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चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय | Life Story of Chandrasekhar Azad in Hindi

चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय | Life Story of Chandrasekhar Azad in Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-1 year ago
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चंद्रशेखर आजाद का सम्पूर्ण जीवन परिचय | Complete Life Story of Chandrasekhar Azad in Hindi 

  • उपनाम              - 'आजाद',
  • माता                 - जगरानी देवी 
  • पिता                 - पंडित सीताराम तिवारी   
  • जन्म                -  23 जुलाई 1906 भाबरा गाँव (चन्द्र्शेखर आज़ादनगर) (वर्तमान अलीराजपुर जिला), मध्य प्रदेश
  • मृत्यु                 - 27 फरवरी 1931 चन्द्रशेखर आजाद पार्क, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
  • आन्दोलन          - भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
  • प्रमुख संगठन     - हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन-के प्रमुख नेता (1928)

सात सौ वर्षों तक मुस्लिमों शासकों के शासन के अधीन रहे भारत ने अपना अगला 250 वर्षों का शासन भी ब्रिटिश शासन की गुलामी की छत्र छाया में ही बिताया| ब्रिटिश शाही शासकों द्वारा भारतीय जनमानस के साथ किये जाने वाले जालिम कार्य समकालिक जनता के रोंगटे खड़े कर देते थे:


Life Story of Chandrasekhar Azad  
         " मेरे भारत माता की दुर्दशा
            को देखकर अगर अभी तक 
            आपका रक्त क्रोध नहीं 
            करता तो यह आपकी 
            रगों में बहता खून है ही 
           नहीं या फिर बस पानी है"

 
चंद्रशेखर द्वारा स्वयं कही गई ये पंक्तियाँ इस बात को दर्शाने के लिए काफी हैं कि भारत माँ के इस सपूत को ब्रिटिश राज ने कितना उद्द्वेलित कर रखा था| 

चंद्रशेखर आजाद का प्रारंभिक जीवन-

Life Story of Chandrasekhar Azad

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पंडित चंद्रशेखर तिवारी का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराज जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ था, इनके पिता थे “सीताराम तिवारी” और माता का नाम “जगरानी देवी” था| उनका बचपन अंग्रेजी शासन द्वारा किये गए जुल्मों का गवाह था| उन्होंने ब्रिटिश राज्य के प्रतिनिधिकर्ताओं को भारतीय जनमानस पर जुल्म ढाते बचपन से ही देखा था लिहाजा धीरे-धीरे उनका झुकाव स्वाधीनता संग्राम के लिए छेड़ी गयी जंग के तरफ गया और वो इससे जुड़ गए| हालाँकि उनकी माँ चाहती थी कि उनका बेटा संस्कृत का महान विद्वान बने जिसके लिए उन्होंने उन्हें काशी विद्यापीठ भेजा, परन्तु स्वाधीनता के जज्बे से प्रेरित आजाद ने हमेशा किसी न किसी रूप में आजादी कि लड़ाई से स्वयं को जोड़े रखा| 

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गांधीजी के असहयोग आंदोलन के वक़्त आजाद कि उम्र 15 वर्ष कि थी| वो इस आंदोलन से जुड़ गए और आंदोलनकारी होने कि वजह से उन्हें कैद कर लिया गया| जब उन्हें जज के सामने लाया गया तब जज के नाम पूछने पर उन्होंने अपना नाम आजाद बताया और पिता का नाम स्वतंत्र, निवास स्थान 'जेल' इस वाकये के बाद माँ भारती का ये सपूत लोगों के बीच लोकप्रिय हो गया|

