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देश की पहली महिला डॉक्टर रुक्माबाई की जीवनी | Rukhmabai Biography In Hindi

By N.j / About :-8 years ago

भारत की प्रथम महिला डॉक्टर रुक्माबाई के जीवन की सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में | Rukhmabai In Hindi

  • पूरा नाम - रूख्माबाई राउत
  • जन्म दिनांक - 22 नवंबर 1864
  • जन्म स्थान - बॉम्बे ( मुंबई )
  • माता का नाम - जयंतीबाई
  • पिता का नाम - जनार्धन पांडुरंग
  • करियर - भारत की पहली महिला चिकित्सक 
  • मृत्यु दिनांक - 25 सितम्बर 1955

दोस्तों आज हमारे समाज में महिलाओं को उनके हितो का पूर्ण अधिकार है। आज हर महिला को पुरुषों  के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने का पूर्ण हक़ है। लेकिन दोस्तों जब भारत देश अंग्रेजो की गुलामी की जंजीरो में कैद था तब महिलाओं को आज के समय के अधिकार नहीं थे। महिलाओं का घर से बाहर निकलना मना था। लेकिन दोस्तों उस समय भी देश में कुछ ऐसी महिलाएं थी जो अपने आप को बदलना चाहती थी। और देश में खुद की एक अलग पहचान बनाना चाहती थी।

उनके मन में एक सोच थी समाज में बदलाव आये और समाज का विकास हो। लेकिन उस समय ऐसा करने के बारे पुरुष भी नहीं सोच सकते थे । लेकिन इन सब से हटकर समाज सुधार के लिए एक महिला के मन में समाज सुधारू विचार उत्त्पन हुए परिस्थिति विपरीत होते हुए समाज के लिए एक बड़ा कदम उठाना पड़ा और वो अहम् कदम उठाया रुक्माबाई ने.

रुक्माबाई का शुरुआती जीवन  | Early life of Rukmabai

रुक्माबाई उस दौर में घर से बाहर ही नहीं निकली उन्होंने देश से बाहर जाकर भी डॉक्टर बनने का सम्मान प्राप्त किया था। रुक्माबाई की इस उपलब्धि के कारण 22 नवंबर 2017 को उनके जन्मदिन पर Google  ने अपने होम पेज पर उनका गूगल डूडल बना कर सम्मान किया था। तो चलिए दोस्तों रुक्माबाई के जीवन के बारे में और अधिक जानते है।

दोस्तों रुक्माबाई एक प्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक थी। रुक्माबाई ने देश में महिलाओं के कल्याण के लिए कई कार्य किये है। हम सीधी परिभाषा में कहे तो रुक्माबाई एक नारीवादी महिला थी। जिस समय भारत देश अंग्रेजो की गुलामी में जी रहा था उस समय देश में गिने चुने डॉक्टर थे उस दौर में पहली महिला डॉक्टर में रुक्माबाई का नाम आता है।

देश की पहली महिला डॉक्टर रुक्माबाई का जन्म 22 नवंबर 1864 एक मराठी परिवार में हुआ था। इनके पिताजी का नाम जनार्धन पांडुरंग था और इनकी माता का नाम जयंतीबाई था। जन्म के दो साल बाद ही रुक्माबाई के सिर से पिता का साया उठ गया था। और उस समय उनकी माँ की उम्र महज 17 साल थी। जयंतीबाई ने जनार्धन पांडुरंग के निधन के 6 साल ही बाद ही डॉ सखाराम अर्जुन से विवाह कर लिया । डॉ सखाराम अर्जुन डॉक्टर होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। ये शादी के समय बॉम्बे में रहते थे उस दौर में एक सुथार समाज ही ऐसा समाज था जिसमे विधवा महिलाओ को फिर से शादी करने की इजाजत थी।

जयंतीबाई के दूसरे के विवाह के बाद रुक्माबाई 11 साल की हो गई थी । तब उनका विवाह 19 वर्ष के दादाजी भिकाजी से कर दिया गया।

उस समय घर में बाहर जाने की अनुमति ना होने के कारन रुक्माबाई घर में ही फ्री चर्च मिशन लाइब्रेरी पुस्तकें लेकर पढ़ाई करती थी। उनके पिता दूसरे पिता डॉ सखाराम अर्जुन उस समय धार्मिक और देश में समाज सुधारको के साथ में रहते थे। अपने पिता के इस क्षेत्र में होने के कारण रुक्माबाई भी विष्णु शास्त्री पंडित जैसे महान समाज सुधराको से मिलती थी।

उस समय वे देश के पश्चिम इलाको में महिलाओं के विकास और उन्नति के लिए काम करते थे। रुक्माबाई अपनी माँ के साथ प्रार्थना समाज और आर्य महिला समाज की और से होने वाली हर मीटिंग में मौजूद रहती थी।

उस समय डॉ एडिथ पेची और रुक्माबाई एक दूसरे को अच्छे से जानते थे। एडिथ पेची जब भी जरूरत पड़ती तब भी रुक्माबाई की मदद करती थी। ये दोनों कामा हॉस्पिटल में काम करती थी। एडिथ पेची रुक्माबाई को आगे की पढ़ाई के लिए हमेशा प्रेरित करती थी और वो वो आगे पढ़ सके इसके लिए पैसे जमा करती थी।

चिकित्सक रुख्माबाई करियर | Rukmabai Career In Hindi

वहीं ईवा मैकलारेन और वाल्टर मैकलारेन महिला हित के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता थी और डफरिन फण्ड की महिलाएं भारत में रहने वाली महिलाएं जो चिकित्सक की सहायता करती थी। एडिलेड मन्निंग और साथ में कई लोगो ने मिलकर एक द रुक्माबाई डिफेन्स की नींव रखी इस संस्था की स्थापना के माध्यम से इन्होंने पैसे जमा किये. साल 1889 में रुक्माबाई डॉक्टर की शिक्षा लेने के लिए इंग्लैंड चली गई।

साल 1894 में रुक्माबाई ने लंदन स्कूल ऑफ़ मेडिसिन से डॉक्टर की डिग्री प्राप्त की और साथ ही कुछ समय रॉयल फ्री हॉस्पिटल में भी पढ़ाई की.

साल 1895 में अपनी डॉक्टर की शिक्षा पूर्ण होने के बाद रुक्माबाई भारत आ गई। भारत आते ही रुक्माबाई ने सूरत के महिला अस्पताल में अपने डॉक्टर करियर शुरुआत की . यहां काम करते समय उन्हें महिला वैद्यकीय में काम करने के लिए ऑफर आया लेकिन उन्होंने इसके लिए मना कर दिया रुक्माबाई ने साल 1929 में राजकोट के हॉस्पिटल में भी काम किया था। वहां से उन्होंने अपनी निवृत्ति ली और मुंबई में रहने लग गई.

रुक्माबाई का निधन | Rukmabai Death Date

भारत देश की पहली महिला डॉक्टर रुक्माबाई 25 सितम्बर 1955 मुंबई में निधन हुआ  दोस्तों रुक्माबाई काफी बहादुर और अपने कार्य के प्रति काफी होशियार थी। बचपन से रुक्माबाई की रूचि पढ़िए में ज्यादा रही और चीज आसानी से सीख जाती थी। यही कारण था से वो इंग्लैंड जा सकी और वहां डॉक्टर की पढ़ाई की रुक्माबाई डॉक्टर बनने के बाद खास बात ये रही की वो भारत आयी और देश की सेवा में लग गई.


देश की पहली महिला डॉक्टर रुक्माबाई की जीवनी | Rukhmabai Biography In Hindi