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गुप्त राजवंश के महान शासक समुद्रगुप्त जो नहीं हारे एक भी युद्ध | Samudragupta Story In Hindi

By N.j / About :-6 years ago

भारत के इतिहास में “ गुप्त राजवंश ” एक प्रमुख राजवंश था। जब भी इतिहास में गुप्त राजवंश कि बात होती है तब इस वंश के चोथें शासक रहें चन्द्रगुप्त प्रथम के पुत्र समुद्रगुप्त की वीरता के वीर इतिहास को कोई नही भूला पाता। समुद्रगुप्त गुप्त वंश के वो शासक थे जिन्हें इतिहास का सबसे श्रेष्ट सम्राट माना जाता था। समुद्रगुप्त के शासन काल के उस दौर को भारत का स्वर्णयुग दौर भी कहा जाता है।

महान शासक सम्राट समुद्रगुप्त का जन्म कहा और कब हुआ इतिहास के पन्नो में कई जिक्र नही है। लेकिन उनके शासन काल के बारे में इतिहास में वर्णन किया गया है। गुप्तवंश में समुद्रगुप्त का शासन काल 330-380 ई. के बीच था। इतिहासकारों के अनुसार जब समुद्रगुप्त का शासन था तब पाटलिपुत्र उनके साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी।

गुप्त वंश के शासक चन्द्रगुप्त के पुत्र समुद्रगुप्त बचपन से ही तेज दिमाग व युद्व से जुड़े सभी कलाओं में निपुण हो गए थें। समुद्रगुप्त की इसी कुशलता को देखते हुए पिता चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने सभी पुत्रो में गुप्तवंश के शासक के रुप में चयन के लिए समुद्रगुप्त को चुना। लेकिन चन्द्रगुप्त के इस फैसले पर उनके बाकी पुत्र समुद्रगुप्त के खिलाफ हो गए और पिता चन्द्रगुप्त प्रथम के इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए। साथ ही उन्होंने समुद्रगुप्त के खिलाफ युद्व छेड़ने की तैयारी कर ली।

जब गुप्तवंश के शासक चन्द्रगुप्त प्रथम  का 335 ई में निधन हुआ तब इतिहासकारों के अनुसार माना जाता है कि गुप्तवंश के शासन के अधिकार को पाने के लिए संघर्ष छिड़ गया। लेकिन समुद्रगुप्त अपनी बुद्धि व बल के चलते उत्तराधिकारी के रुप में आगे रहें। साथ ही समुद्रगुप्त ने गुप्तवंश की सत्ता को पाने के लिये अपने बड़े भाई राजकुमार काछा के साथ युद्व लड़ा और पाटलिपुत्र के शासक बनें।

गुप्तवंश के शासन के अधिकार को पाने के लिए हो रहे गृहयुद्ध को रोकने के लिए समुद्रगुप्त ने कई प्रयास किए जो करीब 1 साल बाद जाकर थमा। गुप्तवंश के इस गृहयुद्ध के बाद समुद्रगुप्त ने “ दिग्विजयात्रा ” की शुरुआत की। इस यात्रा का उल्लेख प्रयाग में स्थित मौर्य स्तंभ पर भी है। गुप्तवंश के साम्राज्य के विस्तार के लिए समुद्रगुप्त ने कई अभियान चलाए जो अधिकतर सफल रहें। साथ ही चन्द्रगुप्त ने अपने “ आर्यावर्त युद्ध ” में अपना बल व बुद्धिमता का नजारा दिखाते हुए अपने विरोधी रहे तीनो राजाओं को धूल चटा दी।
गुप्तवंश के शासन को आगे बढ़ाते हुए समुद्रगुप्त ने कई छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गुप्तवंश के शासक बनने के बाद समुद्रगुप्त ने कभी पीछें मुड़ कर नही देखा व किसी के सामने हार स्वीकार नही की । ऐसे ही “ दक्षिणापथ” के युद्व का जिक्र होता है जिसमें समुद्रगुप्त ने दक्षिण के 12 को हरा कर एक साथ 12 राज्यों को अपने अधिन किया था। इन युद्धो में समुद्रगुप्त की एक बात सबसे अलग थी ।

समुद्रगुप्त ने इन 12 राज्यों को पाने के बाद उनके शासको मारा नही वो चाहते तो अपने सैन्य बल या खुद उन्हें मौत के घाट उतार सकते थें। लेकिन समुद्रगुप्त ने दयालुता का परिचय दिया।

