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मुंशी प्रेमचंद का जीवन व कार्य | All About Munshi Premchand Life and Work in Hindi

मुंशी प्रेमचंद का जीवन व कार्य | All About Munshi Premchand Life and Work in Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-12 months ago
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मुंशी प्रेमचंद का जीवन इतिहास | All About Munshi Premchand Life and Work in Hindi

  • नाम         -  धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ़ नवाब राय उर्फ़ मुंशी प्रेमचंद

  • पिता        -  अजीब राय

  • माता        -  आनंदी देवी

  • पत्नी        -  शिवरानी देवी

  • पुत्र           -  प्रभुदास और शिवदास 

  • जन्म        -  31 जुलाई, 1880, ग्राम लमही, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत

  • मृत्यु         -  8 अक्टूबर, 1936, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत

  • कार्यक्षेत्र     -  अध्यापक, लेखक, पत्रकार

  • राष्ट्रीयता   -  भारतीय

  • भाषा         -  हिन्दी

  • काल          -  आधुनिक काल

  • विधा         -  कहानी और उपन्यास

  • विषय        -  सामाजिक 

  • कृतियाँ      -  गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, सेवासदन उपन्यास 

मुंशी प्रेमचंद का जीवन

Munshi Premchand Life and Workvia : blogspot.com

जब धनपतराय 8 साल के थे तब ही उनकी माता का निधन(death) हो गया था तथा उनके निधन हो जाने के बाद से लेकर अपने जीवन के अन्त तक हमेशा उनको अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।  आनंदी देवी की मृत्यु के बाद पिताजी ने दूसरा विवाह कर लिया जिसके कारण धनपतराय को बचपन में ना चाहकर भी प्यार ना मिल सका। धनपतराय का जीवन गरीबी में ही पला - बड़ा है। कहा जाता है कि धनपतराय के घर में बहुत ही ज्यादा गरीबी थी। ना तो पहनने के लिए कपड़े मिल पाते थे और ना ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन(food) मिलता था। इन सभी के अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।

मुंशी प्रेमचंद की शादी

Munshi Premchand Life and Workvia : gaonconnection.com

धनपतराय के पिता ने केवल 15 साल की उम्र(age) में धनपतराय का विवाह करा दिया था। धनपतराय की पत्नी उम्र(age) में बड़ी और खूबसूरत भी नहीं थी। पत्नी की सूरत और उसकी जबान धनपतराय के जले पर नमक का काम(work) किया करती थी। धनपतराय स्वयं लिखते हैं कि, "उम्र(age) में वह मुझसे बहुत ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून(blood) सूख गया। उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी(sweet) न थी। धनपतराय ने अपनी शादी के फैसले पर पिताजी के बारे में कुछ लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी उसमे डुबो दिया, मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि धनपतराय के पिताजी को भी बाद में इसका एहसास (feeling) हुआ और बाद में उनको इस बात पर काफी अफसोस हुआ।

धनपतराय के पिता का स्वर्गवास विवाह के एक साल(year) बाद ही हो गया। अचानक धनपतराय के सिर पर पूरे घर कि जिम्मेदारी(Responsibility) आ गयी। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों(people) में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। धनपतराय की आर्थिक तंगी का अनुमान इस वजह(Reason) से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट(Coat) बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत(condition) हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास चले गए। वहाँ पर एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने धनपतराय को अपनी स्कूल(school) में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।

मुंशी प्रेमचंद की शिक्षा

Munshi Premchand Life and Workvia : i.ytimg.com

अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के शुरुआत में प्रेमचन्द अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी दौरान पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने लिखने का शौक था, आगे चलकर वह वकील(lawyer) बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन(tuition) जाने लग गया और उसी के घर पर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर(home) वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने(Increase) में लग गए। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।

मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक रुचि

Munshi Premchand Life and Workvia : sanjeevnitoday.com

गरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न(Harassment) जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की और धनपतराय के झुकाव(Tilt) को ना रोक सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से धनपतराय ने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। धनपतराय को बचपन से ही उर्दू आती थी। धनपतराय पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा जुनून छाया कि धनपतराय ने बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ लिए। धनपतराय ने दो - तीन साल(year) के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला।

