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राजा राममोहन राय के जीवन का परिचय | Raja Ram Mohan Roy Bio in Hindi

राजा राममोहन राय के जीवन का परिचय | Raja Ram Mohan Roy Bio in Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-7 months ago
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राजा राममोहन राय के जीवन का परिचय तथा [ उनका जन्म एवं मृत्युइतिहास, राजनीतिक विचारो का सफर] (Raja Ram Mohan Roy Biography , Social Reformer Information  in Hindi)

राजा  राममोहन राय को वर्तमान भारतवर्ष एवं बंगाल के नवयुग का जनक और पितामह कहा जाता हैं. उन्होंने वर्षोँ से चली आ रही पारम्परिक हिन्दू परम्पराओं को तोड़ते हुए समाज के हितो में कई काम किये उनमे खास तोर से महिलाओं के हितों में कई सामाजिक कार्य किए. हालांकि भारत देश  में उनकी पहचान  देश में सती प्रथा के विरोध करने वाले प्रथम व्यक्ति के रूप में जनि जाती हैं. लेकिन इसके अतिरिक्त भी उन्होंने कई ऐसे कार्य किये हैं जिनके कारण वर्तमान में भी राजा  राम मोहन राय को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता हैं.  राजाराममोहन राय ना केवल एक महान शिक्षा विद थे, बल्कि एक विचारक और समाज प्रवर्तक भी थे. वो कलकत्ता ( वर्तमान कोलकाता ) के एकेश्वरवादी समाज के संस्थापकों में से भी एक थे. उस समय जब भारत में केवल भारतीय संस्कृति और भाषा को ही सम्मान दिया जाता था, तब राम मोहन राय बहुत सामाजिक संगर्ष के बावजुद इंग्लिश, विज्ञान, वेस्टर्न मेडिसिन और टेक्नोलॉजी जैसे नवीन विषयों के अध्ययन के पक्षधर बने.

सम्पूर्ण नाम- राजा राममोहन राय

जन्म दिवस- 22 मई 1772

जन्म का स्थान- बंगाल के हूगली जिले के में राधानगर गाँव

पिता का नाम-  रामकंतो रॉय

माता का नाम- तैरिनी

पेशा और कार्य - ईस्ट इंडिया कम्पनी में कार्य,जमीदारी और सामाजिक क्रान्ति के प्रणेता

प्रसिद्धि केसे मिली - सती प्रथा,बाल विवाह,बहु विवाह का विरोध

पत्रिकाएं जो लिखी- ब्रह्मोनिकल पत्रिका, संबाद कौमुडियान्द मिरत-उल-अकबर

उपलब्धि जो मिली- इनके प्रयासों से 1829 में सती प्रथा पर क़ानूनी रोक लग गई

विवाद क्या रहा- हमेशा से हिन्दू धर्ममें अंध विशवास और  कुरीतियों के विरोधी रहे| साथ ही अग्रेज़ी और अंग्रेजो के पक्ष्कारी रहने का आरोप हमेशा लगा रहा

मृत्यु- 27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टाप्लेटोन ब्रिटेन में

मृत्यु का कारण- मेनिन्जाईटिस नाम  की बीमारी से 

राम मोहन राय को राजा की उपाधी मुग़ल बादशाह ने दी थी

राजा राममोहन राय का जन्म स्थान एवं उनके परिवार का विवरण (Raja Ram Mohan Roy :Birth palce and Family details )

Raja Ram Mohan Roy Bio in hindi

राम मोहन का जन्म बंगाल के हूगली जिले में दिनांक 22 मई 1772 को राधानगर गाँव में हुआ था. उनके पिता का नाम रामकंतो रॉय और माता का नाम तैरिनी राय था. राम मोहन का परिवार वैष्णव था, जो कि धर्म सम्बन्धित मामलो में बहुत ज्यादा कट्टर था.

