x

पार्ले जी बिस्कुट का इतिहास जो अब तक आप नहीं जानते | Parle -G Biscuit History In Hindi

By N.j / About :-2 years ago

दोस्तों भारत में ऐसे कम लोग ही होंगे जिन्होंने पार्ले जी बिस्किट के बारे नहीं सुना होगा दोस्तों पार्ले जी ही भारत का पहला बिस्किट है जो आजादी के बाद से भारतीयों की चाय का साथी बना हुआ है पार्ले जब से बना तब से बच्चो से लेकर बड़ो के लिए खास बन गया साथ ही पार्ले बिस्किट से उनकी कई यादे जुडी हुई है दोस्तों पार्ले जी भारत को वो पहला बिस्किट था जो भारत में ही बना और भारत में रहने वाले आम नागरिको के लिए बना तो चलिए दोस्तों जानते है की आखरी कैसे पार्ले जी बना भारत का फ़ेमस बिस्किट.

दोस्तों पार्ले जी बिस्किट का निर्माण 1 से 2 साल में नहीं हुआ है ये कई सालो पुराना प्रोडक्ट है पार्ले जी को बनाने की मुहीम भारत देश की आजादी से पहले से ही शुरू हो गई थी हलाकि भारत में पार्ले जी के आने से इस कंपनी ने भारत में पार्ले की शुरुआत की थी देश जब अंग्रेजो की गुलामी में जी रहा था तब भारतीय बाजारों में अधिकतर विदेशी वस्तुएं ही ज्यादा मिलती थी वो भी काफी महगी होती थी जिन्हें केवल अंग्रेज ही खरीद पाते थे उस दौरान भारतीय मार्केट में अंग्रेजो द्वारा कैंडी लाई गई लेकिन दोस्तों उसे भी केवल अमीर व्यक्ति खरीद पाते थे

तब इस बात को लेकर मोहनलाल दयाल काफी निराश थे और उन्हें यह बात बिलकुल पसंद नहीं आयी उस समय मोहन लाल भारत में चल रहे स्वदेशी आंदोलन से काफी प्रभावित थे तब उन्होंने भारत में सालो से पनप रहे इस भेदभाव को खत्म करने के लिए स्वदेशी आंदोलन का साहरा लिया मोहनलाल ने ये निश्चय कर लिए था की वो भारत कैंडी का निर्माण करेंगे ताकि भारत के सभी आम लोग इसे आसानी से खरीद सकें इस बात का निश्चय कर मोहलाल जर्मनी चले गए और वहां रहकर उन्होंने कैंडी बनाना सीखा और साल 1929 में उन्होंने 60 हजार रुपयों में जर्मनी से कैंडी बनाने वाली मशीन खरीदी और उसे भारत लेकर आ गए

मोहन लाल दयाल का भारत में पहले रेशम का व्यापार था लेकिन उन्होंने एक स्वदेशी इच्छा के चलते भारत में कैंडी बनाने का व्यापार शुरू किया और उन्होंने जर्मनी से आते ही मुंबई में बिरला परला क्षेत्र में इस कार्य के लिए एक फैक्ट्री खरीदी जब कैंडी बनाने की शुरुआत की गई तब उनके पास कुल 12 कर्मचारी ही थे और ये सभी 12 कर्मचारी उन्ही के परिवार के थे इन सभी ने मिलकर रात दिन मेहनत की और उस पुरानी फैक्ट्री को एक नया रूप दे दिया सभी काम करने में इतने व्यस्त हो गए की ये भी भूल गए की इस कंपनी को क्या नाम दे जब काफी समय तक सही नाम नहीं मिल रहा था तब जहां से इस कंपनी की शुरुआत की गई और कंपनी की प्रथम बार शुरुआत मुंबई के पारला में खोली गई थी और इसी कारण इस नाम को थोड़ा बदलते हुए इसे पार्ले  का नाम दे दिया गया

बाद में इस फैक्ट्री में सबसे पहले Orange Candy बनाई गई थोड़े ही समय में इसे भारतीय बाजार में काफी पसंद किया गया और इसे प्रेरित हो कर पारले ने भारत में कई प्रकार की कैंडी बनाई उस समय अंग्रेजी सरकार के लोग चाय के साथ बिस्किट खाते थे जो केवल पैसो वालो तक ही सीमित था तब मोहलाल ने विचार किया क्यों ना भारत में कैंडी की तरह बिस्किट भी बनाया जाएं और उन्होंने प्रथम बार 1939 में उन्होंने पहली शुरुआत की पार्ले ग्लुको की पार्ले ग्लुको को गेहूं से निर्मित किया गया इस वजह से काफी सस्ता था और इसे सभी भारतीय लोग आसानी से खरीद पाते थे दोस्तों  पार्ले ग्लुको सस्ता तो था ही साथ इसका स्वाद भी बेमिसाल था

