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राव तुला राम : जिन्होंने 1 माह अंग्रेजो को किले में उलझाए रखा | Rao Tula Ram Full Story In Hindi

राव तुला राम : जिन्होंने 1 माह अंग्रेजो को किले में उलझाए रखा | Rao Tula Ram Full Story In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-2 months ago
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देश की राजधानी दिल्ली समेत कई  शहरों में आज भारत की आजादी के लिए लड़े कई वीर स्वतंत्रता सेनानियों के स्मारक बने हुए है। राजधानी में आप ने राव तुला राम मार्ग, राव तुला राम फ्लाईओवर व अस्पताल व कॉलेज भी देखे होगे। जब भी हम किसी मार्ग का नाम किसी व्यक्ति के साथ जुड़ा हुआ पाते है तब हमारे जहन में उस बारे जानने की इच्छा और अधिक हो जाती है। अब आप भी विचार कर रहे होगे की यह कौन है ? ऐसे कई लोग है जो देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ने वाले इस वीर योद्धा के बारे में नही जानते । तो चलिए दोस्तो आपके इस अधूरे ज्ञान को पूरा करते हुए जानते है इनके बारे में।

राव तुला राम का जन्म व परिवार | Rao Tula Ram Birth And Family

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राव तुला राम का जन्म 9 दिसंबर 1825 को रेवाड़ी रामपुरा में हुआ था। यह वो दौर था जब रेवाड़ी अहिरवाल का लंदन भी कहा जाता था। राव तुला राम के पिता का नाम पूर्ण सिंह था । जो यहां के राजा थें। राजा तुला राम की रियासत आज के दक्षिण हरियाणा तक फैली थी, इस रियासत में कुल 87 गांव शामिल थे।

14 वर्ष की आयु में बैठे राजगद्दी पर | Rao Tula Ram In Hindi

जब राव तुला राम महज 14 वर्ष के थे तब उनके पिता का उनके पिता का देहांत होने के वजह से उन्हें महज 14 साल की उम्र में राज्य की राजगद्दी पर बैठाया गया।

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एक तरफ तुला राम के देहांत के बाद उनकी रियासत को पाने के लिए अंग्रेजो ने योजना तैयार करना शुरु कर दी। अंग्रेजी सेना ने योजनाबद्ध तरीके से उनकी रियासत पर कब्जा जमाना शुरु कर दिया। जब इस बात की खबर राव तुला राम तक पहुंची तब उनका खून खौल ऊठा। अंग्रेजो से अपने राज्य को बचाने के लिए उन्होंने सेना बनानी शुरु कर दी। राव तुला की सेना में रेवाडी के लोगो ने भी अहम योगदान निभाया। राव तुला राम ने अंग्रेजो से मुकाबला करने के लिए करीब 500 सैनिको की सेना तैयार कर ली। जब देश में चल रही 1857 की आजादी की क्रांति मेरठ तक पहुंची तब राव तुला राम भी इसमें कूद पड़े। इस जंग में उनको साथ मिला दिल्ली के बादशाह का।

तब राव तुला राम ने अपनी रेवाड़ी की सेना व दिल्ली के बादशाह के भाई के साथ मिल अंग्रेजी हुकूमत को रेवाड़ी पर कब्जा करने के लिए सोचने के लिए मजबूर कर दिया। राव तुला राम ने फिर से रेवाड़ी व उसके आस-पास के राज्यों को अपने अधिन कर लिया। अंग्रेजी हुकूमत मेरठ की निराशा व लगातार राव तुला राम के बढ़ते कद से पूरी तरह से तिलमिला रही थी।

1 महिने तक आगे नही बढ़ने दिया अग्रेजी सेना को | Freedom Fighters Rao Tula Ram in Hindi

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राव तुला राम के बढ़ते कद व राज्यों के विस्तार से दुखी अंग्रेजी सेना ने एक भारी सेना बल के साथ ब्रिगेडियर जनरल सोबर्स को रेवाड़ी पर हमला करने के लिए भेजा। जब जनरल सोबर्स के नेतृत्व व में अग्रेजी सेना 5 अक्टूबर 1857 को पटौदी पहुंची तब उनकी पहली झड़प राव तुला राम की एक छोटी सी सैन्य टुकड़ी से हुई। पटौदी की इस झड़प में राव तुला राम की एक छोटी सी सैन्य टुकड़ी ने भारी सेना बल वाली अंग्रेजी सेना का पूरे 1 महिने तक पटौदी से आगे नही बढ़ने दिया। अंग्रेजी हुकूमत ने जब परिस्थितियां विपरीत होती हुए देख उन्होंने कर्नल जैराल्ड को पटौदी में लड़ने के लिए भेजा। 16 नंवबंर 1857 को कर्नल जैराल्ड की नेतृत्व वाली अग्रेजी सेना व राव तुला राम की सेना के बीच नसीबपुर में भंयकर युद्ध छिड़ गया ।

दोनो सेनाओं के बीच छिड़े इस भंयकर युद्ध में राव तुला राम सेना ने अग्रेजी सेना का जमकर मुकाबला किया व उन्हें कड़ी टक्कर दी। राव तुला राम के सेनिको का साहस देख अग्रेजी हुकूमत भी चौंक गई। इस युद्ध में अग्रेजी सेना के लिडर कर्नल जैराल्ड भी मारे गए। अग्रेजी हुकूमत ने युद्ध की विपरीत हालातों में चाल चलते हुए पास की सभी रियासतो को राव तुला के खिलाफ युद्ध में उनकी सेना के साथ लड़ने के लिए मना लिया। अग्रेजी सेना के छल से नारनौल के इस भीषण युद्ध में राव तुला राम के कई वीर सैनिक शहीद हो गए। तब राव तुला राम अग्रेजी सेना की पहुंच से दूर तात्या टोपे के साथ मिल गए। लेकिन अब भी राव तुला राम की अग्रेजो के प्रति बदले की भावना खत्म नही हुई थी।

देश की आजादी के लिए गए विदेशो तक | Rao Tula Ram Death Date

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राव तुला राम ने तात्या टोपे की शरण लेने के बाद देश को आजादी दिलाने के लिए वो सबसे पहले इरान के राजा के पास मदद के लिए गए। इरान से वो अफगानिस्तान पहुंचे राव तुला राम ने भारतीय सेना की मदद के लिए अफगानिस्तान के राजा को मना लिया। देश की स्वतंत्रता के लिए विदेशो तक जाने वाले राव तुला राम जब काबूल से गए तब वो वहां एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए और 23 सितंबर 1863 को काबूल में ही उनका देहांत हो गया। काबूल में निधन के बाद उन्हें शाही सम्मान के साथ अतिंम विदाई की रस्म निभाई गई।

देश से लेकर विदेश तक अग्रेजो खिलाफ आवाज ऊठाने व देश की स्वतंत्रता की आवाज को बुंलद करने वाले राव तुला राम का भारत की आजादी में एक बड़ा योगदान शामिल है। देश उनके इस योगदान को कभी नही भूला सकता ।

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