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गोरखा रेजिमेंट कैसे और क्यों बनी | Indian Gorkha Regiment

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भारतीय सेना की सबसे आक्रामक पलटन | Indian Gorkha Regiment
हिमालय की पहाड़ो के आँगन में बसे नेपाल में एक जिला है गोरखा वह आज भी अपने मशहूर योद्धाओं(Warriors) के लिए विख्यात है.गोरखा रेजिमेंट में पहाड़ो में बसने वाली जातियों (सुनवार, गुरंग, राय, मागर और लिंबु) को भी इस रेजिमेंट में शामिल किया जाता है। . "आयो गुरखाली" के युद्धनाद(War cry) और "कायरता से मरना अच्छा" के नारे के साथ उन्होंने खौफ पैदा करने वाली ख्याति(Fame) पाई है. कहते हैं कि जब गोरखा अपनी खुखरी(weapons एक नुकीला हथियार) निकाल लेता है तो वह खून बहाए बिना मयान में नहीं जाती.
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ब्रिटेन के ब्रिटिश Gorkha Welfare Society के टिकेंद्र दीवान(Minister) कहते हैं, "हिम्मत और वफादारी के साथ जुड़ी मासूमियत उनकी ख्याति का कारण है." उनकी निर्भीकता के बारे में इंडियन आर्मी के सेना प्रमुख रहे सैम Manekshaw ने कहा था, "यदि कोई इंसान कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता तो वह या तो झूठा है या गोरखा." मौजूदा समय में गोरखा(Indian army का मुख्य अंग) सोल्जर(सैनिक ) भारत देश की आजादी के समय में किए गए एक करार(संधि करना) के तहत(Under) नेपाल की सेना के अलावा भारत और ब्रिटेन की सेनाओं में काम करते हैं. भारतीय सेना में 1,20,000 गोरखा सैनिक हैं तो ब्रिटिश सेना में उनकी तादाद 3,500 है.
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गोरखा सैनिकों का पश्चिम के साथ पहला संपर्क 1814-16 में तब हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल के खिलाफ लड़ाई लड़ी. हालांकि इस लड़ाई का अंत अंग्रेजों(British) की जीत के साथ हुआ लेकिन गोरखा सोल्जर ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया. एक ब्रिटिश सैनिक ने आत्मकथा(किसी के जीवन पर) में लिखा, "अपने जीवन में पहले कभी मैंने इतना जीवट(Survival) और साहस नहीं देखा था. वे भागते नहीं थे और मौत से उन्हें जैसे डर ही नहीं था. उस वक्त उनके आसपास उनके साथी जवान (Soldier) युद्ध भूमि पर चारो तरफ मरे पड़े थे.
भर्ती ब्रिटिश सेना में कर सकेंगे. यह समझौता उसके बाद दोनों पक्षों के बीच 200 साल से ज्यादा से चल रहे सैनिक रिश्तों का आधार बन गया. हालांकि उस स्थिति के बारे में किसी ने नहीं सोचा था कभी उन्हें अपने भारत से हजारों किलोमीटर दूर Europe में पहले विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ना होगा.
कुल मिलाकर दो लाख गोरखा सैनिकों ने पहले विश्व युद्ध(world War) के दौरान फ्रांस से लेकर फारस तक की खाइयों में लड़ाई लड़ी. 1914 से 1918 तक पहले विश्व युद्ध के दौरान गोरखा सैनिकों के 33 राइफल बटालियन थे. गोरखा सैनिकों पर लिखी किताब में बेनिटा एस्टेवेज(Benita Estevez) ने लिखा है, "नेपाल की सरकार ने समझ लिया कि मित्र देशों की लड़ाई के लिए गोरखा जवान कितने महत्वपूर्ण हैं और ब्रिटिश कमान को सभी मोर्चों पर लड़ने के लिए और टुकड़ियां मुहैया करा दी."
खुखरी ख़ून मांगती है-
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कहते हैं कि जब गोरखा अपनी खुखरी निकाल लेता है तो वह खून बहाए बिना म्यान में नहीं जाता.
विश्व की सबसे बहादुर पलटन-
गोरखा पलटन विश्व की सबसे बहादुर पलटनों में से एक है. गोरखा पलटन Indian आर्मी से 1815 में जुड़ी थी.
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इतिहास एवं महत्वपूर्ण तथ्य-
गोरखा या गोरखाली नेपाल के लोग हैं , जिन्होंने ये नाम 8 वीं शताब्दी के हिन्दू योद्धा संत श्री गुरु गोरखनाथ से प्राप्त किया था.1814-16 के आंग्लो-नेपाल युद्ध में गोरखा सेना की लड़ाई की तरकीब(Trick) और उनकी बहादुरी से ब्रिटिश इतने खुश हुए की गोरखा को ब्रिटिश Indian आर्मी से जोड़ लिया.
3 देशों की सेना से जुड़े है गोरखा सैनिक-
गोरखाली लोग अपने साहस और हिम्मत के लिए विख्यात हैं और वे नेपाली आर्मी और भारतीय आर्मी के गोरखा रेजिमेन्ट और ब्रिटिश आर्मी के गोरखा ब्रिगेड के लिए भी खूब जाने जाते हैं.
Army chief- जनरल दलबीर सिंह सुहाग भी गोरखा राइफल्स से ही सेना में शामिल हुए थे.
महाराजा रणजीत सिंह ने भी इन्हें अपनी सेना में स्थान दिया था.
गोरखा की 5 महत्वपूर्ण बाते-
1.गोरखा सैनिकों की पहचान है खुकरी(नुकीला धारदार हथियार)। 12 Inch लम्बा यह धारदार हथियार दरअसल उनकी यूनिफॉर्म का हिस्सा है।
2. गोरखा रेजिमेन्ट ने भारतीय सेना को दो फील्ड मार्शल(सेना अध्यक्ष) दिए हैं। Sam Manekshaw और वर्तमान सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग।
3. इस प्लाटून के परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेन्ट मनोज कुमार पान्डे की वीर गाथा दुनिया के युद्ध इतिहास में एक केस स्टडी है।
4. गोरखा सैनिकों की 7 रेजिमेन्ट और 42 अलग-अलग बटालियन्स हैं।
5. आजादी से पहले गोरखा रेजिमेन्ट की संख्या 10 थी। बाद में 6 ने भारतीय सेना से जुड़ना स्वीकार कर लिया।
गोरखा रेजिमेंट कैसे और क्यों बनी | Indian Gorkha Regiment




