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स्वतंत्रता सेनानी व धार्मिक नेता राम सिंह कूका का जीवन परिचय | Ram Singh Kuka Biography In Hindi

By N.j / About :-2 years ago

जब देश की आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तब देश के लिए देश के हर कोने से देश की आजादी की लड़ाई लड़ने क्रांतिकारी आगे आए. आजादी की उस अलख में शामिल होने के लिये भारत मां की भूमि पर कई क्रांतिकारियों ने जन्म लिया तब किसी भी व्यक्ति को यह नही कहा गया की आपको देश की आजादी की लड़ाई में शामिल होना है देश को अग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए खुद से प्रेरित होकर देश की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये तब पंजाब राज्य मे ऐसे कई क्रांतिकारी हुए जिन्होनें देश की आजादी के लिए अपना सम्पुर्ण जीवन देश के लिएं समर्पित कर दिया.

हम इस बात को अच्छे से जानते है की गांधी जी ने देश को गुलामी से मुक्त करवानें के लिएं अहिंसा का मार्ग अपनाया था ओर इसी मार्ग पर चलते हुए उन्होंने देश मे असहकार और सविनय अवज्ञा जैसे आदोंलनो के साथ देश की आजादी की लड़ाई की शुरूआत की. ऐसे ही आंदोंलनों को अपनी ताकत के रूप में गांधी जी से भी पहले देश के एक क्रांतिकारी ने किया थां उन्होंने अग्रेजों के खिलाफ बहिष्कार और असहकार निती का इस्तेंमाल करते हुएं अग्रेजों की नाक में दम कर दिया था देश की आजादी की इस लड़ाई की शुरूआत करने वाले थे राम सिंह कूका  - Ram Singh Kuka Story In Hindi तो चलिए दोस्तो जानते कैसे अहिंसा के पथ पर चलते हुएं राम सिंह कूका ने देश की आजादी की लड़ाई की शुरूआत की थी.

दोस्तो देश के बहादुर सैनिक होने के साथ राम सिंह कूका एक धार्मिक नेता भी थे. देश की आजादी के आंदोलन में राम सिंह कूका ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था. देश मे आजादी की लडा़ई लड़ने वालें राम सिंह कूका ने ही देश मे "कूका सिंह आंदोलन" की शुरूआत की थी. कूका सिंह द्वारा अग्रेजों के खिलाफ किये गये असहकार आदोंलन को अग्रेजों के खिलाफ सबसे प्रभावी आंदोलन माना जाता है.

देश के महान क्रांतिकारी कूका सिंह का जन्म पजांब के लुधियाना जिलें के भैनी गांव मे हुआ था. कूका सिहं बड़े होकर भारत की सिख रेजिमेंट मे भर्ती हो गए तब वो अपने भाई बालक नाथ से सेना में काफी प्रभावित हुए. बालक नाथ के निधन के बाद सेना मे मशीनरी के सम्पुर्ण कार्य की कार्यवाही राम सिंह कूका के ऊपर आ गई थी. सेना मे रहते हुए उन्होंने सबसे पहले सिख रेजिमेंट में होने वाले भेदभाव को खत्म करने की आवाज उठाई. कूका सिंह ने अतंर जाती विवाह और विधवा पुनर्विवाह जैसे सामाजिक मुद्दों को भी उठाया और लोगो को इस बारें मे प्रेरित किया.

अग्रेजों के खिलाफ आजादी की आवाज उठाते हुए राम सिंह कूका ने अग्रेंजो के खिलाफ एक बड़े स्तर पर असहकार आदोंलन की शुरूआत की कूका सिंह द्वारा शुरू किये गए इस आंदोलन में लोगो ने अंग्रेजी शिक्षा, अंग्रेजी कारखानों मे निर्मित होने वाले वस्त्र, और अंग्रेजी सरकार द्वारा निर्मित ऐसी कई चीजों का पुर्ण रूप से बहिष्कार कर दिया. दुसरी और कूका आदोंलन का विस्तार भी काफी तेजी से होने लगा . कूका आदोंलन की शुरूआत के बाद अंगेजी सरकार इससे काफी परेशान हो गई और इस आदोंलन की आवाज को बंद करने के लिए इस आंदोलन में शामिल सभी क्रांतिकारियों की हत्या करवा दी और आंदोलन के प्रमुख राम सिंह कूका को गिरफ्तार कर रंगून की जेल में डाल दिया बाद उन्हें रगून से आजीवन जेल मे रहने की सजा काटने के लिये अंडमान की जेल मे डाल दिया गया. यही 29 नवम्बर 1885 को उनकी मृत्यु हो गई.

