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राष्ट्रध्वज के निर्माता पिंगली वैंकैया की जीवनी | Pingali Venkaiah Biography In Hindi

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देशभक्त पिंगली वैंकैया की जीवनी | All About Pingali Venkaiah Biography In Hindi
- नाम - पिंगली वेंकैया
- जन्म - 2 अगस्त 1876
- जन्म स्थान - (Bhatlapenumarru आंध्र प्रदेश में गांव )
- पिता का नाम - हनुमंत रायडू
- माता का नाम - वेंकट रत्नम
- संतान - चालापति राव, सीतामहला लक्ष्मी, पिंगली परशुराम्याह
- मृत्यु - 4 जुलाई 1963
- मृत्यु स्थान - विजयवाड़ा
पिंगली वेंकैया एक स्वतन्त्रता सेनानी और भारत के राष्ट्रध्वज तिरंगे के प्रारूप के निर्माता थे। पिंगली वेंकैया को कई विषयों का ज्ञान था। एक देशभक्त होने के साथ–साथ वे कृषि वैज्ञानिक भी थे। उन्हें भू-विज्ञान और कृषि क्षेत्र के कार्यों से अधिक लगाव था। अँग्रेजी सेना मे अपनी सेवा देने वाले पिंगली वेंकैया ने दक्षिण अफ्रीका के एंग्लो-बोअर युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से भाग लिया था।दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के दौरान पिंगली वेंकैया महात्मा गांधी के संपर्क में आए और उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए । पिंगली वेंकैया ने सबसे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए झंडे की डिजाइन तैयार की थी। यह उन्हीं के द्वारा बनाया गया झण्डा था, जिसे 1947 मे मामूली परिवर्तन कर राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता दी गयी ।
प्रारंभिक जीवन
पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के मछली पट्टनम के पास भटाला पेनमरू स्थान पर हुआ था। तेलुगु ब्राह्मण कुल मे जन्मे पिंगली वेंकैया के पिता पिंगली हनुमंत रायडू और माता का नाम वेंकट रत्नाम्मा था । पिंगली वेंकैया ने मद्रास में हिन्दू हाई स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी, इसके बाद अपने वरिष्ठ स्नातक की शिक्षा को पूरा करने के लिए वो कैबरीज़ विश्वविद्यालय चले गए। पिंगली वेंकैया गांधीवादी विचारों पर अकाट्य विश्वास करने वाले थे। इसके साथ-साथ वो एक उत्कट राष्ट्रवादी भी थे । महात्मा गांधी के सिद्धांतों के अनुरूप ही वे आचरण करते थे। दक्षिण अफ्रीका से वापस आने के बाद पिंगली वेंकेय ने अपना अधिकांश समय कपास की खेती और उपज के विषय मे शोध करने में व्यतीत किया । इस समय उन्होने एक रेलवे गार्ड के रूम मे ब्रिटिश रेलवे में कार्य भी किया । कुछ समय तक वे बेल्लारी में एक सरकारी कर्मचारी के रूप में भी कार्य करते रहे किन्तु भाषाओं के प्रति अपने लगाव के कारण वो लाहौर के एंग्लो वैदिक महाविद्यालय में उर्दू और जापानी भाषा का अध्ययन करने चले गए ।
भारत के ध्वज की रचना
1906 से 1911 तक पिंगली ने कपास की विभिन्न क़िस्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया। इस अध्ययन के फलस्वरूप उन्होने “बंबोलाट कंबोडिया कपास” पर अपना एक लेख प्रकाशित किया । उनके जापानी भाषा कपास और झंडों के ऊपर किए गए अध्ययन के कारण ,उन्हे जापान वेंकैया, पट्टी (कपास) वेंकैया और झण्डा वेंकैया के नाम से भी जाना जाता है। पिंगली वेंकैया ने 1916 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में 30 झंडों के प्रारूप पेश किए थे, जो आगे चलकर भारत के झंडे के रूप में प्रयोग में लाये जा सकते थे। पिंगली वेंकैया ने मछली पट्टनम के आंध्रा राष्ट्रीय कालेज में प्रवक्ता के रूप में कार्य करते हुए 1918 से 1921 के बीच कांग्रेस के सभी अधिवेशनों में अपने स्वयं के ध्वज को मान्यता देने का प्रस्ताव पेश किया। पिंगली वेंकैया ने एक बार पुनः विजयवाड़ा मे गांधी जी से मुलाक़ात कर झंडों के ऊपर प्रकाशित की गयी अपनी पुस्तक में झंडे के