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ओशो रजनीश की जीवनी | Osho Rajneesh Biography In Hindi

By N.j / About :-2 years ago

ओशो विवादित, उद्दात और  स्वच्छंद धर्म गुरु- भगवान श्री रजनीश की जीवनी | All About Osho Rajneesh Biography In Hindi

  • पूरा नाम -      चंद्र मोहन जैन
  • जन्म -           11 दिसंबर 1931
  • जन्म स्थान - रायसेन जिला (मध्य प्रदेश)
  • पिता का नाम - बाबूलाल
  • माता का नाम - सरस्वती जैन
  • एल्बम के नाम -  कुंडलिनी ध्यान, गौरीशंकर ध्यान
  • मृत्यु   -             19 जनवरी 1990
  • मृत्यु स्थान  -       पुणे 

आचार्य रजनीश एक ऐसे धार्मिक व्यक्ति रहे हैं जो दुनिया भर में धर्म और दर्शन, परिवार और विवाह ,सन्यास और संभोग के ऊपर दिये गए विचारों के कारण अत्यंत लोकप्रिय और विवादित रहे । विश्व भर में “ओशो” के नाम से प्रसिद्ध आचार्य रजनीश एक स्वच्छंद दर्शन और उन्मुक्त जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। इन्हें जितनी प्रसिद्धि भारत में मिली उससे कहीं अधिक अमेरिका और यूरोप में मिली । ओशो ने अपने विचारों और जीवन शैली से भारतीय सन्यासियों और आध्यात्मिक गुरुओं का एक ऐसा रूप पेश किया है, जो उनसे पहले देखने को नहीं मिलता । अध्यात्म के ऊपर ओशो के विचार सबसे अलग हैं। ओशो की “संभोग से लेकर समाधि” तक पुस्तक विवादों का पहाड़ है जो आज भी चर्चा का विषय बनी हुई है। अपने अनुयायियों के बीच में “भगवान श्री रजनीश ” नाम से संबोधित किए जाने वाले इस धर्म गुरु ने अमेरिका के ओरेगॉन में रजनीशपुरम नाम से एक आश्रम बसा लिया था। ओशो भारतीय धर्म गुरुओं में धार्मिक गतिविधियों को एक व्यापार  का रूप देने वाले सर्वप्रथम आध्यात्मिक गुरु थे। संभोग के ऊपर दिये गए विचारों के कारण ये “सेक्स गुरु” के नाम से भी प्रचलित थे।  

विद्रोही ओशो का उन्मुक्त बचपन

एक धर्म गुरु के रूप में ओशो का चिंतन जितना स्वच्छंद था उतना ही स्वच्छंद उनका बचपन भी था। ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्यप्रदेश के कुछवाड़ा गाँव के एक जैन परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबूलाल जैन था तथा उनकी माता सरस्वती जैन थीं। यह परिवार कपड़े का व्यापारी था। 11 भाई बहनों में रजनीश सबसे बड़े थे। इनके बचपन का नाम रजनीश चन्द्र मोहन था। इनके बचपन की घटनाएँ इन्हें एक स्वतंत्र और विद्रोही किशोर की भूमिका में प्रस्तुत करती हैं । बचपन से ही रजनीश ने सामाजिक, धार्मिक, और दार्शनिक विश्वासों को अपने तर्क और प्रश्नों द्वारा समझने की कोशिश की । जो मान्यताएँ रजनीश को तर्क संगत नहीं लगती थीं, उन्हे ये कभी स्वीकार नहीं करते थे। अपनी युवावस्था में रजनीश ने ध्यान की कई विधियों के साथ अलग अलग प्रयोग किए थे। एक प्रभावशाली नेता और एक श्रेष्ठ वक्ता के रूप में ओशो अपने युवावस्था में ही प्रसिद्ध होने लगे थे। आचार्य रजनीश को 11 वर्ष की अवस्था में अपनी नानी के यहाँ भेज दिया गया जहां बिना किसी रूढ़िवादी परम्पराओं या शिक्षा के इनका काफी समय व्यतीत हुआ । 1951 में रजनीश ने हाई स्कूल की शिक्षा पूरी की इसके बाद उन्होने जबलपुर के हितकारिणी कालेज में प्रवेश लिया । किन्तु अपने विरोधी स्वभाव के कारण उनकी महाविद्यालय  के एक प्रोफेसर के साथ नहीं बनी जिसके कारण उन्हे उस महाविद्यालय  को छोडकर डी. एन. जैन कालेज में प्रवेश लेना पड़ा । 