उनके प्रपितामह कृष्ण चन्द्र बर्नजी जो की बंगाल के नवाब की सेवा में थे। उन्हें राय की उपाधि प्राप्त थी। ब्रिटिश शाशकों के समक्ष दिल्ली के मुगल सम्राट की स्थिति स्पष्ट करने के कारण दिल्ली सम्राट ने मोहन राय को राजा की उपाधि से विभूषित किया था। अत्यंत प्रतिभा के धनी राजा राम मोहन राय बहुभाषाविद् थे। उन्हें बंगला , फारसी, अरबी, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, ग्रीक, फ्रैन्च, लेटिन आदि भाषाओं का बहुत अच्छा ज्ञान था। इन भाषाओं में वे अपने भावों को कुशलता से अभिव्यक्त करने की क्षमता भी रखते थे। वैष्णव भक्त परिवार के होने के बावजूद राजा राम मोहन राय की आस्था अन्य धर्मों में भी थी। वेद एवं उपनिषदों में प्रतिपादित एकेश्वरवाद में आस्था रखने वाले राजा राम मोहन जी ने इस्लाम धर्म एवं कुरान का भी गहन अध्ययन किया । मूर्ति पूजा में उनकी आस्था बिलकुल नहीं थी। उस समय एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने लिखा था कि, राजा राम मोहन राय को भारत का गवर्नर जनरल बना देना चाहिये क्योंकि वे न  तो हिन्दू हैं न ही  मुसलमान और न ही ईसाई है। ऐसी स्थिति में वे निष्पक्षता से गवर्नर जनरल का कार्यभार संभाल सकते हैं। ये कहना अतिशयोक्ति न होगी कि राजा राम मोहन राय केवल हिन्दू पुनरुत्थान के प्रतीक नहीं थे अपितु सच्चे अर्थ में वे धर्म निरपेक्षता वादी थे।उस समय दो अलग जाती में विवाह (अंतरजातीय विवाह ) समाज में बहुत ही गन्दी द्रष्टी से देखा जाता था | इसके बावजूद इन्होने अलगजाती में शादी की |  इन्होने अपना जीवन काल में तीन शादियाँ की, इनकी पहली शादी जो की बहुत ही कम उम्र में हो गई थी , इनकी पहली पत्नी बहुत ही कम समय में इनका साथ छोड़ कर चली गई थी | उसकी मृत्यु के उपरांत इन्होने दूसरी शादी की वो भी इनका साथ लम्बे समय तक नहीं निभा सकी, इन दोनों के दो पुत्र राधाप्रसाद और रामप्रसाद थे | तत्पश्चात इन्होने उमा देवी से तीसरी शादी की इन्होने इनका साथ उम्र भर दिया |

शैक्षिक योगदान (Educational Contributions)

Raja Ram Mohan Roy Bio in hindi

राजा राममोहन राय ने बहुत सारी इंग्लिश स्कूलों की स्थापना के साथ ही कलकता में हिन्दू कॉलेज की  भी स्थापना की, जो किकालान्तर में देश का बेस्ट शैक्षिक संस्थान बन गया. रॉय ने विज्ञान के सब्जेक्ट्स जैसे फिजिक्स, केमिस्ट्री और वनस्पति शास्त्र को प्रोत्साहान दिया. वो चाहते थे कि देश का युवा और बच्चे नयी से नयी तकनीक की जानकारी हासिल करे इसके लिए यदि स्कूल में इंग्लिश भी पढ़ना पड़े तो ये बेहतर हैं.

राजा राममोहन 1815 में शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए कलकत्ता आए थे. उनका मानना था कि भारतीय यदि गणित, जियोग्राफी और लैटिन नही पढेंगे तो पीछे रह जायेंगे. सरकार ने राम मोहन का आइडिया एक्सेप्ट कर लिया लेकिन उनकी मृत्यु तक इसे लागू नहीं किया. राम मोहन ने सबसे पहले अपनी मातृभाषा के विकास पर ध्यान दिया.

सती प्रथा का विरोध

Raja Ram Mohan Roy Bio in hindi

राजा राम मोहन राय के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी सती प्रथा को बंद कराना। उन्होंने ही अपने कठिन प्रयासों से सरकार द्वारा इस कुप्रथा को ग़ैर-क़ानूनी दंण्डनीय घोषित करवाया था । उन्होंने इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन समाचार पत्रों तथा मंच दोनों माध्यमों से चला। इसका विरोध इतना अधिक था कि एक समय पर तो उनका जीवन ही खतरे में था। वे अपने शत्रुओं के हमले से कभी नहीं घबराये। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था, जिसके कारण लॉर्ड विलियम बैंण्टिक 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सके। जब कट्टर लोगों ने इंग्लैंड में प्रिवी कॉउन्सिलमें प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया, तब उन्होंने भी अपने प्रगतिशील मित्रों और साथी कार्यकर्ताओं की ओर से ब्रिटिश संसद के सम्मुख अपना विरोधी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। उन्हें प्रसन्नता हुई जब प्रिवी कॉउन्सिलने सती प्रथाके समर्थकों के प्रार्थना पत्र को अस्वीकृत कर दिया। सती प्रथा के मिटने से राजा राममोहन राय संसार के मानवतावादी सुधारकों की सर्वप्रथम कतार में आ गये।

