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सम्राट हर्षवर्धन की जीवनी | Harshavardhana Biography In Hindi

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सम्राट हर्षवर्धन की जीवनी एवं प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ | All About Harshavardhana Biography, History and Facts In Hindi
- नाम- सम्राट हर्षवर्धन
- जन्म- 590 ईस्वी
- पिता का नाम- प्रभाकर वर्धन
- माता का नाम- यशोमती
- पत्नी का नाम- दुर्गावती
- संतान- भाग्यबर्धन, कल्याणबर्धन (हर्षबर्धन के दरबार के ही एक मंत्री अरुणाश्वा ने दोनों की हत्या कर दी थी)
- हर्षवर्धन के भाई- राज्यवर्धन (हरियाणा के थानेसर के राजा)
- बहन- राज्यश्री (मौखरी के राजा ग्रहवर्मन से विवाह हुआ था)
- धर्म- हिंदू ब्राह्मण लेकिन बाद में बौद्ध धर्म में परिवर्तित हो गए
भारत के महान सम्राटों में सम्राट हर्ष की गिनती उन लोगों में होती है जिन्होने अपनी शासन व्यवस्था और विविध कलाओं में कई नए मानक और कीर्तिमान तय किए । थानेश्वर और कन्नौज का यह सम्राट जितना राजधर्म में निपुण था उतना ही अहिंसावादी और विद्वानों का आदर करने वाला था । यही कारण था कि हर्ष के काल में वास्तुकला, शिल्प, गृहनिर्माण के अतिरिक्त विविध कलाओं में भी भारत में बहुत उन्नति हुई । हर्ष के शासनकाल में भारत का आंतरिक शासन सुव्यवस्थित हो गया था जिसके कारण कला, संस्कृति, व्यापार, संगीत आदि क्षेत्रों में बहुमुखी विकास हुआ । हर्ष के साम्राज्य में होनेवाले इस व्यापक विकास और उन्नति का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ा । यही कारण था कि दूसरे देशों से भी विद्वानों और यात्रियों ने हर्ष के दरबार कि शोभा बढ़ाई और उनके शासन काल का अपने लेखों में काफी प्रशंसा की है ।
सम्राट हर्षवर्धन का आरम्भिक जीवन
हर्ष या हर्षवर्धन के बारे में हमें विस्त्रत जानकारी हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट द्वारा रचित “हर्ष चरित “ से प्राप्त होती है । हर्ष का जन्म 590 ईस्वी में रानी यशोमती के गर्भ से हुआ था । इनके पिता प्रभाकर वर्धन थानेश्वर के योग्य और प्रतापी राजा थे जिन्होने भारत पर आक्रमण करने वाले हूणो का बड़ी सफलता से दमन किया था । पिता की मृत्यु के बात हर्ष के बड़े भाई राज्यवर्धन गद्दी पर बैठे । इसी बीच मालवा के देवगुप्त ने हर्ष की छोटी बहन राज्यश्री के पति कन्नौज के मौखरी वंश के शासक गृहवर्मा की हत्या कर दी । गृहवर्मा कन्नौज का राजा था । राज्यश्री को कैद कर के देवगुप्त ने कारागार में डाल दिया था । इस अपमान का बदला लेने के लिए राज्यवर्धन ने मालवा पर चढाई कर दी और युद्ध में विजयी हुआ । किन्तु लौटते समय बंगाल के राजा शशांक द्वारा मार डाला गया । हर्ष अभी सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ था । हर्ष अपने भाई राज्यवर्धन की मृत्यु पर अत्यधिक दुखी हुआ और राजपाट छोड़ने को तैयार हो गया । किन्तु मंत्रियों के बहुत समझने पर हर्ष ने “शिलादित्य” उपनाम ग्रहण कर 606 ईस्वी में कन्नौज के सिंहासन पर बैठा । सम्राट बनने के बाद हर्ष के सामने दो प्रमुख कार्य थे, एक तो अपनी बहन को वापस लाना और दूसरा अपने भाई के हत्यारों को दंड देना । अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हर्ष ने सबसे पहले बंगाल के राजा शशांक को पराजित किया । इसके बाद राजा हर्ष ने अपनी बहन का पता लगाकर उसे अपने पास बुलाकर जीवन पर्यंत उसे अपने पास ही रखा । इसके बाद हर्ष ने उत्तरी भारत के विभिन्न राज्यों को जीत कर अपने अधिकार में कर लिया । दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने में हर्ष असफल रहा । ऐहोल प्रशस्ति (634 ईस्वी ) से पता चलता है की बादामी के चालुक्यवंशी राजा पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को ताप्ती नदी के किनारे पराजित किया था ।
सम्राट हर्षवर्धन का साम्राज्य विस्तार