ओशो की समाधि और अध्यापन

via: www.oshokorea.com

1953 में ही अपनी शिक्षा से एक वर्ष का अवकाश लेने के बाद रजनीश ध्यान और आत्मचिंतक के लिए निकल पड़े।  इसके बाद ऐसा माना जाता है कि 21 मार्च 1953 को रजनीश को  21 वर्ष की उम्र में आत्म साक्षात्कार या प्रबोधन की स्थिति प्राप्त हुई । यह उनकी समाधि की अवस्था थी। किन्तु रजनीश ने उस समाधि की अवस्था के बाद भी अपनी शिक्षा को जारी रखा और दर्शन शास्त्र में स्नातक की उपाधि हासिल की । इसके पश्चात ओशो ने मध्यप्रदेश के सागर विश्वविद्यालय से 1956 में परास्नातक की डिग्री प्रथम श्रेणी में दर्शन शास्त्र में प्राप्त की थी। रजनीश को अपने स्नातक वर्ष में अखिल भारतीय वाद विवाद प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था । आचार्य रजनीश ने परास्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद जबलपुर विश्वविद्यालय में 9 वर्षों तक दर्शन शास्त्र के अध्यापक के रूप में कार्य किया। इस दौरान काफी लोग आचार्य रजनीश के धर्म और दर्शन के स्वच्छंदतावादी विचारों से आकर्षित होकर इनके पास आने लगे। रजनीश ने रायपुर संस्कृत कालेज में भी सहायक प्रोफेसर के रूप में दर्शन शास्त्र का शिक्षण किया किन्तु उनके उग्र विचारों के कारण कालेज के प्रशासन ने उन्हें वहाँ से हटा दिया।

जब रजनीश बने धर्मगुरु

via: nghiencuutongiao.info

जबलपुर में शिक्षण कार्य के दौरान ही रजनीश ने पूरे भारत का भ्रमण कर अपने गैर परंपरागत और विवादित विचारों के प्रसार का कार्य भी किया। ओशो के विचारों में जीवन में ध्यान, प्रेम और हास्य यह तीन चीजें सर्वाधिक महत्वपूर्ण थीं। ओशो का मानना था कि मनुष्य बाहर के आवरण के अनुसार और समाज के द्वारा थोपी गयी रूढ़िवादी धार्मिक परम्पराओं के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता है। अपने आप को पहचानने के लिए सभी को ध्यान कि कला सिखनी चाहिए। ओशो का मानना था कि समाधि के लिए संभोग पहला कदम है।  मनुष्य के अंदर जबतक इच्छाओं का दमन होता रहेगा तबतक वह कुंठा का शिकार रहेगा । ऐसे में उसकी आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो पाएगी । आध्यात्मिक उन्नति के लिए ओशो के अनुसार मनुष्य के जीवन में आत्म संतुष्टि एवं मानसिक तृप्ति का होना अनिवार्य था। 