राम मोहन रॉय ने आधुनिक भारत के इतिहास में प्रभावशाली काम किये है। वेदांत स्कूल ऑफ़ फिलोसोफी में उन्होंने उपनिषद का अभ्यास किया था। उन्होंने वैदिक साहित्यों को इंग्लिश में रूपांतर भी किया था और साथ ही ब्रह्म समाज की स्थापना भी उन्होंने की थी। भारतीय आधुनिक समाज के निर्माण में ब्रह्म समाज की मुख्य भूमिका रही है। सती प्रथा के खिलाफ उन्होंने सफल मोर्चा भी निकाला था। वे भारत से पश्चिमी संस्कृति को निकालकर भारतीय संस्कृति को विकसित करना चाहते थे।

राजा राम मोहन रॉय स्वभाव से अत्यंत शिष्ट थे लेकिन अन्याय के सख्त विरोधे थे उन दिनों एक नियम बन गया था कि यदि कोई अंग्रेज अधिकारी दिखाई दे तो उसे अपनी सवारी से उतरकर सलाम करना होगा वरना उस व्यक्ति को अंग्रेज अफसर का अपमान का दोषी माना जाएगा | एक दिन राम मोहन रॉय पालकी में सवार होकर कही जा रहे थे तभी रास्ते में कलकत्ता के कलेक्टर सर फेडरिक हेमिल्टन खड़े थे | अनजाने में ही पालकी चलाने वाले ने उनको नही देखा और आगे बढ़ गया था | हेमिल्टन को ये देखकर गुस्सा आ गया और उसने तुरंत पालकी रुकवा दी | पालकी से अब राम मोहन रॉय उतरे और उस कलेक्टर से नमस्कार कर पालकी रोकने का कारण पूछा लेकिन उन्होंने राम मोहन की एक बात नही सुनी और उनका खूब अपमान किया | उस समय राजा राम मोहन रॉय चुपचाप वहा से निकल गये लेकिन उन्होंने इस घटना की शिकायत लार्ड मिन्टो तक भेजी | आगे चलकर राम मोहन रॉय ने इस असभ्य नियम के खिलाफ कानून पास करवाए थे |

 

क्या थी सती प्रथा?

Raja Ram Mohan Roy Bio in hindi

इस प्रथा के अंतर्गत किसी महिला के पति की मृत्यु के बाद महिला भी उसकी चिता में बैठकर जल जाती थी, इस मरने वाली महिला को सती कहा जाता था. इस प्रथा का उद्भव देश के अलग-अलग-हिस्सों में विभिन्न कारणों से हुआ था लेकिन 18 वीं शताब्दी में इस प्रथा ने जोर पकड़ लिया था. और इस प्रथा को ब्राह्मण और अन्य सवर्णों ने प्रोत्साहन दिया. राजा राममोहन राय इसके विरोध में इंग्लैंड तक गए और उन्होंने इस परम्परा के खिलाफ सर्वोच्च न्यायायलय में इसके खिलाफ गवाही भी दी.

मूर्ति पूजा का विरोध

Raja Ram Mohan Roy Bio in hindi

राजा राममोहन राय ने मूर्ति पूजा का भी  खुलकर विरोध किया,और एकेश्वरवाद के पक्ष में अपने तर्क रखे. उन्होंने ट्रिनीटेरिएस्मका भी विरोध किया जो कि क्रिश्चयन मान्यता हैं. इसके अनुसार भगवान तीन व्यक्तियों में ही मिलता हैं गॉड,सन(पुत्र) जीसस और होली स्पिरिट. उन्होंने विभिन्न धर्मों के पूजा के तरीकों और बहुदेव वाद का भी विरोध किया. वो एक ही भगवान हैं इस बात के पक्षधर थे. उन्होंने लोगों को अपनी तर्क शक्ति और विवेक को विकसित करने का सुझाव दिया. इस सन्दर्भ में उन्होंने इन शब्दों से अपना पक्ष रखा-

