर्ती हो गए। सोमनाथ को चौथी कुमायूं रेजिमेंट में कमीशंड ऑफिसर अपना सैनिक सफर शुरु किया। दुसरे युद्ध में मलाया में अपने पराक्रम के चलते उन्हें सेना में एक अलग पहचान मिली।
टूटे बाजू के साथ लड़े अतिंम सांस तक
26 अक्टूबर 1947 को सेना का आदेश था की सोमनाथ शर्मा की रेजिमेंट को कश्मीर घाटी के बदगाम में चल संघर्ष में सेना का मोर्चा संभालना है। जब इस मोर्चे का फरमान आया तब मेजर सोमनाथ शर्मा के बांए हाथ की हड्डी टूटने के चलते प्लास्टर बधां हुआ था। सोमनाथ की यह स्थिति देख तब “ कुमाऊ रेमिमेंट ” चोथी रेजीमेंट के डेल्टा कमांडर मेजर शर्मा उन्हें मोर्चे पर नही जाने की सलाह दी। मगर देशभक्त व एक सच्चे सैनिक की भुमिका को निभाते हुए मेजर सोमनाथ सिंह आगे बढ़े।
जब मेजर सोमनाथ शर्मा अपनी रेजिमेंट के साथ 3 नवंबर 1947 को बडगांव घाटी पहुंचे तब इस हिस्से को अपने अधिन करने के मकसद से पाकिस्तानी सैना व उनके साथ मिले कबायलियों ने “ कुमायू रेंमिमेंट ” पर हमला बोल दिया। एक हाथ में प्लास्टर लगा होने बावजूद वो अपनी सेना के साथ करीब 6 घंटे तक पाकिस्तानी सैना से लड़ते रहें व हर सैनिक को हौंसल बढ़ाते रहें। इस संघर्ष के बीच अचानक एक गोला मेजर सोमनाथ के पास पड़े बारुद में गिर गया और मेजर सोमनाथ शर्मा देश की रक्षा के लिए लड़ते-लड़ते शहीद हो गए।
शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा का देश के प्रति देशप्रेम व देशभक्ति व उनके बलिदान को स्टोरीटाईम्स सलाम करता है।
अंतिम सांस तक लड़ने वाले परमवीर चक्र सम्मानित - मेजर सोमनाथ शर्मा | Major Somnath Sharma In Hindi