लगातार शक्ति बल के साथ समुद्रगुप्त गुप्तवंश साम्राज्य का विस्तार करते रहे उनका साम्राज्य पश्चिम में गांधार से लेकर पूर्व में आसाम व उत्तर में हिमालय के कीर्तिुर जनपद से दक्षिण के सिंहल तक विस्तारीत हो चुका था। समुद्रगुप्त ने गुप्तवंश के इस लबें विस्तार के दौरान कई नष्ट राज्यों को भी पुनः खड़ा करने में मदद की। समुद्रगुप्त ने इन राज्यों में रहने वाले दीन-दुखी व गरीब ब्राहामणो को धन देकर उनकी मदद की। गुप्तवंश के महान सम्राट व गरीब असहाय लोगो की मदद करने के चलते पूरे भारतवर्ष में उनका गुणगान होने लगा। अपने राज्य के विस्तार के साथ इन कार्यां के चलते समुद्रगुप्त ने धीरें-धीरें पूरे भारत पर गुप्तवंश का शासन स्थापित कर दिया। अपने साम्राज्य का  विस्तार के दौरान समुद्रगुप्त ने एक भी युद्ध किसी राजा से नही हारा।

भारत के “ नेपोलियन ” समुद्रगुप्त

बचपन से अपनी बुद्धिमत्ता व युद्ध के गुणों में निपुर्ण होने के बाद सत्ता के लड़ाई जीत करने पूरे भारतवर्ष में गुप्तवंश का शासन स्थापित करने के चलते महान इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त के शासनकाल की प्रशंसा करते हुए उन्हें भारत का नेपोलियन कहा। लेकिन विंसेंट स्मिथ के द्वारा सम्राट समुद्रगुप्त को दी गई इस उपाधी पर इतिहासकार डॉ. आयंगर ने इसका विरोध किया। आंयगर ने कहा की समुद्रगुप्त से नेपोलियन की तुलना करना गलत है क्योंकि नेपोलियन केवल सत्ता का लालची था। नेपोलियन की एक भी ऐसी नीति ऐसी नही थी जो जनता के हितो के लिए थी। वही सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने राज्य विस्तार के साथ कई राजाओं को उनका राज्य अपने अधिन करने के बाद मारा नही साथ वहां की प्रजा पर जुल्म ढहाले के बजाय उनकी मदद करते थें। वही नेपोलियन एक सत्ता भोगी था। गुप्तवंश के महान शासक समुद्रगुप्त प्रजा से प्रेम करने के साथ उनके हितो की नीतियां भी उनके अंदर थी। समुद्रगुप्त ने गुप्तवंश का साम्राज्य संभालने के बाद किसी भी युद्ध में पराजित नही हुए। वही नेपोलियन बोनापार्ट “ वाटर लू ” की जंग हार गया था।

महान योद्धा के साथ कुशल आर्टिस्ट

गुप्तवंश के महान शासक सम्राट समुद्रगुप्त एक महान योद्धा होने के साथ वीणा वादन की कला के साथ संगीत की कला में भी निपूण थें। गुप्तवंश के शासनकाल में उनके उनके द्वारा निर्मित सिक्कों बनावट आज भी हम देख सकते है। महान सम्राट समुद्रगुप्त को कवियों का राजा भी कहा जाता था।

आज इतिहास में मुद्रा प्रचलन का श्रेय समुद्रगुप्त को दिया जाता है। समुद्रगुप्त ने अपने शासनकाल के दौरान सो फीसदी शुद्ध स्वर्ण व ताम्र की मुद्राओं का चलन किया था। अपने शासनकाल के समय समुद्रगुप्त ने 7 अलग-अलग प्रकार का चलन शुरु किया। इन मुद्राओं को आर्चर, अश्वमेघ, बैकल, टाइगर स्लेयर, राजा व रानी के नामों से उनका अलग-अलग राज्यों में प्रचलन था।

गुप्तवंश में अपने शासनकाल में पूरे भारतवर्ष में अपनी सत्ता मजबूत करने वाले समुद्रगुप्त ने जीवन में एक भी युद्ध नही हारा इसके चलते उन्हें इतिहास के सबसे महान सम्राट कहा जाता है।


गुप्त राजवंश के महान शासक समुद्रगुप्त जो नहीं हारे एक भी युद्ध | Samudragupta Story In Hindi