मैंने पूरे देश के दूरस्थ इलाकों का भ्रमण किया हैं और मैंने देखा कि सभी लोग ये  विश्वास करते हैं एक ही भगवान हैं जिससे दुनिया चलती हैं”. इसके बाद उन्होंने आत्मीय सभा बनाई जिसमें उन्होंने धर्म और दर्शन-शास्त्र पर विद्वानों से चर्चा की.

महिलाओ की वैचारिक स्वतन्त्रता  (Women Liberty)

Raja Ram Mohan Roy Bio in hindi

राजा राममोहन रॉय ने महिलाओं की स्वतन्त्रता की वकालत भी की. वो समाज में महिला को उपयुक्त स्थान देने के पक्षधर थे. सती प्रथा के विरोध के साथ ही उन्होंने विधवा विवाह के पक्ष में भी अपनी आवाज़ उठाई. उन्होंने ये भी कहा कि बालिकाओ को भी बालको के समान ही अधिकार मिलने चाहिए. उन्होंने इसके लिए ब्रिटिश सरकार को भी मौजूदा कानून में परिवर्तन करने को कहा. वो महिला शिक्षा के भी पक्षधर थे, इसलिए उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्र रूप से विचार करने और अपने अधिकारों की रक्षा करने हेतु प्रेरित किया.

जातिवाद का विरोध (Opposition to Caste System):

भारतीय समाज का जातिगत वर्गीकरण उस समय तक पूरी तरह से बिगड़ चूका था. ये कर्म-आधारित ना होकर वर्ण-आधारित हो चला था. जो कि क्रमश: अब तक जारी हैं. लेकिन राजा राममोहन रॉय का नाम उन समाज-प्रवर्तकों में शामिल हैं जिन्होंने जातिवाद के कारण उपजी असमानता का विरोध करने की शुरुआत की. उन्होंने कहा कि हर कोई परम पिता परमेश्वर का पुत्र या पुत्री हैं. ऐसे में मानव में कोई विभेद नहीं हैं. समाज में घृणा और शत्रुता का कोई स्थान नहीं है सबको समान हक मिलना चाहिए. ऐसा करके राजा राम मोहन सवर्णों की आँख में खटकने लगे.

वेस्टर्न शिक्षा की वकालत (Advocate of Western Education):

जैसा कि पहले भी बताया कि राजा राम मोहन की कुरान, उपनिषद, वेद, बाइबल जैसे धार्मिक ग्रंथो पर ही बराबर की पकड़ थी, ऐसे में इन सबको समझते हुए उनका दूसरी भाषा के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक था. वो इंग्लिश के माध्यम से भारत का विज्ञान में वैचारिक और सामाजिक विकास देख सकते थे. 

उनके समय में जब प्राचिविद और पश्चिमी सभ्यता की जंग चल रही थी. तब उन्होंने इन दोनों के संगम के साथ आगे बढने की इच्छा जाहिर की. उन्होंने जहाँ फिजिक्स, मैथ्स, बॉटनी, फिलोसफी जैसे विषयों को पढ़ने को कहा वही वेदों और उपनिषदों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता बताई.

उन्होंने लार्ड मेक्ले का भी सपोर्ट किया जो कि भारत की शिक्षा व्यवस्था बदलकर इसमें इंग्लिश को डालने वाले व्यक्ति थे. उनका उद्देश्य भारत को प्रगति की राह पर ले जाना था. हालांकि वो 1835 तक भारत में प्रचलन में आई इंग्लिश के एजुकेशन सिस्टम को देखने के लिए जीवित नहीं रहें लेकिन इस बात को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता इस दिशा  में कोई सकारात्मक कदम उठाने वाले पहले विचारकों में से वो भी एक थे.