उनकी मृत्यु के बाद कूका सिंह के अनुयायी और साथी कई क्रांतिकारीयों पर कूका सिंह  का इतना प्रभाव था की उनकी मौत हो जाने के बाद उनकी मृत्यु हो जाने की बात पर विश्वास नही हुआ सभी अनुयायियों की एक ही सोच थी की ऐसा कभी नही हो सकता कूका  सिंह आयेगें और उनका मार्गदर्शन करेंगे जिस तरह देश मे शुरू किये गएं असहकार सविनय आंदोलन में सभी का मार्गदर्शन किया था. दोस्तों तब राम सिहं कूका की इस बात को गांधी जी ने अच्छें से समझ लिया था की देश को इसी पथ पर चलते हुए आजादी दिलाई जा सकती है.

राम सिंह कूका के जीवन के बारें में जानकारी

राम सिंह कूका के पिता का नाम जस्सा सिहं सतगुरू था, इनका जन्म पजांब के भैनी साहिब के पास ही गांव रेयान में हुआ था. 

राम सिंह कूका ने जब युवा अवस्था में प्रवेश किया तब वो महाराजा रणजीत की बगागेल सेना मे शामिल हो गए. कूका सिंह अपने जीवन को काफी शांत और अनुशासन से जिते थे. बगागेल सेना मे रहते हुए उन्होंने हमेशा धार्मिक नियमों के साथ रहने की सलाह देते थे साथ ही सिख सेना के जवानों की नैतिकता को और बेहतर बनाने के लिये हमेशा जागरूक रहते थे. बगागेल सेना मे कूका सिंह राम सिंह राजकुमार के दल में शामिल थे और इसी वजह से साल 1841 में शाही खजानें को लाने के लिए लाहौर से पेशावर का सफर करना पड़ा था जब उनका दल पेशावर से वापस लोट रहा था तब उन्होंने हजरों के किलें पर आराम किया था इस किलें के सफर के लिए ऐसा माना जाता है की इस किलें मे महान सतं बालक सिंह जी से भेंट के लिए गए थे. जब कूका सिंह उस किलें में पहुचें तब सतं बालक सिंह ने कूका सिंह को देखतें ही कहा की ” मै कब से यहां तुम्हारी ही राह देख रहा हु“ 
तब सतं बालक सिंह ने कूका सिंह को एक मंत्र दिया और कहा की वो हमेशा इसे अपने पास रखें और जब जरूरत पड़े तब इस मंत्र के काबिल इंसान को यह मंत्र दे देना वहां से लोटने के बाद साल 1845 मे कूका सिंह ने खालसा की सेना को छोड़ दिया और अपने आगे के जीवन को आध्यात्मिक और ले जानें के लिए वापस अपने गांव भैनी चलें गये.

नामधारी शिख धर्म की स्थापना

राम सिंह कूका ने 12 अप्रैल को पांच अनुयायी को दीक्षा देते हुए नामधारी संप्रदाय की नीवं रखी. राम सिंह ने इस संप्रदाय का नाम नामधारी संप्रदाय इस वजह से रखा ताकी उनके अनयायी और लोग भगवान की भक्ति को मन और आत्मा मे बसा सकें और जिस व्यक्ति के पास नैतिकता के विचार होगें वो हमेशा समाज की भलाई करेंगा.

देश के स्वतंत्रता आदोंलन में राम सिंह कूका का मुख्य योगदान

अग्रेंजी सरकार के इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार राम सिंह कूका एक धर्म दार्शनिक होने के साथ समाज सुधारक थे और वो पहले भारतीय थे जिनहोंने अग्रेजो के खिलाफ अहिंसा और असहकार जैसी चीजों को अपनाते हुए अग्रेजो की सभी चीजों का बहिष्कार किया था.

राम सिंह कूका के सामाजिक कार्य

दोस्तो राम सिंह कूका ने आध्यात्मिकता की और कदम रखनें के बाद सबसे पहले ऐसे सरल विवाह की पद्धति की शुरूआत जिसें आंनद कानज कहां जाता है. इस विवाह पद्दती से लोगो के लिये विवाह का बोझ काफी कम हो गया था. उन्होंने विवाह पर दहेज पर पुर्ण रूप से बंदी लगा दी. विवाह मे शामिल सभी लोगो को लगंर में भोज दिए जाने की शुरूआत की ताकी कोई भी गरीब व्यक्ति अपनी बेटी की बिना चिंता के शादी करवा सकें.


स्वतंत्रता सेनानी व धार्मिक नेता राम सिंह कूका का जीवन परिचय | Ram Singh Kuka Biography In Hindi