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रजिया सुल्तान का इतिहास | All About History of Razia Sultan in Hindi

By rakesh / About :-8 years ago

हिन्दुस्तान की पहली महिला शासक रजिया सुल्तान

भारत के इतिहास के पन्नो में रजिया सुल्तान का नाम स्वर्ण शब्दो में लिखा जाता है क्योंकि रज़िया सुल्तान को हिन्दुस्तान की पहली महिला शासक होने का गर्व मिला हुआ है | दिल्ली सल्तनत के समय में जब रानियों को मात्र महलो के अंदर विश्राम के लिए कहा जाता था वही रजिया सुल्तान ने महल से बाहर निकलकर राजपाठ की जिम्मेदारी सम्भाली थी |

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रजिया सुल्तान ने हथियारों का ज्ञान भी लिया था जिसके कारण रज़िया को दिल्ली सल्तनत की प्रथम महिला शासक बनने का अवसर मिला था | वह दुसरे सुल्तान की पत्नियों की तरह अपने आप को “सुल्ताना” बुलवाने के बजाय सुल्तान(sultan) बुलवाती थी क्योंकि वह अपने आप को किसी पुरुष से कमजोर नही समझती थी | तो चलिए आज हम आपको उसी होनहार महिला शासक रजिया सुल्तान के इतिहास(History) के बारे में परिचय करवाते है |

रजिया ने सर्व प्रथम अपने जाबांज व्यक्तित्व का प्रमाण दिल्ली की जनता(public) को अपने सुल्तान नियुक्ति पर स्थापित होने के लिए समर्थन लेने के लिए किया. रज़िया ने दिल्ली की जनता से न्याय(Justice) मांग पर रुकनुदीन फिरोज के विपरीत झगडे का माहौल पैदा कर दिया. वह राजनीति में बहुत होशियार थी अत: अपनी सतर्कता(Alertness) का दिखावा करते हुए उसने तुर्क ए चहलगानी की महत्वकांक्षा और एकाधिकार को तोड़ने की कोशिश की. इसके अलावा विपक्ष अमीरों में आपस में लड़ाई झगड़ा पैदा करवा दिया और उन्हें दिल्ली छोड़ने के लिए विवश कर दिया और दिल्ली में सुल्तान की नियुक्ति पर आसीन हुई.

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रजिया सुल्तान ने दिल्ली के शासन पर 3 साल 6 महीने तथा 6 दिन राज किया. रज़िया ने पर्दा प्रथा को निछावर(Lower) किया तथा पुरुषो की तरह खुले मुंह ही राजदरबार में जाती थी. रज़िया के शासन का अंत कम समय में ही हो गया परन्तु उसने सफलता पूर्वक शासन चलाया, रजिया सुल्तान में शासक के वो गुण मौजूद थे जो एक अच्छे शासक में होने चाहिए परन्तु रजिया का स्त्री होना इन गुणों(Qualities) पर भारी था. अत: उसके शासन का विनाश उसकी व्यक्तिगत हार नहीं थी.

रजिया सुल्तान के कार्य

रजिया सुल्तान ने अपने शासनकाल में अपने पुरे शहर के लिए कानून बनाये और कई योजनाओ को अच्छे तरीके से संपन्न करवाया | रजिया ने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए इमारतो के कार्य करवाए, सडके बनवाई और कुए खुदवाए | रजिया ने अपने शहर में शिक्षा योजना को बढ़ाने के लिए बहुत से स्कूल, संस्थानों, खोज संस्थानों और राजकीय पुस्तकालयों का कार्य करवाया | रजिया ने सभी संस्थानों में मुस्लिम शिक्षा के साथ साथ हिन्दू शिक्षा का भी समन्वय करवाया | रजिया सुल्तान ने कला और संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए कवियों ,कलाकारों और संगीतकारो को भी प्रोत्साहित(Encouraged) किया था |