चंद्रशेखर आजाद की शिक्षा-

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चन्द्रशेखर की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही प्रारम्भ हुई। पढ़ाई में उनका कोई विशेष लगाव नहीं था। इनकी पढ़ाई का जिम्मा इनके पिता के करीबी मित्र पं. मनोहर लाल त्रिवेदी जी ने लिया। वह इन्हें और इनके भाई (सुखदेव) को अध्यापन का कार्य कराते थे और गलती करने पर बेंत का भी प्रयोग करते थे। चन्द्रशेखर के माता पिता उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहते थे किन्तु कक्षा चार तक आते आते इनका मन घर से भागकर जाने के लिये पक्का हो गया था। ये बस घर से भागने के अवसर तलाशते रहते थे। इसी बीच मनोहरलाल जी ने इनकी तहसील में साधारण सी नौकरी लगवा दी ताकि इनका मन इधर उधर की बातों में से हट जाये और इससे घर की कुछ आर्थिक मदद भी हो जाये। किन्तु शेखर का मन नौकरी में नहीं लगता था। वे बस इस नौकरी को छोड़ने की तरकीबे सोचते रहते थे। उनके अंदर देश प्रेम की चिंगारी सुलग रहीं थी। यहीं चिंगारी धीरे-धीरे आग का रुप ले रहीं थी और वे बस घर से भागने की फिराक में रहते थे। एक दिन उचित अवसर मिलने पर आजाद घर से भाग गये।

Life Story of Chandrasekhar Azad

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1922 में गाँधी द्वारा आजाद को आंदोलन से अलग कर दिए जाने के बाद इन्होने युवा क्रन्तिकारी "प्रनवेश चटर्जी" के माध्यम से रामप्रसाद बिस्मिल से मुलाकात की और सचिन्द्र नाथ सान्याल, सचिन्द्र नाथ बक्क्षी के साथ मिलकर "हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन" (1924) (एच आर ए) की स्थापना की, ये एक क्रन्तिकारी संस्था थी| आजाद के साहस का साक्ष्य इसी बात से मिलता है की स्थापना के समय अपने जज्बात से साथियों को अवगत कराने के लिए जलती मोमबत्ती पर अपना हाथ रखा तो तब तक नहीं हटाया जब तक हाथ जल नहीं गया| आजाद को देखकर बिस्मिल काफी प्रभावित हुए|

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एच आर ए के इस सक्रिय सदस्य ने ब्रिटिश तिजोरियों को लूटकर नए समाज की स्थापना का स्वप्न देखा| इसके वजह से उनका नाम 1925 के "काकोरी ट्रेन” कांड से जुड़ा| 1928 में "सांडर्स" की हत्या में भी ये शामिल थे, अपने संगठन को संचालित करने के लिए झाँसी को भी अपना केंद्र बनाने वाले आजाद ने वहाँ कई सामाजिक कार्य भी किये| उन्होंने वहां के बच्चों को शिक्षा दी, हनुमान मंदिर बनवाया, इनके नाम पर बाद में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा "धिमारपुरा" (झाँसी) का नाम बदलकर "आजादपुरा" रख दिया|

झाँसी में रहते हुए कार चलने का भी प्रशिक्षण इन्होने ग्रहण किया| सदाशिव मलकापुरकर, विश्वनाथ व्यम्पायन, भगवानदास इनके नए करीबी थे जो इनके क्रांतिकारी समूह का हिस्सा भी थे|

चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु-

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इन्होने सम्पूर्ण जीवन स्वाधीनता के लिए ही लड़ाई लड़ी पर 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी का गवाह बनने में वे असफल रहे क्योंकि माँ भारती के इस सपूत ने क्रांतिकारी विचारधारा का जो रास्ता अपनाया था उसी पर चलकर 27 फरवरी 1931 को ही इस संसार से पलायन कर लिया| इनकी मृत्यु का अंदाज़ भी ऐसा था जो इनके व्यक्तित्व के अनुकूल था स्वयं को आजाद कहने और आजाद रहकर मृत्यु का आलिंगन करने की इच्छा रखने वाले इस स्वतंत्रता सेनानी ने इलाहाबाद के "अल्फ्रेड पार्क" में जब ब्रिटिश पुलिस द्वारा स्वयं के घेर लिए जाने और अंत तक पुलिस से लोहा लेने और फिर आखिरी गोली खुद को मारकर अंग्रेजों की गोली से मृत्यु को भी न स्वीकारने वाले योद्धा की कहानी है|