अलग –अलग प्रारूप दिखाये । एक राष्ट्रीयझंडे की महत्ता को पहचानकर महात्मा गांधी ने पिंगली वेंकैया से 1921 की राष्ट्रीय कांग्रेस की मीटिंग में एक नए प्रारूप को पेश करने की इच्छा व्यक्त की। शुरुआत में पिंगली वेंकैया ने जो प्रारूप बनाया उसमें केसरिया और हरे रंगों का उपयोग किया गया था। शीघ्र ही यह झण्डा अपने बीच में चरखे के साथ एक परिवर्तित रूप में पेश किया गया। इसमें एक तीसरे सफ़ेद रंगको भी जोड़ दिया गया। इस बदलाव के साथ नए रूप में तिरंगे का प्रारूप गांधी जी ने स्वीकार कर लिया जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी 1931 में आधिकारिक रूप से आत्मसात कर लिया । वर्तमान में हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा पिंगली वेंकैया द्वारा तैयार किए गए कांग्रेस के झंडे के प्रारूप पर ही आधारित है। इसे संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को स्वतन्त्रता से कुछ दिन पूर्वमान्यता दी थी। हमारा राष्ट्रीय ध्वज आयताकार है जो तीन रंगों के मेल से बना हुआ है ।इसमें केसरिया सफ़ेद और हरे रंग का प्रयोग हुआ है जिनके बीच में चौबीस तीलियों वाला अशोक चक्र विद्यमान है। अशोक चक्र का रंग नीला है। हमारे इस राष्ट्रीय ध्वज को “फ्लैग कोड आफ इंडिया” तथा राजकीय चिन्हों के नियम नियंत्रित करते हैं। पिंगली वेंकैया के योगदान को विजयवाड़ा के आल इंडिया रेडियो की बिल्डिंग को इनके नाम पर रखकर सम्मानित किया गया है। पिंगली वेंकैया एक शिक्षाविद भी थे जिन्होने मछली पट्टनम में शैक्षणिक संस्थानो की स्थापना की। पिंगली वेंकैया ने अमेरिका मे पाये जाने वाले कंबोडिया कपास को भारतीय कपास के बीज के साथ मिश्रण कर एक नए बीज भारतीय संकरीत कपास तैयार किया । उनके इस योगदान के लिए कपास की इस प्रजाति को वेंकैया कपास के नाम से भी जाना जाता है। पिंगली वेंकैया हीरे की खदानों के भी विशेषज्ञ थे । उन्हें अलग-अलग प्रकार के हीरों की अच्छी जानकारी थी। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए उन्होने हीरों की खदानों के ऊपर काफी अध्ययन किया था।
46 वर्षों बाद मिली पहचान
1963 में पिंगली वेंकैया का देहांत वियजयवाड़ा में हुआ। किन्तु भारतीय राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आंदोलन में अपना योगदान देने वाले और उम्र भर गांधीवादी विचारों को मानने वाले पिंगली वेंकैया को समाज के बहुत कम लोग जानते हैं । आजादी के इतने वर्ष बाद भी तिरंगे झंडे का देश के कोने-कोने में फहराया जाना पिंगली वेंकैया के योगदान की निशानी है। भारत के इतिहास में पिंगली वेंकैया को उनके योगदान का समुचित श्रेय नहीं मिल पाया है। भारत सरकार ने पिंगली वेंकैया की मृत्यु के 46 वर्षों बाद 2009 में उनके नाम से एक डाक टिकट जारी किया । जिससे भारत की वर्तमान पीढ़ियों को भी उनके बारे में जानने का मौका मिला। 2012 में आंध्र प्रदेश की सरकार ने पिंगली वेंकैया का नाम भारत रत्न के लिए केंद्र सरकार को प्रेषित किया था, जो कि मूर्त रूप नहीं ले पाया। पिंगली वेंकैया के दो पुत्र और एक पुत्री हैं। पिंगली वेंकैया एक आदर्श गांधीवादी होने के कारण कभी भी अपने लिए प्रसिद्धि और पहचान कि इच्छा नहीं रखते थे। किन्तु भारत के लोगों ने उस व्यक्ति को उचित पहचान नहीं दी जिसने भारत के झंडे के रूप में भारत के सभी नागरिकों को एक नयी पहचान दी थी । जिस तिरंगे से हमारी सेनाओं , राजनेताओं , पुलिस , शिक्षक, और समाज के हर वर्ग को विशेष लगाव है, उस तिरंगे के प्रारूप को निर्मित करने वाले पिंगली वेंकैया को भी पहचान और सम्मान देना हम सब का कर्तव्य है। जबतक भारत के मुक्त गगन में तिरंगा फहराता रहेगा तब तक पिंगली वेंकैया हमारी यादों में बने रहेंगे।
राष्ट्रध्वज के निर्माता पिंगली वैंकैया की जीवनी | Pingali Venkaiah Biography In Hindi