ओशो के मेडिटेशन कैंप और डाइनेमिक मेडिटेशन

1964 से ओशो ने ध्यान शिविरों कि शुरुआत की जहां उसके अनुयाई एक विशेष प्रकार की जीवन शैली अपनाकर ध्यान कि प्रक्रियाओं में अनुभव लेते थे। इसी समय ओशो ने लोगों को अपने शिष्यों के रूप में ग्रहण करना शुरू किया। 1966 में ओशो ने अपना पूरा समय धार्मिक गुरु के रूप में देने के लिए कालेज के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद ओशो ने अपना सारा समय एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में व्यतीत करना शुरू कर दिया । विवाह और संभोग के विषय में ओशो के उन्मुक्त विचारों के कारण ही उन्हे संभोग गुरु के उपनाम से भी जाना जाता है।1970 में ओशो ने “डाइनेमिक मेडिटेशन” कि शुरुआत की जिसके अनुसार लोग दिव्यता का अनुभव कर सकते थे। इस ध्यान की विधि ने पश्चिम के युवाओं को खास तौर पर आकर्षित किया। हजारों की संख्या में अमेरिका और अन्य पाश्चात्य देशों से अनुयाई, जिनमे अधिकतर युवा होते थे, इनके पुणे स्थित आश्रम में इनके प्रवचन सुनने और इनसे ध्यान की विधि सीखने के लिए आने लगे । ओशो ने निरंतर तौर पर जनसभाओं को संबोधित करना शुरू किया।  ये जनसभाएँ लोगों से खचाखच भरी होती थीं। और भारत के बड़े शहरों में आयोजित की जाती थीं। वर्ष में 4 बार ओशो दस दिवसीय ध्यान शिविरों का आयोजन करते थे जिनमे तीव्र ध्यान विधियों का अभ्यास कराया जाता था। पुणे के उनके आश्रम में जो शिष्य रहते थे उन्हें सन्यासिन के नाम से जाना जाता था। आध्यात्मिक जागृति के लिए विदेशों से आए युवक इनके आश्रम में सन्यासियों के वस्त्र धारण करते, रुद्राक्ष की मालाएँ पहनते तथा समूहों में नाचते गाते थे। शीघ्र ही ओशो के पश्चिमी देशों से आने वाले शिष्यों की संख्या काफी बढ़ गयी। 1970 के दशक के आखिर के वर्षों में ओशो का पुणे का 6 एकड़ में फैला आश्रम(ओशो इन्टरनेशनल मेडिटेशन रिसोर्ट ) उनके शिष्यों और अनुयायियों से भर गया। अब ये पुणे का आश्रम ओशो के लिए छोटा लगने लगा । इस कारण ओशो ने अपने नए आश्रम के लिए नयी जगह की तलाश शुरू की। लेकिन इनके विवादित विचारों के कारण वहाँ की स्थानीय सरकार ने ओशो को नए आश्रम के लिए जमीन देने में कई परेशानीया खड़ी कर दीं । हिन्दू धर्म के प्रति उनके विवादित विचार इतने बढ़ गए थे, कि 1980 में एक हिन्दू कट्टर वादी ने रजनीश की हत्या करने का भी प्रयत्न किया। 

ओशो और अमेरिका का रजनीशपुरम

अपने विवादित बयानो के कारण ओशो का भारत में सरकारों और अन्य धार्मिक समूहों द्वारा काफी विरोध होने लगा था।  इस कारण रजनीश को 1981 में अपने 2000 शिष्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र अमेरिका भागना पड़ा। अमेरिका के ओरेगॉन में रजनीश और उनके शिष्यों ने जिस शहर को बसाया उसे रजनीशपुरम के नाम से जाना जाता था। इस आश्रम में रजनीश की जीवन शैली अत्यंत भोग विलास की थी जहां उनके पास माना जाता  है की 90 से अधिक रोल्स रोयास कारें थीं । इनके अनुयाई हाथ जोड़े इनके आगे खड़े रहते थे। लेकिन यहाँ भी विवादों ने ओशो का साथ नहीं छोड़ा। रजनीश पर इस आश्रम में ड्रूग्स लेने और युवाओं को जबर्दस्ती ड्रग्स देने के भी आरोप लगे ।इनकी अनुयायी माँ आनंद शीला ने इन पर कई आरोप लगाए जिनमे आश्रम की कई लड़कियों के साथ संबंध बनाने का आरोप भी था।  इनके आश्रम में भारी मात्रा में हथियार भी प्राप्त हुए थे। रजनीशपुरम के पास के इलाकों के स्थानीय लोगों ने ओशो के आश्रम को बंद कराने का प्रयास किया। ओशो पर भूमि के गलत उपयोग के आरोप लगाए गए। लेकिन अमेरिका की कोर्ट में ओशो इस केस को जीत गए। परिणामस्वरूप ओरेगॉन की स्थानीय सरकार और ओशो के बीच मतभेद बढ्ने लगे।  इसी बीच ओशो के कुछ शिष्यों ने वहाँ व्यापक पैमाने पर धोखेबाज़ी, हत्या, आगजनी , चुनावों में धांधली और लोगो को जहर देना इत्यादि अनैतिक कार्य किए। जिसके कारण हजारों लोग प्रभावित हुए। जब ओशो के हजारों शिष्य पुलिस से बचने के लिए राजनीशपुरम से फरार हो गए तो वहाँ की पुलिस ने 1985 में रजनीश को गिरफ्तार कर लिया। इस समय ओशो स्वयं अमेरिका से बचकर निकलने की फिराक में थे, ताकि वे अमेरिका के अप्रवासन संबंधी क़ानूनों से बच सकें। किन्तु रजनीश के पास अपने बचाव में कहने के लिए कुछ नहीं था। और यही कारण था कि रजनीश को अपने अपराध स्वीकार करने पड़े, ताकि वे भारत वापस आ सकें। 

