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बचपन में पोलियो हुआ 28 बार इंटरव्यू में फेल गीता चौहान बनी चैम्पियन | Geeta Chauhan Story in Hindi

By N.j / About :-2 years ago

"मन के हारे हार है और मन के जीते जीत "

दोस्तो आज इस लोकोक्ति को सच साबित कर दिया है गीता चौहान ने. गीता ने घर में पिता की नपरत और मां के प्यार से सीखकर जीवन की वो मंजिल हासिल कर ली जो उनके लिए मुश्किल थी। लेकिन गीता चौहान ने इस मुश्किल को अपनी मेहनत से आसान बना दिया। तो चलिए दोस्तो जानते है गीता चौहान की इस जज्बे, उत्साह, लगन से भरी कहानी के बारे में ।

दोस्तो गीता चौहान की कहानी सभी पाठक में एक अलग ही जीवन शक्ति जाग्रत करने वाली है। दोस्तो आज गीता एक "वूमन व्हीलचेयर बास्केटबॉल" (Women Wheelchair Basketball ) खिलाड़ी है। एक स्पोर्ट्स खिलाड़ी होने के साथ,  आज गीता एक सफल बिजनेस वुमेन, नेशनल टेनिस, इंटरनेशनल बास्केटबॉल चैम्पियन है। लेकिन जो उपलब्धियां आपने गीता की पढ़ी वो इतनी आसान नही थी।

गीता ने अपनी संघर्ष भरी कहानी के बारे में बताते हुए कहा की -

गीता ने अपने बारे में बात करते हुए बताया की- जब वो 6 साल की थी तब उन्हें पता लग गया था की उन्हे पोलियो है। पोलियो की बिमारी ने न सिर्फ उनके शरीर को अपंग बनाया साथ ही परिवार में उनके सभी रिश्तों को अपंग बना दिया। गीता की इस अवस्था में उनकी मां ने उनका साथ निभाया मगर पिता ने गीता की अपंगता को कभी स्वीकार नही किया एवं गीता को कभी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित नही किया।

लेकिन इस दौरान गीता की मां ने उनका साथ नही छोड़ा, जब गीता को स्कूल में दाखिल कराने के लिए गए तब करीब 10 स्कूलो ने गीता की एड्मिशन रिक्वेस्ट को खारिज कर दिया तब मुश्किल से उन्हें एक स्कूल में दाखिला मिला। गीता के पिता इस बात से खुश नही थे की गीता स्कूल में पढ़ने जाएं। लेकिन गीता के प्रति मां का प्यार था। जिस वजह से वो स्कूल जा पाई। स्कूल के दौरान उन्हें अपने पापा की सोच के जेसे लोगो का सामना करना पड़ा । स्कूल में कुछ बच्चो के माता-पिता ऐसे थे जो अपने बच्चो को मेरे पास आने के लिए रोकते थे। उनकी सोच थी की कही गीता की बीमारी उनके बच्चो को नही हो जाएं।

बचपन में पेदा हुई इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद गीता ने अपनी स्कूल की शिक्षा पुर्ण की। स्कूल की शिक्षा के बाद गीता की चाहत थी की वो अपनी ग्रेजुएशन की शिक्षा पुरी करे। लेकिन इस बात के लिए उनके पिता बिलकुल खुश नही थे, उनके पिता चाहते थे की अब गीता घर पर ही रहे और अपनी इस बात को मनवाने के लिए उन्होेंने गीता को डराने व धमकाने के साथ उनकी पॉकेट मनी भी बंद कर दी थी।

तब गीता के सपनों को पुरा करने के लिए गीता की मां ने अपने बचाए हुए पैसों से गीता को ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त करने के लिए काॅलेज में दाखिला दिलाया। गीता ने खुद को और मजबुत बनाने के लिए अपनी शिक्षा के साथ नौकरी पाने के लिए इंटरव्यू भी दिए। लेकिन गीता की शारीरिक हालात को देखकर उन्हें हर कंपनी ने नौकरी पर रखने के लिए इनकार कर दिया। दोस्तो वो गीता की ही हिम्मत है जो कुल 28 कंपनियों ने नौकरी न देने के बावजूद अपना संघर्ष जारी रखा। कुछ समय बाद गीता के भाई के दोस्त ने गीता को अपनी कंपनी में एक टेलीकाॅलर की जाॅब करने का ऑफर दिया।