धनपतराय बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास(Effort) करते थे। धनपतराय की रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने(Reading) के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद "तिलस्मे - होशरुबा" पढ़ डाली।

अंग्रेजी के अपने समय के प्रसिद्ध उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को धनपतराय ने बहुत कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी - बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग(way) को अपने व्यक्तिगत सामान्य जीवन अनुभव तक ही सिमित रखा।

13 वर्ष की उम्र(age) में से ही प्रेमचन्द ने लिखना प्रारंभ कर दिया था। शुरु में धनपतराय ने कुछ नाटक लिखे(Write) फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना प्रारंभ किया। इस प्रकार धनपतराय का साहित्यिक सफर शुरु(start) हुआ जो मरते दम तक साथ - साथ रहा।

प्रेमचन्द की दूसरी शादी

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सन् 1905 में धनपतराय की पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् 1905 के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।

यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। प्रेमचंद ने लेखन में अधिक सजगता आई। प्रेमचंद की पदोन्नति हुई तथा प्रेमचंद को स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर(Deputy inspector) बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में धनपतराय की पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी विख्यात हुआ।

मुंशी प्रेमचंद का व्यक्तित्व

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साधारण व सरल जीवन(life) के मालिक प्रेमचन्द हमेशा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल(sport) को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे l अपने जीवन की परेशानियों(Troubles) को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा "हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोगो की संपत्ति खो बैठेंगे। परन्तु हारने के पश्चात् - पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल(Rhythm) ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि, "तुम जीते हम हारे l पर फिर लड़ेंगे।" कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। 

जहां उनके हृदय(heart) में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति(Sympathy) का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं "कि जाड़े के दिनों में चालीस - चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम(work) करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें l"

प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव(village) जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे l अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर(away) रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना(wish) थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।

मुंशी प्रेमचंद की ईश्वर के प्रति आस्था

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जीवन के प्रति धनपतराय की बहुत आस्था थी परन्तु जीवन की विषमताओं(Oddities) की वजह से वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे - धीरे वे अनीश्वरवादी से बन(became) गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा "तुम आस्तिकता की और बढ़े जा रहे हो, पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।"

निधन के कुछ समय(time) पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था - "जैनेन्द्र, लोग ऐसे वक़्त में भगवान(god) को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक भगवान(god) को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"

मुंशी प्रेमचंद​​​​​​​ की कृतियाँ

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प्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष(special) प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। 13 वर्ष की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचंद साहित्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् 1894 ई० में "होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात" नामक नाटक की रचना की। सन् 1898 में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी वक़्त "रुठी रानी" नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था जिसकी रचना की। सन 1902 में प्रेमा और सन् 1904-05 में "हम खुर्मा व हम सवाब" नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन(life) और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे(good) ढंग से किया।

जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो 1907 में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस वक़्त प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज(Search) शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन(day) धनपतराय के सामने ही धनपतराय की इस कृति को अंग्रेजी शासकों(rulers) ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।

इस बंधन से बचने(escape) के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम(Corporation) ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।

"सेवा सदन", "मिल मजदूर" तथा 1935 में गोदान की रचना की। गोदान धनपतराय की समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा विख्यात हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना प्रारंभ किया। दुर्भाग्यवश(Unfortunately) मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए "महाजनी सभ्यता" नाम से एक लेख भी लिखा था।

मुंशी प्रेमचंद​​​​​​​ के लेख 

अहदे अकबर में हिन्दुस्तान की हालत / प्रेमचंद
इत्तिफाक ताकत है / प्रेमचंद
आबशारे न्याग्रा / प्रेमचंद
जॉन आफ आर्क / प्रेमचंद
कलामे सुरूर / प्रेमचंद
शहीदे आजम / प्रेमचंद
पद्म सिंह शर्मा के साथ तीन दिन / प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद​​​​​​​ की मृत्यु

Munshi Premchand Life and Workvia : wordpress.com

सन् 1936 ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने "प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण 8 अक्टूबर 1936 में प्रेमचंद का देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप हमेशा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया|