मराठा योद्धा तानाजी मालुसरे का सम्पूर्ण जीवन परिचय | Tanaji Malusare History In Hindi

मराठा योद्धा तानाजी मालुसरे का सम्पूर्ण जीवन परिचय | Tanaji Malusare History In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-10 days ago
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शिवाजी के वचनों पर सिंहगढ़ किले को जीतने के लिए लड़ते-लड़ते हो गए थे वीरगति को प्राप्त | Tanaji Malusare Biography In Hindi, Tanaji Malusare

  • नाम - तानाजी मालुसरे
  • जन्म दिनांक - 1600 AD
  • जन्म स्थान - गोदोली गांव , महाराष्ट्र
  • पिता का नाम - सरदार कलोजी
  • माता का नाम - पार्वतीबाई
  • प्रसिद्धि का कारण - सिंहगढ़ का युद्ध
  • मृत्यु दिनांक - 1670 AD`1

दोस्तों भारत के इतिहास में कई बड़े योद्धाओं ने जन्म लिया है और आज उनकी वीरता की व्याख्या हमें इतिहास में मिल जाती है । लेकिन दोस्तों वक्त के साथ-साथ कई वीर योद्धाओं के राष्ट्र के प्रति त्याग और बलिदान को भुला दिया गया। उन योद्धाओं में से एक योद्धा थे  तानाजी मालुसरे ये मराठा साम्राज्य के सेनापति थे। दोस्तों जब भी मराठा साम्राज्य को याद किया जाता है तब सभी के जेहन में एक नाम ही नाम आता है और वो है छत्रपति शिवाजी महाराज लेकिन दोस्तों आप भूल रहे है वो तानाजी ही थे जिनकी वजह से शिवाजी सिंहगढ़ किला जो मुगलों का सबसे ताकतवर और मजबूत किलो में एक था उस पर विजय प्राप्त की थी।

तानाजी के बारे में हम पूर्ण रूप से कहें तो तानाजी एक मराठा साम्राज्य के ईमानदार और निष्ठावान कोली सरदार थे। तानाजी शिवाजी से अपनी बचपन की दोस्ती और उसकी कर्तव्यनिष्ठा के लिए मराठा साम्राज्य में काफी मशहूर थे। शिवाजी के विदेशी गुलामी में भारत मुफ्त मिशन में भी तानाजी की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

तानाजी मालुसरे का जन्म एवं परिवार | Tanaji Malusare Birth And Family Name

मराठा के इस महान योद्धा का जन्म 1600 ईसवी में महाराष्ट्र के सतारा जिले के गोदोली के गांव (जवाली तालुका) में हुआ था।  तानाजी का जन्म एक हिन्दू कोली परिवार में हुआ था। तानाजी के पिता का नाम कलोजी एवं इनकी माता का नाम पार्वती बाई था। तानाजी में बचपन से एक वीर योद्धा बनने के लक्षण दिखाई दे रहे थे जब  तानाजी छोटे थे तब उन्हें तलवारो के साथ खेलने का काफी शौक था। इसी शौक के चलते उनकी मित्रता छत्रपति शिवाजी से हो गई थी। बाद में शिवाजी ने तानाजी को अपनी सेना में सेनापति और मराठा साम्राज्य का मुख्य सुभादार (किल्लेदार ) नियुक्त कर दिया था।

तानाजी मालुसरे द्वारा लड़ा गया सिंहगढ़ का निर्णायक युद्ध | Tanaji Malusare Fight of Sinhagad

दोस्तों सिंहगढ़ (कोंढाणा) तानाजी के जीवन का वो युद्ध है जो तानाजी को इतिहास में मशहूर बनाता है। यह युद्ध 1670 में लड़ा गया था। जब यह युद्ध लड़ा जा रहा था तब तानाजी अपनी पुत्री के विवाह में व्यस्त थे। विवाह के दौरान ही जब तानाजी को मराठा साम्राज्य की और से इस युद्ध की सूचना मिली । सूचना मिलते है तानाजी अपनी पुत्री का विवाह बीच में ही छोड़कर अपने मामा शेलार के साथ इस युद्ध के लिए निकल पड़े । छत्रपति शिवाजी की एक जिद थी की सिंहगढ़ (कोंढाणा) के इस किले को किसी भी हालात में दोबारा हासिल करना है । शिवाजी मित्र तानाजी को कहते है तानाजी "कोंढाणा किला अब मुगलों से आजाद करना उनकी इज्जत की बात बन गया है यदि हम इस किले को दोबारा नहीं जीत पाएं तो हम पर पूरा मराठा साम्राज्य हंसेगा और हमें उनके कई तानो का सामना करना पड़ेगा तानाजी ने शिवाजी की ये बात सुन कर कसम खाई की अब इस किले को मुगलों से आजाद करना ही उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य है।

Tanaji Malusare History

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कोंडाना का किले का निर्माण काफी विषम हालातो में बना हुआ था। और यहीं कारण है की शिवाजी के लिए इस किले को मुगलों से मुफ्त करना काफी महत्वपूर्ण हो गया था। इस किले के सुरक्षा के लिए मुग़ल सेना के 5000 से भी अधिक सैनिक तैनात थे और इस किले की कमान मुगलों ने उदयभान राठौर के हाथो में दे रखी थी । उदयभान एक राजपूत शासक थे लेकिन अपने स्वार्थ के चलते उदयभान ने मुस्लिम धर्म अपना लिया था। इस किले में एक ऐसा भाग था जो मुगलों  की सुरक्षा से कोसो दूर था। वो स्थान था ऊंची चट्टानों से सुरक्षित इस किले का पश्चिम भाग था।