भारतीय पत्रकारिता के जनक (Father of Indian Journalism):

 भारत की पत्रकारिता में उन्होंने बहुत योगदान दिया और वो अपने सम्पादकीय में देश की सामाजिक राजनीतिक,धार्मिक और अन्य समस्याओं पर केन्द्रण करते थे. जिससे जनता में जागरूकता आने लगी. उनका लेखन लोगों पर गहन प्रभाव डालता था. वो अपने विचार बंगाली और हिंदी के समान ही इंग्लिश में भी तीक्ष्णता से रखते थे. जिससे उनकी बात सिर्फ आम जनता तक नहीं बल्कि तब के प्रबुद्ध और अंग्रेजी हुकुमत तक भी पहुच जाती थी. 

उनके लेखन की प्रशंसा करते हुए रॉबर्ट रिचर्ड्स ने लिखा राममोहन का लेखन ऐसा हैं जो उन्हें अमर कर देगा,और भविष्य की जेनेरेशन को ये हमेशा अचम्भित करेगा कि एक ब्राह्मण और ब्रिटेन मूल के ना होते हुए भी वो इतनी अच्छी इंग्लिश में कैसे लिख सकते हैं

आर्थिक समस्याओं सम्बन्धित विचार  (Economic Ideas):

आर्थिक क्षेत्र में राम मोहन के विचार स्वाधीन थे. वो प्रत्येक आम व्यक्ति की प्रॉपर्टी की रक्षा के लिए सरकार का हस्तक्षेप चाहते थे. उनके आर्टिकल भी हिन्दुओं के अपने पैतृक सम्पति के अधिकारों की रक्षा पर होते थे. इसके अलावा उन्होंने जमीन के मालिकों (जिन्हें तब जमीदार कहा जाता था) से किसानों की हितों को बचाने के लिए भी सरकार का हस्तक्षेप का आग्रह किया था. वो  लार्ड कार्नवालिस द्वारा दिए गये 1973 परमानेंट सेटलमेंट के खतरे से वाकिफ थे इसलिए वो ब्रिटिश सरकार से ये अपेक्षा करते थे कि वो किसानों को जमीदारो को बचाए. उन्होंने जमीन  सम्बन्धित मामलों में महिला अधिकारों की रक्षा का भी समर्थन किया.

अंतरराष्ट्रीयवाद के चैंपियन

रविन्द्र नाथ टैगो ने भी ये कमेंट किया था कि राममोहन ही वो व्यक्ति हैं जो कि आधुनिक युग को समझ सकते हैं. वो जानते थे कि आदर्श समाज की स्थापना स्वतन्त्रता को खत्म कर किसी का शोषण करने से नहीं की जा सकती बल्कि भाईचारे के साथ रहकर एक दुसरे के स्वतन्त्रता की रक्षा करने से ही एक समृद्ध और आदर्श समाज का निर्माण होगा”. वास्तव में राममोहन युनिवर्सल धर्म, मानव सभ्यता के विकास और आधुनिक युग में समानता के पक्षधर थे.

राष्ट्रवाद के जनक-  Nationalism

राजा राममोहन व्यक्ति के राजनीतिक स्वतन्त्रता के भी पक्षधर थे. 1821 में उन्होंने जे.एस. बकिंघम को लिखा जो कि कलकता जर्नल के एडिटर थे कि वो यूरोप और एशियन देशों के स्वतन्त्रता में विश्वास रखते हैं. जब चार्ल्स एक्स ने 1830 की जुलाई क्रान्ति में फ्रांस पर कब्ज़ा कर लिया तब राम मोहन बहुत खुश हुए.

उन्होंने भारत के स्वतंत्रता और इसके लिए एक्शन लेने के के बारे में सोचने का भी कहा. इस कारण ही उन्होंने 1826 में आये जूरी एक्ट का विरोध भी किया. जूरी एक्ट में धार्मिक विभेदों को कानून बनाया था. उन्होंने इसके लिए जे-क्रावफोर्ड को एक लेटर लिखा उनके एक दोस्त के अनुसार उस लेटर में उन्होंने लिखा कि भारत जैसे देश में ये सम्भव नहीं कि आयरलैंड के जैसे यहाँ किसी को भी दबाया जाएइससे ये पता चलता हैं कि उन्होंने भारत में राष्ट्रवाद का पक्ष रखा. इसके बाद उनका अकबर के लिए लंदन जाना भी राष्ट्रवाद का ही एक उदाहरण हैं.

