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महाराजा सूरजमल जीवन गाथा | Maharaja Surajmal Life History in Hindi

By N.j / About :-2 years ago

Maharaja Surajmal Life History

राजस्थान की रेतीली जमीन में चाहे अनाज की पैदावार(Yield) भले ही कम होती रही हो, पर इस भूमि पर वीरों की पैदावार सदा ही बढ़ोतरी से हुई है. अपने पराक्रम और शौर्य के बल पर इन वीर योद्धाओं ने राजा सूरजमल सुयोग्य शासक था।

राजा सूरजमल (सन 1755−1763)

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via : jagran.com

उसने ब्रज में एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य को बना इतिहास में गौरव प्राप्त किया। उसके शासन का समय सन् 1755 से सन् 1763 है। वह सन् 1755 से कई साल पहले से अपने पिता बदनसिंह के शासन के समय से ही वह राजकार्य सम्भालता था।

राजस्थान के साथ-साथ पूरे भारतवर्ष का नाम समय-समय पर रौशन किया है. कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान नाम पड़ने से पहले इस मरू भूमि को 'राजपुताना' कहकर पुकारा था. इस राजपूताने में अनेक राजपूत राजा-महाराजा पैदा हुए. पर आज की कहानी है, इन राजपूत राजाओं के बीच पैदा हुए इतिहास के एकमात्र जाट महाराजा सूरजमल की. जिस दौर में राजपूत राजा मुगलों से अपनी बहन-बेटियों के रिश्ते(relations) करके जागीररें बचा रहे थे. उस दौर में यह बाहुबली अकेला मुगलों से लोहा ले रहा था. सूरजमल को स्वतंत्र हिन्दू राज्य बनाने के लिए भी जाना जाता है.

महाराजा सूरजमल का जन्म 13 फरवरी 1707 में हुआ. यह इतिहास(History) की वही तारीख है, जिस दिन हिन्दुस्तान(India) के बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हुई थी. मुगलों के आक्रमण(The invasion) का मुंह तोड़ जवाब देने में उत्तर भारत में जिन राजाओं का विशेष स्थान रहा है, उनमें राजा सूरजमल का नाम बड़े ही गौरव के साथ लिया जाता है. उनके जन्म(Birth) को लेकर यह लोकगीत काफ़ी प्रचलित(Prevalent) है.

'आखा' गढ गोमुखी बाजी, माँ भई देख मुख राजी.

धन्य धन्य गंगिया माजी, जिन जायो सूरज मल गाजी.

भइयन को राख्यो राजी, चाकी चहुं दिस नौबत बाजी.'

वह राजा बदनसिंह के पुत्र थे. महाराजा सूरजमल कुशल प्रशासक, दूरदर्शी और कूटनीति के धनी सम्राट थे. सूरजमल किशोरावस्था से ही अपनी बहादुरी की वजह से ब्रज प्रदेश में सबके चहेते बन गये थे. सूरजमल ने सन 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी.

सूरजमल के शौर्य गाथाएं

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via: rajras.in

राजा सूरजमल का जयपुर रियासत के महाराजा जयसिंह से अच्छा रिश्ता था. जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में रियासत के वारिश बनने को लेकर झगड़ा शुरु हो गया. सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह को रियासत(Principality) का अगला वारिस बनाना चाहते थे, जबकि उदयपुर रियासत के महाराणा जगतसिंह छोटे पुत्र माधोसिंह को राजा बनाने के पक्ष में थे. इस मतभेद की स्थिति में गद्दी को लेकर लड़ाई शुरु हो गई. मार्च 1747 में हुए संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई. लड़ाई यहां पूरी तरह खत्म नहीं हुई. माधोसिंह मराठों, राठोड़ों और उदयपुर के सिसोदिया राजाओं(Kings) के साथ मिलकर वापस रणभूमि में आ गया. ऐसे माहौल में राजा सूरजमल अपने 10,000 सैनिकों को लेकर रणभूमि में ईश्वरी सिंह का साथ देने पहुंच गये.

सूरजमल को युद्ध में दोनों हाथो में तलवार ले कर लड़ते देख राजपूत रानियों ने उनका परिचय पूछा तब सूर्यमल्ल मिश्र ने जवाब दिया-

'नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर, जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर'.

इस युद्ध में ईश्वरी सिंह को विजय प्राप्त हुई और उन्हें जयपुर का राजपाठ मिल गया. इस घटना के बाद महाराजा सूरजमल का डंका पूरे भारत देश में बजने लगा.

