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भारतीय इतिहास के 2 सबसे बड़े गद्दार | Biggest Traitors in Indian History In Hindi

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दोस्तो इतिहास के पन्नों में हमने भारत माता कि मिट्टी की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, शिवाजी महाराज जैसो कई वीरो का अमर इतिहास मिलता है। लेकिन दोस्तो आज हम देश के इतिहास में देश में ही रहकर देश से गद्दारी करने वालो के इतिहास को जाने तो इसमे जयचंद व राघव चेतन का नाम दगाबाजो की लिस्ट में सबसे ऊपर आता है। तो चलिए दोस्तो आज भारतीय इतिहास के गद्दारों के बारे में जानते है जिन्होंने अपनी ही मिट्टी को लूटने में दुश्मनो की मदद की।
1. जयचंद
इतिहास के उन पन्नों में आज जब भी जयचंद का नाम आता है तब पृथ्वीराज के साथ की गई जयचंद की गद्दारी का इतिहास सामने आता है। आज जब भी कोई गद्दारी धोका करता है तब मुहावरे के रुप में जयचंद का लिया जाता है। जयचंद की मातृभुमी के साथ कि गई गद्दारी के लिए कई मुहावरे है इसमे एक है “ जयचंद तुने देश को बर्बाद कर दिया गैरों को लाकर हिंद में आबाद कर दिया ”
जयचंद की गद्दारी के बारे में बताने से पहले बता दे कि जयचंद कन्नौज साम्राज्य के राजा थें। जयचंद ने दिल्ली में अपनी सता स्थापित करने के लिए तुर्क साम्राज्य के शासक मोहम्मद गौरी से हाथ मिलाया व पृथ्वीराज चौहान को हराने के लिए गौरी को मजबूत बनाने के लिए उसे सैन्य ताकत मुहैया करवाई। लेकिन पृथ्वीराज से गौरी ने युद्ध जीतने के बाद कन्नौज को भी हथिया लिया व जयचंद को भी मौत के घाट उतार दिया। दोस्तो एक हिंदू राजा होतो हुए जयचंद ने पृथ्वीराज से ही झल नही किया उनका यह धोका पूरे भारतवर्ष को था। ऐसा इसलिए की गौरी द्वारा पृथ्वीराज को हराने के बाद इस्लामिक शासक भारत की और ज्यादा हावी हो गए।
पृथ्वीराज चौहान वो शासक थे जिन्होंने दिल्ली की सता पर अपना राज जमाया था साथ इनके वीरता भरे इतिहास से इनकी इतिहास में वीर हिंदू राजाओं में पहचान होती है। पृथ्वीराज की वीरता के प्रमाण बचपन के समय ही मिल गए थें जब उन्होंने अपने हाथ से शेर का जबड़ा भाड़ दिया था। वो पृथ्वीराज ही थे जिन्होंने गौरी द्वारा दोनो आंखे फोड़ देने के बाद आवाज के इशारे से मोहम्मद गोरी को तीर मार कर मार गिराया था।
कब शुरु हुए जयचंद की गद्दारी
हम जयचंद की गद्दारी के बारे में बताने से पहले बता दे कि जयचंद व पृथ्वीराज के मध्य पहले भी कई युद्ध हुए। जिनमें जयचंद को हर बार हार का सामना करना पड़ा। जयचंद व पृथ्वीराज चौहान के मध्य दुश्मनी तब और बढ़ गए जब उन्हें पता लगा कि पृथ्वीराज चौहान उनकी बेटी संयोगिता को पृथ्वीराज चौहान प्यार करते है। पृथ्वीराज संयोगिता से इतना प्यार करते थे कि जयचंद से दुश्मनी के बावजूद भरी सभा में से पृथ्वीराज संयोगिता को उठाकर ले गए और शादी रचा ली।
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कई राज्य के राजाओं के सामने जयचंद से यह अपमान सहन नही हुआ और उसने पृथ्वीराज चौहान से इसका बदला लेनी की योजनाएं बनानी शुरु कर दी। जयचंद अब किसी भी दांव से पृथ्वीराज का विनाश होते हुए देखना चाहता था।
बदले की भाव की आग में सुलगते जयचंद को जब पता लगा कि पृथ्वीराज चौहान से गौरी वंश का शासक अपनी हार का बदला लेना चाहता है। तब जयचंद ने मौहम्मद गौरी से हाथ मिलाते हुए उसे पृथ्वीराज चौहान का साम्राज्य खत्म करने के लिए अपनी सैन्य ताकत की सहायता दे दी। जयचंद इस मकसद के साथ दिल्ली पर भी अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।
