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छुपा इतिहास नेहरू नहीं बरकतुल्ला खान थे पहले प्रधानमंत्री | Barkatullah khan Prime Minister In Hindi

By N.j / About :-2 years ago

आज हम स्कूल के बच्चों से लेकर आप से यह सवाल करें कि भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन थें ? तो यह आपके लिए आसान सा सवाल होगा और आप कहेगें पंडित जवाहर लाल नेहरु। वर्ष 1947 में देश की आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री के रुप में जवाहरलाल नेहरु का नाम आज हमारी इतिहास से जुड़ी हर सामग्री में लिखा हुआ है।

लेकिन दोस्तो इतिहास का एक पन्ना ऐसा भी जिसमें जिसे आज तक पढ़ नही पाएं उसमें लिखा गया है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री का नाम पंडित नेहरु नही बल्कि बरकतुल्ला खान लिखा हुआ है! दोस्तो यह सुनकर थोड़ा आप चौंक गए होगें लेकिन आपको बता दे कि यह वो सत्य है जिसे झुठलाया नही जा सकता। भारत के पहले प्रधानमंत्री के रुप में पंडित नेहरु से पहले उनका नाम घोषित कर दिया गया था।

अब आप सोच रहे होगें कि आज तक हमने इतिहास में यही पढ़ा फिर यह बरकतुल्ला खान कौन है? जिसे सबसे बड़े लोकतंत्र देश भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बरकतुल्ला खान का नाम पंडित नेहरु से पहले प्रधानमंत्री में नाम कैसे आया ? तो चलिए दोस्तो इस सवाल कि गुत्थी को समझने के लिए इस पूरे इतिहास को एक फिर से रिव्यू करते है।

भारत के पहले प्रधानमंत्री का नाम बरकतुल्ला खान था ? इस सवाल के बारे में ज्यादा न सोचते हुए गूगल सर्च भी न करें । इससे पहले आप इस बात को जान ले की जब भारत के पहले प्रधानमंत्री के रुप में बरकतुल्ला खान को चुना गया तब भारत में बिट्रिश शासन था। वही आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु थें। इसलिए भारतीय इतिहास में पंडित जवाहरलाल नेहरु का उल्लेख ज्यादा मिलता है। इतिहास की इसी जानकारी को पढ़ और सुन हमने इसके बारे में जाना लेकिन दोस्तो बरकतुल्ला खान का नाम आज इतिहास के पन्नों मे तो नही लेकिन हम इसे भुला नही सकते । तो चलिए जान लेते है कौन थें बरकतुल्ला खान ?

भारत को एक आजाद देश बनाने में बिट्रिश शासन में भारत के पहले प्रधानमंत्री रहें बरकतुल्ला खान का भी अहम योगदान था। बरकतुल्ला खान का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल के एक रियासत परिवार में हुआ था। बरकतुल्ला की स्कूली शिक्षा सुलेमानिया स्कूल से हुई जहां से उन्होंने अरबी, फारसी व अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया। 
अपनी शिक्षा के बाद बरकतुल्ला खान मुस्लिम लीग के लिए दुनिया भर में ख्याति प्राप्त कर चुके जमालुद्दीन अफगानी के विचारो से काफी प्रभावित थें। उनके विचारो पर चलते हुए बरकतुल्ला खान ने दुनिया भर में रह रहें मुसलमानो में एकता स्थापित करने ठानी। इस बीच उनके पिता का देंहात हो गया, बरकतुल्ला खान पर अब जिम्मेंदारियां बढ़ गई उनके एक बहन थी उनका भी निकाह हो गया।

बरकतुल्ला खान के जीवन में पहले पिता व फिर बहन का निकाह के बाद वो बिलकुल अकेले हो गए, अब उनके जीवन में उनसे कुछ जुड़ा था तो वह था उनका लक्ष्य। बस एक दिन सब कुछ छोड़ वो भोपाल से मुंबई चले गए। मुंबई में रहते हुए बरकतुल्ला खान ने बच्चों को ट्युशन पढ़ाने शुरु किया व खुद भी अग्रेंजी भाषा का ज्ञान लेते रहे। मुंबई के बाद बरकतुल्ला खान ने इंग्लैंड जाने का विचार बनाया।

बता दे कि बरतुल्ला खान इंग्लेड तो अपनी आगे कि पढ़ाई को पूरा करने के मकसद से गए थें । इंग्लेंड पहुंचने के बाद बरकतुल्ला खान के जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई। इंग्लेंड पहुंचने के बाद उनकी मुलाकात भारत की आजादी के क्रान्तिकारियों के मुख्य संरक्षक श्याम जी कृष्ण वर्मा के साथ हुई।

श्याम जी कृष्ण वर्मा से मुलाकात के बाद बरकतुल्ला खान के मन देश के देश भक्ति व एक आजाद भारत के निमार्ण की चेतना का भाव जगा। इस मुलाकात के बार बरकतुल्ला खान ने भारत की स्वतंत्रता के प्रति क्रांनिकारी विचारो का प्रसार करने के लिए कलम उठा ली।  अपने क्रांतिकारी भावों के चलते बरकतुल्ला खान का नाम कम समय में ही कई क्रांतिकारी जानने लगे।

अपनी कलम के दम पर भारत की स्वतत्रता की आवाज उठाने के साथ बरकतुल्ला खान ने बिट्रिश हुकूमत के द्वारा किये जा रहे अत्याचारों पर भी आवाज उठाई। बिट्रिश हुकूमत का लगातार विरोध करने के चलते इंग्लेंड में खान की भारत में बिट्रिश सरकार प्रति सोच का विरोध होना शुरु हो गया। तब विरोध के चलते उन्हें इंग्लेंड छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अप्रवासी भारतीयों को एक करने कि शुरुआत

इंग्लेंड से विरोधी नीतियों के चलते निकाले जाने के बाद करकतुल्ला खान 1899 में अमेरिका गए। अमेरिका पहुंचने के बाद बरकतुल्ला खान ने वहां पर रह रहे अप्रवासी भारतीयो मिलना शुरु किया और उनके बीच सम्मेलन किये। इसके साथ उन्होंने बिट्रिश सरकार पर हमला जारी रखा और लेख व भाषण करते रहें। अमेरिका में खुद का खर्च चलाने के लिए बरकतुल्ला स्कूलो में अरबी की पढ़ाने लगे। लेकिन भारत की देश भक्ति अभी उनके अंदर जिंदा थी।

बरकतुल्ला खान की देश भक्ति व देश को बिट्रिश से शासन से बचाने का सबूत उनके द्वारा लिखे गए खत “ हसरत मोहानी ” से पता चलता है। बरकतुल्ला खान “ हसरत मोहानी ” में लिखते है कि “ बड़े अफसोस की  बात है की , आज 2 करोड़ हिन्दूस्तानी, हिन्दू व मुस्लिम भूख के मारे मर रहें हैं , पूरा देश भूखमरी की मार झेल रहा है, लेकिन बिट्रिश सरकार को तो हिंदूस्तान में मालो - सामानों के बाजार बसाने कि नीतियों की चिंता है।” 
हिन्दुस्तान से लूटे हुए धन का इस देश में केवल सूद जितना उपयोग होता है। बिट्रिश शासन में लगातार लूट बढ़ती जा रही है। आज देश पर लूट की मार व गुलामी से आजादी के लिए भारत का हर हिंदू व मुसलमान एक होकर कांग्रेस के साथ मिल आजादी की लड़ाई लड़े व हिंदू -मुस्लिम कि एकता की मिशाल पेश करें ”

जब 1857 की हुई तब बरकतुल्ला इससे प्रभावित हो कर अमेरिका से जापान चले गए। यह वो समय था जब जापान में प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों का प्रमुख ठिकाना माना जाता था। हिंदूस्तान के प्रति अपने लेखों से लगातार बिट्रिश सरकार को घेरने वाले बरकतुल्ला खान साल 1905 तक एक महान क्रांतिकारी विचारक बन गए थें।

बरकतुल्ला खान ने हमेशा अपने लेख भाषणें में हिंदू मुस्लिम व देश के सिखों को मिलकर देश में बिट्रिश सरकार विरोध करने पर बल दिया। लेकिन जापान में भी वहां मौजूद बिट्रिश अधिकारियों  ने उनको खिलाफत करते देख जापान छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। तब बरकतुल्ला एक फिर अमेरिका चले गए।

जब जापान से बरकतुल्ला अमेरिका पहुंचे तो उन्होंने पाया की वहां पर भारतीय प्रवासी गदर पार्टी को बनाने मे लगे हुए है। प्रवासीयों के इस प्रयास को सफल बनाने के लिए वो भी उनके साथ लग गए। इस दौरान बरकतुल्ला खान ने मैक्सिको में रह रहे भारतीय प्रवासियों एक करने का काम किया।