1753 तक महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला तक अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ा लिया था. इस बात से नाराज़ होकर दिल्ली के नवाब गाजीउद्दीन ने सूरजमल के खिलाफ़ मराठा सरदारों को भड़का दिया. मराठों ने भरतपुर पर चढ़ाई कर दी. उन्होंने कई महीनों तक कुम्हेर के किले को घेर कर रखा. मराठा इस आक्रमण में भरतपुर पर तो कब्ज़ा नहीं कर पाए, बल्कि इस हमले की कीमत उन्हें मराठा सरदार मल्हारराव के बेटे खांडेराव होल्कर की मौत के रूप में चुकानी पड़ी. कुछ समय बाद मराठों ने सूरजमल से सन्धि कर ली.

लोहागढ़ किला

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सूरजमल ने अभेद लोहागढ़ किले का निर्माण करवाया था, जिसे अंग्रेज 13 बार आक्रमण करके भी भेद नहीं पाए. मिट्टी के बने इस किले की दीवारें इतनी मोटी बनाई गयी थी कि तोप के मोटे-मोटे गोले भी इन्हें कभी पार नहीं कर पाए. यह देश का एकमात्र किला है, जो हमेशा अभेद रहा. तत्कालीन समय में सूरजमल के रुतबे की वजह से जाट शक्ति अपने चरम पर थी. सूरजमल से मुगलों और मराठों ने कई मौको पर सामरिक सहायता ली. आगे चलकर किसी बात पर मनमुटाव(Pique) होने की वजह से सूरजमल के सम्बन्ध(Relation) मराठा सरदार सदाशिव भाऊ से बिगड़ गए थे..

पानीपत की लड़ाई

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सन 1761 में पानीपत का ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमें राजपूत−जाट−मराठा जैसे शक्तिशाली और वीर सैनिकों के होते हुए भी देश को हार का सामना करना पड़ा। मुख्य कारण हिन्दू शासकों का आपस में मेल न होना था। अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों से सबक़ लेकर मराठों और जाटों ने संधि की; लेकिन वे राजपूतों से गठजोड़ करने में कामयाब नहीं हुए। वे अपने ही बलबूते पर अब्दाली को ख़त्म करने के लिए प्रतिज्ञाबध्द थे। इस लड़ाई में मराठा सरदार सदाशिवराव भाऊ और सूरजमल नीतिगत मतभेद हो गये। भाऊ ने सूरजमल के साथ अपमान पूर्ण वार्ता की थी । सूरजमल नाराज़ होकर अपनी सेना के साथ वापिस चला गया। मराठा सरदार को अपनी ताक़त पर बहुत भरोसा था, उसने जाटों की बिल्कुल परवाह नहीं की।

युद्ध में अफ़ग़ान सैनिक और भारत के मुसलमान रूहेले थे, जो लगभग 62 हज़ार थे, दूसरी तरफ अकेले मराठा सैनिक थे, जिनकी संख्या 45 हज़ार थीं। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। उसमें मराठाओं ने बहुत वीरता(Valor) दिखलाई; किंतु संख्या की कमी और प्रबंधकीय शिथिलता(Procrastination) होने के कारण मराठा हार गये। उस युद्ध में सैनिक बहुत संख्या में मारे गये। भरतपुर के 'मथुरेश' कवि ने इस स्थिति पर दु:ख जताते हुए कहा है −

"नाँच उठी भारत की भावी सदाशिव शीश, ओंधी हुई बुद्धि उस जनरल महान् की ।

होती न हीन दशा हिन्दी−हिन्द−हिन्दुओं की, मानता जो भाऊ, कहीं सम्मति सुजान की।।"

पानीपत के युद्ध(War) में पराजित और घायल सैनिकों के खान−पान और सेवा−शुश्रुषा और दवा−दारू की व्यवस्था(arrangement) सूरजमल की ओर से की गई थी।

उदार प्रवृति के धनी

पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ. इस युद्ध में हजारों मराठा योद्धा मारे गए. मराठों के पास रसद सामग्री भी खत्म चुकी थी. मराठों के सम्बन्ध अगर सूरजमल से खराब न हुए होते, तो इस युद्ध में उनकी यह हालत न होती. इसके बावजूद सूरजमल ने अपनी इंसानियत का परिचय देते हुए, घायल मराठा सैनिकों के लिए चिकित्सा और खाने-पीने का प्रबन्ध किया.

युद्ध के मैदान में ही मिली इस वीर को वीरगति

हर महान योद्धा की तरह महाराजा सूरजमल को भी वीरगति का सुख समरभूमि में प्राप्त हुआ. 25 दिसम्बर 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हिंडन नदी के तट पर हुए युद्ध में सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए. उनकी वीरता(Val or), साहस और पराक्रम का वर्णन सूदन कवि ने 'सुजान चरित्र' नामक रचना में किया है. हमारे इतिहास को गौरवमयी बनाने का श्रेय सूरजमल जैसे वीर योद्धाओं को ही जाता है. जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए. ऐसे सच्चे सपूतों(The sperm) को हमेशा वीर गाथाओं में याद किया जाएगा.

महाराजा सूरजमल जीवन गाथा | Maharaja Surajmal Life History in Hindi