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स्वामी महावीर की जीवनी | Lord Swami Mahavira Biography In Hindi

स्वामी महावीर की जीवनी | Lord Swami Mahavira Biography In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-11 months ago
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स्वामी महावीर की जीवनी एवं संघर्ष  | Lord Mahavira Biography - Life History, Facts In Hindi 

  • नाम-          महावीर 
  • अन्य नाम-   वीर, अतिवीर, वर्धमान, सन्मति
  • जन्म-      चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
  • जन्म स्थान-    कुंडलग्राम, वैशाली के निकट
  • पिता का नाम-      राजा सिद्धार्थ
  • माता का नाम-     त्रिशला  देवी
  • ऐतिहासिक-    काल- 599-527 ई.पू.
  • शिक्षाएं-             अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद
  • मोक्ष की प्राप्ति-    कार्तिक अमावस्या
  • मोक्ष स्थान-       पावापुरी, जिला नालंदा, बिहार

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान महावीर थे । संसार को सत्य,अहिंसा और त्याग का पाठ पढ़ाने वाले महावीर ने जैन धर्म को एक नया आधार प्रदान किया । महावीर का स्थान साधकों में उतना ही ऊंचा हैं जितना कि भगवान बुद्ध का।  उन्होने स्वयं कठिन भिक्षु  जीवन जी कर भी संसारी मनुष्यों के कल्याण के लिए ज्ञान के उन रहस्यों को प्रकट किया जो अति दुर्लभ हैं । भगवान महावीर ने अपने से पूर्व हुए तीर्थंकर पार्श्वनाथ के धार्मिक सिद्धांतों को मान्यता दी साथ ही उसमें कुछ अवश्यमभावी परिवर्तन भी किए । उन्होने वैदिक कर्मकांड एवं ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता को अस्वीकार कर दिया । छठी शताब्दी ईसा पूर्व भारत के सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों तथा प्रचलित कर्मकांडो के प्रति लोगों के मन में पर्याप्त असंतोष था ।  भारतीय समाज में  जाती, वर्ण तथा धर्म के आधार पर कई  विभाजन हो गए थे । इनमे प्रचलित कुरीतियों के कारण लोगों के जीवन से ज्ञान के सही स्वरूप का लोप हो गया था । जनसाधारण इस वर्ण-गत , जातिगत एवं धार्मिक अंधविश्वासों से छुटकारा पाने के लिए बेचैन था ।ऐसे में कुछ युग – पुरुषों ने इसे समझा और अपने सुधारवादी मत की शिक्षा दी। महावीर स्वामी अपने काल के जैन विचारकों  में सर्वश्रेष्ठ थे ।

महावीर स्वामी का जीवन एवं परिवार

Mahavira Biography

महावीर स्वामी के पिता सिद्धार्थ तथा माता त्रिशला देवी थीं ।उनकी माता एक लिच्छवी राजकुमारी थीं । वर्धमान ने उच्च-स्तर की शिक्षा प्राप्त की तथा यशोदा नामक युवती से विवाह किया था । जिससे इन्हें एक पुत्री की प्राप्ति हुई थी । महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 600 वर्ष पूर्व वैशाली ( उत्तरी बिहार ) के कुंडाग्राम में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था । महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था । वे बचपन से ही सदाचारी, बुद्धिमान, विचारशील  एवं शांत प्रकृति के थे।  युवावस्था में ही वर्धमान जीवन – मरण, धर्म, संयम आदि विषयों के बारे में हमेशा सोचते और विचार विमर्श करते रहते थे । बचपन से ही अत्यंत गंभीर रहने वाले वर्धमान का मन घर पर नहीं लगता था । सांसारिक सुख उपलब्ध होने के बावजूद उनके मन में  बेचैनी थी ।समाज में व्याप्त आडंबर, धार्मिक अंधविश्वास, ऊंच -नीच की भावना, जीवों के प्रति हिंसा और चरित्र पतन के कारण वे दुखी रहते थे । यज्ञ एवं कर्मकांड के नाम पर पशुओं की हत्या वर्धमान के लिए असह्य था । इन्होने माता – पिता के देहांत के बाद सांसारिक मोह-माया को त्याग कर अपने बड़े भाई नंदीवर्धन की आज्ञा लेकर 30 वर्ष की आयु में सन्यास धारण कर लिया।