ओशो का अमेरिका से भारत वापस आना

ओशो ने भारत आने से पहले दूसरे कई देशों में अपना आश्रम स्थापित करने का असफल प्रयत्न किए। इस समय तक उनके शिष्यों और अनुयायियों की संख्या में काफी कमी आ चुकी थी। अंत में ओशो 1986 में भारत वापस आए। सितंबर 1985 में ओरेगॉन कम्यून को नष्ट कर दिया गया। ओशो कि व्यक्तिगत सचिव मा आनंदशीला भी उनके आश्रम से जा चुकी थीं । भारत में अमेरिका से वापस आने से पहले ओशो को उरुग्वे की सरकार ने अपने यहाँ स्थायी तौर पर निवास कि आज्ञा दी थी। किन्तु वाशिंगटन के दबाव के कारण उरुग्वे ने ओशो को शरण देने से मना कर दिया । इसी प्रकार ओशो को जमाइका और पुर्तगाल से भी निकाल दिया गया। कुल मिलाकर 21 देशों ने ओशो को अपने देश में  निवास देने से माना कर दिया । अंत में 29 जुलाई 1986 को ओशो को भारत वापस आना पड़ा । जनवरी 1987 में ओशो अपने पुणे स्थित आश्रम में वापस गए और अपने आश्रम का नाम बदलकर राजनीशधाम कर दिया। जहां ओशो ने पहली बार ध्यान शिविरों में प्रत्येक शाम को सम्पन्न उनके भाषणो के बाद होने वाले ध्यान को स्वयं क्रियान्वित कराते थे। यहाँ 1988 में ही ओशो ने ध्यान की एक नयी तकनीक शुरू कि जिसका नाम उन्होने “द मिस्ट्रिक रोज” दिया। रजनीश ने 1989 के शुरुआत में अपने आप को भगवान नाम से संबोधित किया जाना बंद करवा दिया । उनके शिष्यों ने रजनीश को भगवान के बदले ओशो नाम से संबोधित किया जो काफी प्रचलन में आ गया था।  ।किन्तु अमेरिका के जेलों में ओशो को दिये गए जहर का असर उनके स्वस्थ्य पर पड़ने लगा । जिसके बाद ओशो केवल मौन रूप से अपने अनुयायियों को दर्शन देने लगे । पुणे के आश्रम मे ओशो ने श्वेत वस्त्र धारी सन्यासियों का समूह तैयार किया जिसे “ओशो वाईट रोब ब्रदरहूड” के नाम से जाना जाता था। ओशो के दर्शनों को आए सभी अनुयायियों को इस सफ़ेद वस्त्र को धारण करने के लिए कहा जाता था। अपने भूतपूर्व जीवन और विवादों से पीछा छुड़ाने के लिए ओशो ने अपने रजनीश नाम का भी त्याग कर दिया था। उनके शिष्य उन्हे अब केवल ओशो नाम से ही संबोधित करते थे।  उनके आश्रम का भी नया नाम ओशो कम्यून इंटरनेशनल हो गया । 
जनवरी 1990 के दूसरे सप्ताह में ओशो का शरीर काफी कमजोर प्रतीत होने लगा । बुद्ध सभागार में दर्शन देने के लिए भी  ओशो नहीं आ पा रहे थे। । 19 जनवरी 1990 को ओशो कि नब्ज काफी कमजोर हो चली थी जिसके बाद शाम को पाँच बजे ओशो कि मृत्यु हो गयी। ओशो की मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने उनके शरीर को गौतम बुद्ध सभागार में दर्शनों के लिए रखा जहां उनके शिष्यों ने ओशो के अंतिम दर्शन किए। । उसके पश्चात उनका अंतिम संस्कार किया गया। ओशो के शिष्यों में दुनिया की कई जानी मानी हस्तियाँ शामिल थीं । 

ओशो रजनीश की जीवनी | Osho Rajneesh Biography In Hindi