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मेला प्रथा का हो खात्मा, लड़ी और अब हुआ पद्मश्री से सम्मान | Usha Chaumar In Hindi

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पूरी दुनिया में देश की एक अलग पहचान हो इसके लिए भारत देश आज कई अलग-अलग योजनाओं के साथ आगे बढ़ रहा है। एक तरफ स्वच्छ भारत की योजना चल रही है तो वही दुसरी तरफ आज भी हमारे समाज में में व्यक्तितव को शर्मसार करने वाली प्रथा “ मेला ढोना ” हमारा हिस्सा बनी हुई है।
समाज का एक विचारधीन मुद्दा जहां मल त्याग के बाद इसकी सफाई के लिए एक जाती विशेष की इसके लिए नियुक्ति कर देना हमारे समाज के लिए कितनी बड़ी अमानवीय घटना है। यह प्रथा दशकों से हमसे जुड़ी है जिसे खत्म करने के लिए आज कई लोग इससे लड़ रहें है।
17 साल तक जुड़ी रही इस प्रथा से
भारत देश की आजादी के 1 साल बाद इस प्रथा पर प्रथम बार “ हरिजन सेवक संघ ” ने आवाज उठाई। इसके बाद आज तक कई बार इसके खात्में के लिए अलग-अलग आवाजें उठी। इसके लिए कानून का भी निमार्ण किया गया , मगर असर ना के बराबर हुआ। देश में करीब 13 लाख लोगो से जुड़ा ये मामला बस सालो से यूं ही चला जा रहा है।
समाज की इस दशकों पुरानी रुढीवादी प्रथा का हिस्सा राजस्थान जिले के अलवर की रहने वाली ऊषा चौमर को भी मजबूरन बनना पड़ा। समाज के निचले स्तर से ऊषा का रिश्ता होने के कारण मजबूरी के कारण इस कार्य को करना पड़ा।
सालो इसका हिस्सा रहने के बाद साल 2003 में ऊषा “ सुलभ इंटरनेश संस्थान “ का हिस्सा बनी। सालों तक मजबूरी के चलते इस कुप्रथा का हिस्सा रहने वाली ऊषा ने अब लोगो तक इसके खिलाफ जागरुकता फैलाने लगी साथ ही हम स्वच्छ बने इसके लिए भी अलग-अलग कार्यों में लग गई।
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मिल चुके है कई अवॉर्ड्स
समाज की इस कुप्रथा में सालो मजबूरन हिस्सा बनी ऊषा को करीब 17 सालो बाद इससे आजादी मिली। इसके बाद उन्होंने लोगो के बीच इसके खिलाफ जागरुकता फैलाने का काम किया। लेकिन दोस्तो आज भी हमारे समाज में निम्न स्तर के समाज को मजबूरन इसका हिस्सा बनना पड़ रहा है। देश के लिए लच्जा बनी इस प्रथा को उखाड़ फेंकना चाहिए।
मेला प्रथा का हो खात्मा, लड़ी और अब हुआ पद्मश्री से सम्मान | Usha Chaumar In Hindi