सम्पूर्ण  भारत में किया जैन धर्म का प्रसार

Mahavira Biography

गृह त्याग के बाद महावीर स्वामी सत्य और शांति  की खोज में निकल पड़े ।सबसे पहले इन्होने केवल एक वस्त्र धारण किया, किन्तु  13 महीनों के पश्चात उस वस्त्र का भी त्याग कर नग्न साधक के रूप में भटकते रहे । 12 वर्ष तक एक सन्यासी का जीवन जीते हुए कठोर व्रतों का पालन करते हुए तपस्या की । सन्यास के 13 वें साल में 42 वर्ष की आयु में उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई । इसके पश्चात उन्हें ‘महावीर’ एवं ‘जिन’ के नाम से संबोधित किया जाने लगा । वे ‘निर्ग्रंथ’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुए । कोशल एवं मगध तथा सुदूर पूर्व के राज्यों में इन्होने अधिकांश उपदेश दिये । महावीर का मानना था की जीव और अजीव दो आधारभूत तत्व हैं ।  उन्होंने तपस्या का मार्ग अपना कर यह जाना की कठोर तपस्या से ही मन के विकारों जैसे की काम, क्रोध, लोभ, मद तथा मोह को समाप्त किया जा सकता है । अपनी इंद्रियों को अपने नियंत्रण में कर लेने के कारण वे ‘महावीर’ या ‘जिन’ कहलाने लगे । इनके द्वारा प्रचार किए गए धर्म को जैन –धर्म के नाम से जाना जाता है । जैन धर्म की मान्यता के अनुसार जैन धर्म में भगवान महावीर से पूर्व तेईस तीर्थंकर हुए हैं । महावीर स्वामी जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर माने जाते हैं । तीर्थंकर का अर्थ है –दुख जीतने के पवित्र मार्ग को दिखाने वाला । ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महावीर स्वामी 30 वर्ष तक धर्म प्रचार के कार्य को करते रहे । वर्ष में 8 महीने तक वे अलग अलग स्थानों में भ्रमण कर अपने मत का प्रचार किया करते थे और वर्षा ऋतु के 4 महीनों में किसी एक स्थान पर नगर में रुककर उपदेश दिया करते थे । उनके द्वारा किए गए प्रचार के कारण ही भारत के सम्पूर्ण राज्यों में जैन धर्म का प्रचार प्रसार होता गया । जैन धर्म के मतानुसार महावीर स्वामी ने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक लोगों को ज्ञान देने का कार्य  किया ।

मोक्ष प्राप्ति

Mahavira Biography

जैन धर्म के त्रि- रत्न हैं – सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान तथा सम्यक चरित्र। महावीर स्वामी के द्वारा दिये गए उपदेशों ,उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों तथा दार्शनिक विधानों का समाज पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा । उनके समय में ही जैन धर्म के प्रचार प्रसार हेतु उत्तरी भारत के विभिन्न स्थानों में कई  केन्द्रों की स्थापना हो गयी थी । कई राजवंशों एव प्रभावशाली व्यक्तियों ने भी महावीर स्वामी से उपदेश प्राप्त किया था । 72वर्ष  (468 ईसापूर्व ) की आयु में महावीर स्वामी नें पटना के निकट पावापुरी नामक  स्थान में ध्यान में लीन होकर अपने शरीर का त्याग कर दिया । महावीर स्वामी ने कठोर सन्यास एवं घोर तपस्या पर बल दिया है । उनका मानना था की कठोर तपस्या के द्वारा ही निर्वाण की प्राप्ति की जा सकती है । सृष्टि  के बारे में उनका विचार था की यह संसार किसी रचयिता द्वारा नहीं बनाया गया है । यह संसार एक शाश्वत  नियम के द्वारा क्रियाशील है । महावीर स्वामी का यह मत था कि सभी वस्तुएँ चाहे वे सजीव हों या निर्जीव उनके अंदर आत्मतत्व होता है । सभी वस्तुओंको कष्ट का अनुभव होता है । उन्होंने वैदिक कर्मकांड को अस्वीकार करते हुए वेदों की अपौरुषता एवं ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को पूर्णतः अस्वीकार कर दिया ।उन्होंने उपदेश दिया की जैन मार्ग के अनुयायी कृषि से बचें क्योंकि इससे पौधों एवं कीड़े –मकोड़ों के प्रति हिंसा होती है । परंपरा के अनुसार महावीर द्वाराप्रतिपादित सिद्धान्त चौदह पूर्वों में विभक्त हैं । महावीर के ग्यारह शिष्यों को गण-धरके नाम से जाना  जाता था ।

जैन धर्म के प्रसिद्ध होने में एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि  जैन तीर्थंकरों विशेषतः महावीर स्वामी ने अपने उपदेश जन सामान्य को प्राकृत भाषा में दिये न की संस्कृत भाषा में । साधारण और आसानी से अपना लिए जाने वाले उपदेशों द्वारा साधारण जनता व्यापक रूप से प्रभावित हो जाती । इसके अलावा राजाओं द्वारा दिये जाने वाले संरक्षण के कारण महावीर स्वामी के उपदेश भारत के सभी स्थानों में फैल गए । महावीर स्वामी बिंबिसार एवं अजातशत्रु के दरबार में  प्रायः जाया करते थे । इनका चिन्ह सिंह माना जाता है । इनके उपदेशों का मूल उद्देश्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति दिलाना तथा शाश्वत आनंद की स्थिति में पहुचना था । उनके अहिंसा, सत्य,अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे सिद्धान्त विश्व व्यापी हैं । उन्होनें देवी-देवताओं की पुजा का विरोध किया था । महावीर ने स्त्री एवं पुरुष दोनों को ही आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने के लिए बराबर का अधिकारी माना था ।