सामजिक पुनर्गठन Social Reconstruction

उस समय बंगाली समाज बहुत सी कुरीतियों का समाना कर रहा था. ये सच हैं कि भारत में उस समय सबसे शिक्षित और सम्भ्रान्त समाज बंगाली वर्ग को ही कहा जा सकता था,क्योंकी तब साहित्य और संस्कृतियों के संगम का दौर था, जिसमें बंगाली वर्ग सबसे आगे रहता था. लेकिन फिर भी वहां कुछ अंधविश्वास और कुरीतियाँ थी जिन्होंने समाज के भीतर गहरी जड़ों तक अपनी जगह बना रखी थी. इन सबसे विचलित होकर ही राजा राममोहन राय ने समाज के सामाजिक-धार्मिक ढांचे को पूरी तरह से बदलने का मन बनाया. और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने ना केवल ब्रह्मण समाज और एकेश्वरवाद जैसे सिद्धांत की स्थापना की बल्कि सती प्रथा,बाल विवाह,जातिवाद, दहेज़ प्रथा, बिमारी का इलाज और बहुविवाह के खिलाफ भी जन-जागृति की मुहीम चलाई.

राजा राम मोहन राय की छपी हुयी पत्रिकाएं (Raja Ram mohan roy and his published Papers)

राजा राममोहन राय ने इंग्लिश,हिंदी,पर्शियन और बंगाली भाषाओं में की मेग्जिन पब्लिश भी करवाए. 1815 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की जो की ज्यादा समय तक नहीं चला. उन्हें हिन्दू धर्म के साथ क्रिश्च्निटी में भी जिज्ञासा जागरूक हो गई. उन्होंने ओल्ड हरब्यू और न्यू टेस्टामेंटस का अध्ययन भी किया.

1820 में उन्होंने एथिकल टीचिंग ऑफ़ क्राइस्ट भी पब्लिश किया जो की 4 गोस्पेल का एक अंश था. ये उन्होंने प्रीसेप्ट्स ऑफ़ जीसस के नाम के टाइटल से प्रकाशित करवाया था.

उस समय कुछ भी पब्लिश करवाने से पहले अंग्रेजी हुकुमत से आज्ञा लेनी पड़ती थी. लेकिन राजा राममोहन राय ने इसका विरोध किया. उनका मानना था कि न्यूज़ पेपर में सच्चाई को दिखाना चाहिए, और यदि सरकार इसे पसंद नहीं कर रही तो इसका ये मतलब नहीं बनता कि वो किसी भी मुद्दे को दबा दे. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर रहे राजा राममोहन रॉय ने कई पत्रिकाएं पब्लिश भी करवाई थी.

1816 में राममोहन की इशोपनिषद,1817 में कठोपनिषद,1819 में मूंडुक उपनिषद के अनुवाद आए थे. इसके बाद उन्होंने गाइड टू पीस एंड हैप्पीनेस, 1821 में उन्होंने एक बंगाली अखबार सम्बाद कुमुदी में भी लिखा. इसके बाद 1822 में मिरत-उल-अकबर नाम के पर्शियन journal में भी लिखा. 1826 मे उन्होंने गौडिया व्याकरण,1828 में ब्राह्मापोसना और 1829 में ब्रहामसंगीत और 1829 में दी युनिवर्सल रिलिजन लिखा.

राजा राम मोहन राय की मृत्यु (Raja Ram Mohan Roy Death)

1830 में राजा राम मोहन राय अपनी पेंशन और भत्ते के लिए मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के राजदूत बनकर यूनाइटेड किंगडम गए.

27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टाप्लेटोन में मेनिंजाईटिस के कारण उनका देहांत हो गया.

राजा राम मोहन राय और उन्हें मिले सम्मान (Raja Ram Mohan Roy and Awards)

उन्हें दिल्ली के मुगल साम्राज्य द्वारा राजाकी उपाधि दी गयी थी. 1829 में दिल्ली के राजा अकबर द्वितीय ने उन्हें ये उपाधि दी थी. और वो जब उनका प्रतिनिधि बनकर इंगलैंड गए तो वहां के राजा विलियम चतुर्थ ने भी उनका अभिनंदन किया.

उनके वेदों और उपनिषद के संस्कृत से हिंदी, इंग्लिश और बंगाली भाषा में अनुवाद के लिए फ्रेंच Société Asiatique ने उन्हें 1824 में सम्मानित भी किया.