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वीरांगना दुर्गा भाभी कौन थी ? व देश की स्वाधीनता में योगदान | Durgawati Devi Biography In Hindi

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आज जब भी देश कि आजादी को याद किया जाता है तब हमारे इतिहास में अपना सब कुछ भूल कर देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले वीरों नाम जहन में सबसे पहले है । आजादी के आंदोलन में भगत सिंह राजगरु, लाला लाजपत राय, सुखदेव, बाल गंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद, विपिन च्रंद पाल, अशफाकुल्लाह खान जैसे कई वीर थे जिन्होंने अपनी जान की कुर्बानी देकर देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करवाया था। देश के इन वीरो ने देश प्रेम के लिए अपनी जान की परवाह न किए बगैर देश की आजादी की आजादी की इस जंग में त्याग देने के लिए कूद पड़े। लेकिन एक दौर के साथ हम देश के इन वीरों का बलिदान भूलते जा रहे है।
देश की आजादी में में वीरो के साथ महिला क्रांतिकारियों का भी अहम योगदान रहा था इसमे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, हजरत महल, सरोजनी नायडू, कमला नेहरु, दोस्तो इन वीर महिला वीरांगनाओं में एक नाम दुर्गा देवी का भी आता है। जिन्हें प्यार से “ दुर्गा भाभी ” भी कहा जाता था। दुर्गा देवी एक साहसिक और देश प्रेमी थी जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए देश हित व गुलाम मुक्त राष्ट्र की स्थापना के लिए बंदूक उठा ली।
कौन थी दुर्गा देवी ?
देश की स्वतंत्रता के एक मुख्य सहयोगी के रुप में रहने वाली दुर्गा देवी का जन्म 7 अक्टूबर 1902 को शहजादपुर गांव आज बदलकर कौशाम्बी हो गया है में हुआ था। दुर्गा देवी के पिता इलाहाबाद के कलेक्ट्रेट में नाजिर के थें। बचपन में ही मां का निधन होने के कारण दुर्गा देवी महज तीसरी कक्षा तक पढ़ पाई और जब वो 12 साल की हुई तब उनका विवाह लाहौर के रहने वाले भगवती चरण के साथ कर दिया गया।
सांडर्स कांड में भगत सिंह को बचाने में निभाई अहम भूमिका
दुर्गा भाभी वो वीर विरांगना है जिन्होंने आजादी में अहम भूमिका निभाने भगत सिंह को 1928 में जॉन सार्डस गोलीकांड के बाद लाहौर से अग्रेजी हुकुमत के जाल के नीचे से लाहौर से कलकत्ता ले कर आई थी। इस दौरान पुलिस से भगत सिंह की रक्षा के लिए उन्होंने भगत सिंह का रुप बदल दिया और जब भी पुलिस ने पूछताछ की तब भगत सिंह को अपना पति बता कर उनकी रक्षा की। कलक्ता आने के बाद भगत सिंह कुछ दिनो तक दुर्गा भाभी के घर ही रुके थें।
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बता दे कि दुर्गा देवी के पति भगवती चरण वोहरा भी एक देशभक्त थें। जब दुर्गा देवी कि शादी उनके साथ हुई तब वो भी उनकी सोच व कार्यों के साथ जुड़ गई। जब भी कोई क्रांतिकारी चरण जी से मिलने आते तब दुर्गा देवी उनकी आव भगत करती । बस दुर्गा देवी के इसी प्यार के चलते उन्हें “ दुर्गा भाभी ” के नाम से पुकारने लगे।