क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाए तो सम्राट हर्ष का राज्य भारत के राज्यों में 8वां सबसे बड़ा राज्य था । पुष्यभूति वर्धन के द्वारा शुरू किए गए वर्धन वंश की शुरुआत छठी शताब्दी में थानेश्वर में हुई थी । हर्ष ने लगभग 41 वर्षों तक शासन किया था । हमें बाणभट्ट के हर्ष चरित से पता चलता है कि हर्ष के साम्राज्य का विस्तार पंजाब, कश्मीर, नेपाल, और वल्लभीपुर तक था। हर्ष के समय में हुए प्रयाग के दान समारोह का उल्लेख करना हर्ष के जीवन चरित को समझने के लिए बहुत आवश्यक है । प्रयाग में हर्ष ने बहुत बड़े दान समारोह का आयोजन किया था । दूर-दूर से लोग दान दक्षिणा पाने कि लालसा में एकत्र हुए थे । कहा जाता है कि सम्राट हर्ष ने अपना सब कुछ जब दान कर दिया था तो एक व्यक्ति ऐसा रह गया था जिसे दान में कुछ नहीं मिला था । किन्तु उस व्यक्ति को भी हर्ष ने अपने वस्त्र उतारकर दान कर दिया था । इसके बाद दानवीर हर्ष कि ख्याति फैल गयी थी । हर्ष एक प्रजावत्सल राजा था । प्रजा के हिट के लिए उसने अनेक कार्य किए । हर्ष के कार्यों और राजव्यवस्था के बारे में चीनी यात्री हुएनसांग ने काफी विस्त्रत में लिखा है जो 630 ईस्वी में भारत आया था । प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए हर्ष स्वयं व्यक्तिगत रूप से उसमे रुचि लेता था । हर्ष चरित से पता चलता है कि सम्राट की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद थी जो हर्ष को सलाह देने का कार्य करती थी । हर्ष का सेनापति सिंघनाद तथा युद्ध और शांति का मंत्री अवन्ती था ।
हर्ष के राज के अन्य प्रमुख अधिकारी इस प्रकार थे –महासामंत, विषयपति , राजस्थानीय,दौस्सधनिक, कुमारामात्य, सर्वगत, कुंतल, हस्तगत , स्कंदगुप्त इत्यादि ।
हर्ष की साहित्यिक रचनाएँ
हर्ष स्वयं विद्वान होने के साथ-साथ विद्वानों का आश्रयदाता भी था । हर्ष ने संस्कृत भाषा में “रत्नावली “, “नागानन्द” और “प्रियदर्शिका” नामक नाटक लिखे । हर्ष ने इसके साथ एक व्याकरण ग्रंथ की रचना भी की है । प्राचीन भारत की साहित्यिक समालोचना में हर्ष को उच्च श्रेणी का कवि माना जाता है । इसके अलावा कुछ निबंध भी हैं जिसके सृजन का श्रेय भी हर्ष हो दिया जाता है । विद्वान कवियों के अतिरिक्त अच्छे धर्म प्रचारक भी उसकी राजसभा की शोभा बढ़ाते थे । इनमे सागरमाती, प्रज्ञारश्मि, हवेनसांग इत्यादि सम्मिलित थे।
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हर्ष के समय में भारत को अपने इतिहास के एक अत्यंत भव्य युग को देखने का सौभाग्य मिला । हर्ष धार्मिक विषयों में उदार था । वह बुद्ध की मूर्ति के साथ-साथ सूर्य और शिव की मूर्तियों का भी सम्मान करता था। उसने नगरों और गाँव के इलाकों में तथा राजमार्गों पर धर्मशालाएँ बनवाई जिनमे भोजन और चिकित्सा का प्रबंध रेहता था । हर्ष ने अपने राज्य में सर्वत्र मांसाहार पर रोक लगा दी थी तथा जीव हिंसा करने वालों पर कठोर दंड की व्यवस्था कर दी थी । हर्ष के नगरों में कन्नौज, प्रयाग, मथुरा, थानेश्वर, रामपुर, अयोध्या, हरिद्वार, पीलीभीत, कौशांबी, वाराणसी, आदि विशेष रूप से समृद्ध और विकसित थे।
सम्राट हर्ष अपनी राष्ट्रीय आय का एक चौथाई भाग शिक्षा पर खर्च करते थे । एक चौथाई भाग राज्य कर्मचारियों को वेतन और उपहार के रूप में दिया जाता था । इसके अलावा बचे हुए दो भाग का उपयोग हर्ष अपने लिए तथा धार्मिक कार्यों के लिए करते थे। सम्राट हर्ष के राजस्व के स्त्रोत तीन प्रकार के कर थे-हिरण्य, भाग और बलि। इनमें से भूमिकर जिसे भाग के रूप में जाना जाता था, पदार्थ के रूप में तथा हिरण्य नगद के रूप में लिया जाता था। हर्ष ने भूमि पर लगने वाले कर को भूमि की आय का 1/6 वां भाग निर्धारित किया था। माना जाता है कि हर्ष ऐसे अंतिम बौद्ध सम्राट थे जिन्होने विस्त्रत राज्य की स्थापना की थी।
सम्राट हर्षवर्धन की जीवनी | Harshavardhana Biography In Hindi