सरदारों की मनमानी

इल्तुतमिश के इस निर्णय से उसके दरबार के सरदार खुश नहीं थे क्यों की वे एक स्त्री के सामने नतमस्तक होना अपने घमंड के विपरीत समझते थे। उन लोगों ने मृतक सुल्तान की इच्छाओं का नियम तोड़कर, उसके सबसे बड़े पुत्र रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह को, (जो अपने पिताजी के जीवन काल में बदायूँ तथा कुछ साल बाद लाहौर का शासक रह चुका था), सिंहासन पर बैठा दिया। यह चुनाव निराशजनक था। रुकुनुद्दीन शासन के बिल्कुल भी सही नहीं था। वह छोटी सोच का था। वह राजकार्य को नजरअंदाज करता था तथा राज्य का धन गलत कार्यो में व्यय करता था।

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उसकी माँ शाह तुर्ख़ान के, जो एक निम्न उदभव की महत्त्वाकांक्षापूर्ण महिला थी, उसके कामों से बातें बिगड़ती ही जा रही थीं। उसने सारी शक्ति को अपने अधिकार में कर लिया, जबकि उसका पुत्र रुकनुद्दीन भोग-विलास में ही डूबा रहता था। सारे राज्य में गड़बड़ी(Disturbance) फैल गई। बदायूँ, मुल्तान, हाँसी, लाहौर, अवध एवं बंगाल में केन्द्रीय सरकार के अधिकार का तिरस्कार होने लगा। दिल्ली के सरदारों ने, जो राजमाता के अनावश्यक प्रभाव के कारण असन्तोष से उबल रहे थे, उसे बन्दी बना लिया तथा रज़िया को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा दिया। रुकनुद्दीन फ़िरोज़ को, जिसने लोखरी में शरण ली थी, क़ारावास में डाल दिया गया। जहाँ 1266 ई. में 9 नवम्बर को उसके जीवन(life) का अन्त हो गया।

अमीरों से संघर्ष

अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए रज़िया को न केवल अपने सगे भाइयों, बल्कि शक्तिशाली तुर्की सरदारों का भी मुक़ाबला करना पड़ा और वह केवल तीन वर्षों तक ही शासन कर सकी। यद्यपि उसके शासन की अवधि बहुत कम थी, तथापि उसके कई जरुरी पहलू थे। रज़िया के शासन के साथ ही सम्राट और तुर्की सरदारों, जिन्हें चहलग़ानी (चालीस) कहा जाता है, के बीच संघर्ष प्रारम्भ हो गया।

कब्र पर विवाद

दिल्ली के तख्त पर राज करने वाली एकमात्र महिला शासक रजिया सुल्तान(raziya sultan) व उसके प्रेमी याकूत की कब्र का दावा तीन अलग अलग जगह पर किया जाता है। रजिया की मजार को लेकर इतिहासकार एक मत नहीं है। रजिया सुल्ताना की मजार पर दिल्ली, कैथल एवं टोंक अपना अपना दावा जताते आए हैं। परन्तु वास्तविक मजार पर अभी फैसला नहीं हो पाया है। वैसे रजिया की मजार के दावों में अब तक ये तीन दावे ही सबसे ज्यादा मजबूत हैं।

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इन सभी स्थानों पर स्थित मजारों पर अरबी फारसी में रजिया सुल्तान लिखे होने के संकेत तो मिले हैं लेकिन ठोस प्रमाण(Proof) नहीं मिल सके हैं। राजस्थान के टोंक में रजिया सुल्तान और उसके इथियोपियाई दास याकूत की मजार के कुछ ठोस प्रमाण मिले हैं। यहां पुराने कब्रिस्तान के पास एक विशाल मजार मिली है जिसपर फारसी में ’सल्तने हिंद रजियाह’ उकेरा गया है। पास ही में एक छोटी मजार भी है जो याकूत की मजार हो सकती है।

अपनी भव्यता और विशालता के आकार पर इसे सुल्ताना की मजार करार दिया गया है। स्थानीय इतिहासकार का कहना है कि बहराम से जंग और रजिया की मौत के बीच एक माह का फासला था। इतिहासकार इस एक माह को चूक वश उल्लेखित नहीं कर पाए और जंग के तुरंत बाद उसकी मौत मान ली गई। जबकि ऐसा नहीं था। जंग(rust) में हार को सामने देख याकूत रजिया को लेकर राजपूताना की तरफ निकल गया। वह रजिया की जान बचाना चाहता था लेकिन आखिरकार उसे टोंक में घेर(Surround) लिया गया और यहीं उसकी मौत हो गई।


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