जयचंद की सैन्य सहायता के बाद गौरी एक बार फिर पृथ्वीराज के खिलाफ जंग छेड़ने की तैयारी करने लगा। जब यह खबर पृथ्वीराज चौहान तक पहुंची तक उन्होंने तब उन्होंने ज्यादा कुछ न सोचते हुए अपने विश्वासी मित्र व दरबारी कवि चंदबरदाई को गौरी से निपटने के लिए राजपूत शासको से सैन्य सहायता का अनुरोध भेजने के लिए कहा। चंदबराई ने सभी राजपूत शासको यह प्रस्ताव भेजा मगर सयोगिता के अपरहरण के कारण सभी राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान की मदद से पीछें हट गए। जयचंद के बहकावे में आकर सभी राजपूत शासक सैन्य बल के साथ पृथ्वीराज चौहान के ही सामने खड़े हो गए।
जयचंद व कई राजपूत शासको कि मदद के बाद मोहम्मद गोरी ने 1192 में तराईन का द्वितीय युद्ध छेड़ दिया। इस युद्व में पृथ्वीराज की सेना में कुल 3 लाख सैनिक थें। वह गोरी की सेना में कुल 1 लाख 20 हजार सैनिक थें। इस युद्ध में गौरी की सेना भले ही कम थी मगर उसकी सबसे बड़ी ताकत थी 50 हजार की शक्तिशाली घुड़सवारो की फौज।
गौरी की सेना के शक्तिशाली घुड़वारी बल ने तेजी से आगे बढ़ कर पृथ्वीराज की सेना के सभी हाथियों को घेर कर उन पर बाणों की वर्षा कर दी, तब हाथी आगे नही बढ़ पाएं और खुद की सेना पर हावी हो गए और एक के बाद सैनिको को रौंदते चले गए। साथ ही एक और जयचंद की चाल की वजह से राजपूत शासक अपने ही भाईयों के सिर काट रहें थें , साथ युद्ध नियमों के अनुसार सुर्य अस्त होने के बाद पृथ्वीराज के सेना ने तो युद्व रोक दिया मगर गौरी की सेना रात में भी हमला करती रही। इस तरह तराईन के दुसरे युद्व में पृथ्वीराज को हार का सामना करना पड़ा। उनके मित्र चंदबराई को भी गौरी ने कैद कर लिया। ऐसा कहा जाता है कि इस युद्ध के बाद गौरी ने जयचंद की भी हत्या कर दी। बस यही से भारत में इस्लामिक शासको का पक्ष मजबूत हुआ था।
2. राघव चेतन
राघव चेतन का परिचय व गद्दारी के बारे में बताने से पहले बता दे कि यह वो नाम था। जिसने चित्तोड़ में ही रहकर चित्तोड़ के राजा रावल रतन सिंह व चित्तोड़ के पतन की कहानी रची थी। राघव चेतन चित्तोड़ में रतन सिंह के दरबार में पंण्डित था व चित्तौड़ में राजपुरोहित बनने के लिए चित्तौड़गढ़ में कई तंत्र विधाएं करते था। जब यह बात राजा रतन सिंह को पता लगी तब उन्होंने राघव चेतन का मुंह काला कर अपने राज्य से निकाल दिया।
चित्तौड़ से निकाले जाने के बाद अब राघव चेतन पूरी तरह से चित्तौड़ का खात्मा चाहता था। बस इस मकसद के साथ वो दिल्ली पहुंच गया । दिल्ली में चेतन अलाउद्दीन खिलजी से जा मिला। चेतन बस चित्तौड़ का अंत देखना चाहता था । इसलिए उसने अलाउद्दीन खिलजी के सामने चित्तोड़ के राजा रावल रतन सिंह की पत्नी रानी पदमावती की खुबसुरती का ज्रिक शुरु कर दिया। चेतन की यह योजना सफल रही । अलाउदीन ने ठान लिया की वो इस खुबसुरत चीज को पा कर रहेगी।
बस फिर अलाउद्दीन खिलजी अपने पूरे सेना बल के साथ चित्तौड़ और निकल पड़ा। मगर चित्तौड़ को जितना अलाउद्दीन के लिए इतना आसान नही था । अलाउद्दीन खिलजी बस पदमावती को एक बार देखना चाहता था। इतिहास के अनुसार कहा जाता है की अलाउद्दीन खिलजी को एक सीसे की परछाई में पदमावती की सुंदरता को दिखाया गया। बस तब से अलाउद्दीन खिलजी ने पदमावदती को पाने के लिए राणा करण सिंह से युद्ध लड़ा व झल से उनकी हत्या कर दी। वही पदमावती ने उलाउद्दीन से मिलने को लेकर राघव चेतन के सिर काटकर चित्तौड़ भेजने का प्रस्ताव रखा । इस तरह पदमावती को पाने की चाह में राघव चेतन का सिर काट चित्तौड़ भेज दिया। दोस्तो बाद में राजपूतो की शान को बचायें रखने के लिए पदमावती समेत सभी राजपूती विरांगनाओं ने जौहर कुंड में कूद कर अपनी जान दे दी थी।
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