इसका फायदा उठाते हुए तानाजी जी ने निश्चय किया की हम उन चट्टानों पर गोहपड की सहायता से हम किले के अंदर घुसेंगे । दोस्तों गोहपड लकड़ी और रस्सी की सहायता से बनी हुई होती है और ये दिवार पर चिपकने का काम करती है और इससे  बड़ी चट्टानों पर चढ़ने में सहायता मिलती थी । इसकी सहायता से एक बार में कई सैनिक चट्टान पर चढ़ जाते थे।

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तानाजी युद्ध में रात होने का इंतजार कर थे और रात होते ही तानाजी अपने 342 से अधिक सैनिको के साथ इस किले में प्रवेश कर जाते है। जब ये बात मुगलों के  रक्षक उदयभान को पता लगी तब तानाजी की सेना और मुगलों की सेना के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया लेकिन दोस्तों इस युद्ध में उदयभान ने धोखे से तानाजी पर हमला कर दिया था और उनकी मौत हो गई । तानाजी की इस मौत का बदला उनके मामा शेलार ने उदयभान को मार कर लिया और एक लंबे युद्ध के बाद मराठा सैनिक ये युद्ध जीत जाते है। इस युद्ध को जीतने के बाद शिवाजी काफी हताश हो गए और उन्होंने कहा "गढ़ आला पण सिंह गेला” अर्थात्  की किला तो हाथ आया लेकिन मेरा सिंह तानाजी चला गया.

तानाजी मालुसरे के स्मारक | Tanaji Malusare Memorial List

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कोंडाना के किले पर विजय प्राप्त करने के बाद  शिवाजी ने इस किले का नाम बदलकर अपने मित्र की याद में "सिंहगढ़" रख दिया । और शिवाजी ने पुणे नगर के "वाकडेवाडी" नामक स्थान का नाम बदलकर "नरबीर तानाजी वाडी" कर दिया था। अपने मित्र के  इस त्याग को देखकर शिवाजी ने महाराष्ट्र में कई स्मारकों की स्थापना की.

तानाजी की वीरता पर बना रही है बॉलीवुड फिल्म | Tanaji Malusare Movie Bollywood.

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दोस्तों तानाजी की वीरता इतनी लोकप्रिय है की बॉलीवुड जगत के फेमस अभिनेता अजय देवगन ने तानाजी मालुसरे पर  फिल्म बनाने वाले है और इसका टाइटल "तानाजी  द अनसंग वार्रीयर" और साल 2017 में इस फिल्म को बनाने की घोषणा की इस फिल्म को  ॐ राउत डायरेक्ट कर रहे है । रावत पहले भी बॉलीवुड में पहले भी लोकमान्य तिलक के जीवन पर मराठी फिल्म "लोकमान्य एक युग पुरुष" बना चुके है तानाजी पर बन रही ये फिल्म साल 2019 में पर्दे पर रिलीज होगी.दोस्तों इसके अलावा भी साल 1993 में आयी मराठी फिल्म "सिंहगढ़" तानाजी की वीरता का चित्रण किया जा चूका है। इस फिल्म का निर्देशन वी. शांताराम ने किया था। इस फिल्म में मास्टर विनायक, बाबुराव पंधरकर ने तानाजी का किरदार निभाया था।

तानाजी मालुसरे पर आधारित कविताएं । Tanaji Poems In Hindi

दोस्तों मध्यकाल युग में कवी तुलसीदास ने तानाजी की वीरता पर "पोवाडा" नामक कविता की रचना की थी।

समाजसेवक विनायक दामोदर सावरकर ने 14 साल की उम्र में तानाजी पर एक गाथागीत लिखा "बाजीप्रभु" इस पर उस समय ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था । लेकिन ये बाद में 24 मई 1946 को वापिस ले लिया गया।

तानाजी मालुसरे के त्याग और वीरता पर कविता.

वीर सावरकर के द्वारा तानाजी पर लिखी गई कविता के अंश

"जयोऽस्तु ते श्रीमहन्‌मंगले शिवास्पदे शुभदे ।
स्वतंत्रते भगवति त्वामहम् यशोयुतां वंदे ॥१॥
स्वतंत्रते भगवती या तुम्ही प्रथम सभेमाजीं ।
आम्ही गातसों श्रीबाजीचा पोवाडा आजी ॥२॥
चितूरगडिंच्या बुरुजानो त्या जोहारासह या ।
प्रतापसिंहा प्रथितविक्रमा या हो या समया ॥३॥
तानाजीच्या पराक्रमासह सिंहगडा येई ।
निगा रखो महाराज रायगड की दौलत आयी ॥४॥
जरिपटका तोलीत धनाजी संताजी या या ।
दिल्लीच्या तक्ताचीं छकलें उधळित भाऊ या ॥५॥
स्वतंत्रतेच्या रणांत मरुनी चिरंजीव झाले ।
या ते तुम्ही राष्ट्रवीरवर या हो या सारे ॥६॥"   - वीर सावरकर 

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