पार्ले ग्लुको कम समय में ही काफी फ़ेमस हो गया पार्ले ग्लुको इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे ना सिर्फ भारतीय लोग इस्तेमाल करते थे बल्कि अंग्रेज भी इसे  चाय के साथ उपयोग करने लगे थे दोस्तों मार्केट में पार्ले ग्लुको इतनी तेजी से में लोगो कि पसंद बन रहा था कि अँग्रेजी सरकार द्वारा भारत में बेचें जाने वाले सभी प्रोडक्ट इसके सामने फीके पड़ने लगे और जब दुनिया में सेकंड वर्ल्ड वॉर खत्म हुआ तब पार्ले ग्लुको दुनिया का बेहतरीन प्रोडक्ट बन चूका था हलाकि  सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद  पार्ले ग्लुको को अपना कारोबार बंद करना पड़ा

इसके पीछे ये वजह नहीं थी कि पार्ले ग्लुको को मार्केट में भारी नुकसान हुआ है या उसके पास आगे इस प्रोडक्ट को बनाने के लिए पैसे नहीं है इसके पीछे मुख्य वजह थी भारत में गेहूं उत्पादन में आयी कमी और जब 1947 में भारत अंग्रेजो कि गुलामी से मुक्त हुआ और भारत के दो हिस्से हुए तब ये समस्या और काफी ज्यादा बढ़ गई और तब पार्ले को इतना ज्यादा मटेरियल नहीं मिल पाता था कि वो अपने इस प्रोडक्ट आगे जारी रखें इसी के चलते इन्हे अपना पूरा कारोबार कुछ समय के लिए रोकना पड़ा

तब मार्केट में  पार्ले ग्लुको को फिर से शुरू करने कि मांग उठने लगी और तब कंपनी ने लोगो से एक वादा किया कि जैसे ही देश के हालात सुधरेंगे तब वे एक बार फिर  पार्ले ग्लुको को शुरू कर देंगे साल 1982 में एक बार फिर जब  पार्ले ग्लुको कि शुरुआत कि गई तब इसका नाम बदलकर पार्ले जी कर दिया गया  पार्ले ग्लुको को इसका नाम बदलने के पीछे एक मज़बूरी थी क्योकि ग्लुको शब्द ग्लूकोज से बना था और पार्ले के पास इसके कॉपी राइट्स नहीं थे इस वजह से कोई भी कंपनी इसे आसानी से इस्तेमाल कर सकती थी जब पार्ले ग्लुको बंद हुआ तब इस नाम का फायदा कई बिस्किट कंपनियों ने उठाया और सभी कंपनिया अपने प्रोडक्ट के पीछे ग्लुको डी नाम का इस्तेमाल करने लगे और तब लोग पार्ले और अन्य कंपनियों के समान नाम के फेर में फस गए पार्ले ग्लुको कि मार्केट सेल पर काफी असर पड़ा और इसी वजह से साल 1982 में पार्ले ने फैसला किया कि वो अब Parle Gluce से Gluce नाम बदलेगा इसे बाद में  Parle - G कर  दिया गया और अब Parle - G नाम से मार्केट में शुरुआत करने निकल पड़े

साल 2003 में Parle - G को सबसे बड़ी सफलता हासिल हुई Parle - G को इस साल दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्किट घोषित किया गया और धीरे-धीरे पार्ले जी ने एक बार फिर अपनी पकड़ मजबूत कर ली साल 2012 में कंपनी के मुख्य अधिकारियो ने बताया कि उन्होंने केवल अपने बिस्किट के प्रोडक्ट से 5000 हजार करोड़ कि सेल कि है तब सभी हैरान रह गए उस समय पार्ले जी एकमात्र ऐसा बिस्किट प्रोडक्ट था जिसने इतना बड़ा आकड़ा पार किया था और तब से आज तक पार्ले जी के प्रोडक्शन में कोई खास अंतर नहीं आया है कंपनी के आकड़ो के अनुसार Parle - G हर साल करीब 14600 करोड़ बिस्किट का निर्माण करती है जिसे वो इनकी 6 मिल्स में भेजती है यही कारण है कि आज यह कंपनी 16 मिलियन डॉलर का रेवन्यू कमा पाती है 

आज भले ही बदलते समय के साथ मार्केट में कई तरह कि बिस्किट कंपनिया आ गई है लेकिन आज भी Parle - G ने मार्केट में अपना वजूद कायम कर रखा है आज भी parle -G बच्चों से लेकर बड़ो को काफी पसंद आता  है दोस्तों Parle - G उस दौर में भी हिट था और आज भी उसी तरह मार्केट में जमा हुआ है इस बात से ये साबित होता है कि लोग Parle - G बिस्किट से आज भी खूब प्यार करते है.

पार्ले जी बिस्कुट का इतिहास जो अब तक आप नहीं जानते | Parle -G Biscuit History In Hindi