देश को गुलाम मुक्त बनाने के लिए दुर्गा देवी के पति क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा भी अपने स्तर पर प्रयासों में जुटे हुए थें। 28 मई 1930 को भगवती चरण अपने कुछ साथियों के साथ मिल बम बनाने का परीक्षण कर रहे थें लेकिन तब एक बम परीक्षण के दौरान फट गया जिससे भगवती चरण की मौत हो गई। अपने जीवन में आए इस मुश्किल समय के बाद भी दुर्गा भाभी आजादी के इस आंदोलन से दूर नही हटी। साल 1937 में दुर्गा भाभी को कांग्रेस पार्टी की और से दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए दुर्गा भाभी ने कई कार्यक्रमों के दौरान अपना महत्वपुर्ण योगदान दिया।
दुर्गा भाभी का घर बना क्रांतिकारियों के लिए आश्रय स्थल
आजादी के लिए लड़ाई रहे हर क्रांतिकारी के लिए दुर्गा भाभी का घर आश्रय स्थल बन गया था। जो भी क्रांतिकारी अग्रेंजो के खिलाफ कोई योजना तैयार करता तब वो दुर्गा भाभी के घर ही रुकते थें। कांतिकारी अपनी योजना में कामयाब हो सके इसके लिए दुर्गा भाभी पर्चें बांटती और उनके लिए चंदा जमा करती। पति भगवती चरण की मौत के बाद दुर्गा भाभी के अंदर देश को आजाद करवाने की अलग प्रज्वला उत्पन हो गई थी। वो हर समय क्रांतिकारियों का सहयोग व किसी भी योजना में आगे आने से नही डरती थी।
तथ्यों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि चंद्रशेखर आजाद के पास अंतिम समय में माउजर बंदूक मिली थी। वो दुर्गा भाभी ने ही उन्हें दी थी।
गर्वनर हेली पर फेंका बम
गर्वनर हेली जिन्होंने कर्नल सार्डस की हत्या व अंसेम्बली में बम हमला करने के चलते 9 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, राजगरु व सहदेव को फांसी की सजा का ऐलान किया था। दुर्गा भाभी ने उन पर बम से हमला कर दिया था जिसमें हेली व उनके साथी बुरी तरह घायल हो गए थें। दुर्गा भाभी को इसके बाद पुलिस ने मुंबई से गिरफ्तार किया गया गर्वनर हेली पर इस हमलें के चलते दुर्गा देवी को 3 साल की सजा सुनाई गई। इस हमलें के अलावा दुर्गा भाभी इस हमलें के अलावा मुंबई के पुलिस कमिश्नर पर भी गोली चलाई थी। इसके बाद दुर्गा भाभी के साथी यशपाल को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।
गर्वनर हेली व मुंबई पुलिस कमिश्नर पर हमले के मामले में दुर्गा देवी 3 साल की सजा काटकर साल 1935 में जेल से रिहा हुई। जेल से बाहर आने के बाद अंग्रेजी अफसरो ने उन पर जुल्म ढाना शुरु कर दिए। तब दुर्गा भाभी ने परेशान होकर गाजियाबाद जाने का फैसला किया । जहां वो “ प्यारे लाल कन्या विधालय ” में एक अध्यापिका के रुप में काम करने लगी। इसके बाद दुर्गा भाभी ने साल 1940 में लखनऊ में एक “ मांटेसरी स्कूल ” की स्थापना । बस यही से वो एक गुमनाम दुनिया में चली गई।
देश की आजादी के बाद साल 1956 में भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने उनकी सहायता के लिए उन्हें प्रस्ताव भेजा मगर नेहरु के इस मदद प्रस्ताव के लिए दुर्गा भाभी ने मना कर दिया। देश की आजादी की दिपज्योती को हमेशा प्रफुलित रखने वाली विरागना दुर्गा भाभी ने 14 अक्टूबर 1999 को अंतिम सांस ली। दोस्तो आज आजाद भारत में दुखः की बात यह है कि देश के लिए आजादी में अपनी महत्वपुर्ण भुमिका निभाने वाली दुर्गा भाभी को भारत की आजादी में वीरांगनाओं में जगह नही दी गई है।
वीरांगना दुर्गा भाभी कौन थी ? व देश की स्वाधीनता में योगदान | Durgawati Devi Biography In Hindi