13 मार्च 1913 को अमेरिका में सोहन सिंह बहकना व लाला हरदयाल के साथ नेत्तृव करते हुए उन्होंने गदर पार्टी नींव रखी। भारत से बाहर देश की स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने के लिए प्रमुख अभियान था। बरकतुल्ला के अंदर वो देश भक्ति थी की उनका सपना था भारत एक पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र बने व जनतांत्रित व धर्म निरपेक्ष गणराज्या की स्थापना हो।
भारत में अस्थाई सरकार की स्थापना के बाद बनें प्रधानमंत्री

अमेरिका में बिट्रिश का विरोध करने के लिए स्थापित गदर पार्टी ने आगे बढ़ते हुए अपने साप्ताहिक प्रकाशन शुरु किया। इन प्रकाशन में क्रांतिकारियों  के लिए बरकतुल्ला लेख लिखते थें। बिट्रिश मुक्त भारत का निमार्ण में लगे चम्पक रामन, राजा महेंद्र प्रताप व अब्दूल वहीद खान समेत कई क्रांतिकारियों ने इस आंदोलन को जर्मनी तक पहुंचा दिया।
इसी दौरान बरकतुल्ला की मुलाकात राजा महेंद्र प्रताप से हुई देशप्रेम के चलते दोनो में घनिष्ट मित्रता हो गई। इन दोनो ने मिलकर पहले हिंदुस्तान के सैनिको को बिट्रिश के खिलाफ लड़ने के लिए खड़ा कर दिया। देश को गुलाम मुक्त बनाने के दोनो ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाने व भारत तक इसे हवा देने के लिए तुर्की समेत बगदाद व अफगानिस्तान का का दौरा किया।

अपने इस सफर के बाद साल 1915 में दोनो ने भारत में अस्थाई सरकार की नींव रखी । इस अस्थाई सरकार को विश्व युद्व में बिट्रिश के विपरीत विरोधी रही जर्मन भारत की अस्थाई क्रांतिकारी सरकार को मान्यता भी दे दी।

तब भारत में इस अस्थाई सरकार के राष्ट्रपति के रुप राजा महेंद्र सिंह व प्रधानमंत्री के रुप में बरकतुल्ला खान को चुना गया।

भारत में अस्थाई सरकार के निमार्ण के बाद अफगानिस्थान ने भी इस सरकार के साथ समझोता किया और इस बात का वादा किया की वो उनकी आजादी के लिए लड़ाई में उनका साथ देगें।

1919 में बरकतुल्ला जब मास्को गए तब लेनिल ने उनको समर्थन दिया।

भूल गया हमारा इतिहास बरकतुल्ला का योगदान

भारत देश को आजाद बनाने व अपने लेखों से क्रांतिकारियों  में आजादी की एक नई ऊर्जा भरने वाले बरकतुल्ला जब तक इस आंदोलन को भारत तक पहुंचा पाते उससे पहले उनके स्वास्थय व उम्र ने उनका साथ देना दिया। अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक सभा को संबोधित करते हुए अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई और कुछ दिन बाद 27 सितम्बर 1927 को निधन हो गया।

अपना पूरा जीवन देश की आजादी व सभी धर्मां की एकता के साथ बिट्रिश शासन को उखाड़ फेंकने की बात करने वाले बरकतुल्ला ने कहा कि “ मुझे खुशी है कि मैने मेरा जीवन भारत की आजादी के लिया जीया भले ही मेरी कोशिशों का कोई नतीजा सामने नही आया मगर मेरी देश प्रेम की भावना ने देश में कई ऐसे वीर युवा क्रांतिकारियों को जन्म दे दिया है जो देश की आजादी में एक दिन अहम भूमिका निभाने वाले है। ”

अस्थाई सरकार में भारत के प्रधानमंत्री चुने गए बरकतुल्ला खान ने अतिंम समय में इच्छा जताई की उन्हें भारत की मिट्टी में दफनाया जाए मगर बाद में उन्हें अमेरिका के मारवस्बिली में दफना दिया गया।

एक सच्चे देशभक्त बरकतुल्ला को भारत की भूमी तो नसीब नही हुई मगर दुख तो इस बात का है की देश के सियासकारों की भष्ट्र राजनीति ने इतिहास में भी उनके नाम को भूला दिया

छुपा इतिहास नेहरू नहीं बरकतुल्ला खान थे पहले प्रधानमंत्री | Barkatullah khan Prime Minister In Hindi