गीता के लिए यह जाॅब ऑफर एक डुबते के लिए तिनके का सहाराजेसी थी। गीता की  लाईफ अब पुरी तरह बदल गई। वो सुबह उठकर समय पर ऑफिस जाती और शाम की काॅलेज की क्लास पुर्ण होने के बाद घर। इस तरह ऑफिस से काॅलेज से घर के इस सफर में गीता की ग्रेजुएशन पुर्ण हो गई । अब उनके लिए टेलीकाॅलर की जाॅब भी सिक्योर हो गई थी।

दोस्तो गीता के 6 साल की उम्र में पोलियो होने के बाद भी गीता ने कभी हार नही मानी उनकी इस लगन से सभी लोग अवगत थे। लेकिन दोस्तो गीता के पिता को अब भी गीता की अपंगता ही नजर आ रही थी। अपनी इसी सोच के कारण गीता के पिता ने नौकरी नही करने की धमकीयां भी दी साथ ही कहा की तुम ऐसा नही करोगी तो में तुम्हें गांव भेज दुंगा।

पिता के बार नौकरी व पढ़ाई छोड़ने के दबाब के चलते गीता ने अपना घर छोड़ दिया ओर वो अपनी एक दोस्त के साथ उसके घर पर रहने लग गई। दोस्त के घर पर कुछ महीने रहने के बाद गीता ने रहने के लिए एक किराये से घर ले लिया। किराये के घर में कुछ दिन बिताने के बाद गीता मन ही मन अंदर से टूटने लगी। अपनी हालातों से तंग आकर एक दिन गीता ने खुद की यह दुख भरी जिंदगी खत्म करने का फैसला लिया और नींद की गोलिया खा लीं। तब उनके दोस्तो ने उन्हें हाॅस्पिटल पहुंचाया। मौत के मुंह से बाहर आने के बाद गीता ने खुद के जीवन की अहमियत समझी और अपने जीवन का अहम फैसला लेते हुए नौकरी को रिजाइन दे दिया।

अपने जीवन की दुसरी शुरुआत करते हुए गीता ने अपने खुद के गारमेंट्स के बिजनेस की शुरुआत की. अपने इस बिजनेस को सफल बनाने के लिए गीता ने रात दिन मेहनत की। इस दौरान उनके एक दोस्त ने उन्हें मुंबई की "वुमन व्हीलचेयर बास्केटबॉल" टीम के बारे में जानकारी दी। तब अपनी इस जिंदगी की शुरुआत की और बताया की

“ महज 6 साल की उम्र में पोलियो होने के बाद मुझे बचपन में कभी खेलने का अवसर नही मिला इस वजह से बचपन की इस अधूरी कसक की पुरी करने के लिए मेंने इस फिल्ड में जाने का फैसला किया। मै पुरे सप्ताह काम करती और वीकेंड के दिन प्रैक्टिस के लिए मैदान में  जाती। मेरे जीवन में यह वो मैदान था जहां मुझे कोई किसी बात के लिए टोकने वाला नही था। मै टीम के साथ जमकर प्रैक्टिस करती । हमारी टीम ने नेशनल प्रतियोगिता में भाग लिया और टीम ने इसमे अच्छा प्रर्दशन किया हम विजेता बनें। मेरे जीवन में यह बहुत ही गर्व का पल था।

गीता ने बताया की -

“ आज खुद का बिजनेस होने के साथ, अपनी बास्केटबाॅल, टेनिस, ओर रेसलिंग की टीम के साथ जुड़ी हुई हु। आज मेरा अपना खुद का घर है। जो मेरा सब कुछ है। जीवन में मेने खुद के होने व अपने जीवन जीने की लड़ाई लड़ी। अपने जीवन में कई कठिन परिस्थितियों से पार पा के इस मुकाम तक पंहुची हु । बस इतना ही कहना चाहती हुं की कभी जीवन में मुश्किलों के आगे हार मत मानो बस आगे बढ़ते रहो। इस बात को हमेंशा याद रखना की सोना तपकर ही चमकता है“

बचपन में पोलियो हुआ 28 बार इंटरव्यू में फेल गीता चौहान बनी चैम्पियन | Geeta Chauhan Story in Hindi