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महाराणा प्रताप का सम्पूर्ण जीवन परिचय एवं इतिहास | Maharana Pratap History In Hindi

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महाराणा प्रताप का जीवन परिचय, इतिहास, कहानी और उनकी मृत्यु का कारण
महाराणा प्रताप सिंह जिनका पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया था भारत माता के ऐसे सपूत थे जिनके नाम का लोहा समकालीन मुग़ल शासकों के अलावा पूरी दुनिया आज भी मानती है| भारत माता के इस महान सपूत का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीय रविवार विक्रम सम्वत 1597 अर्थात 9 मई 1540 को तत्कालीन उत्तर पश्चिमी राज्य (वर्तमान के राजस्थान ) के मेवाड़ प्रान्त स्तिथ कुम्भल गढ़ के किले में हुआ था| इनके पिता उदय सिंह और माता राणी जयवंत कवर थीं| महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे| इतिहास की गाथाएँ महाराणा प्रताप सिंह के नाम को उनकी असीम वीरता, उनके अदम्य साहस, उनके शौर्य, उनके बलिदान और उनके दृढ़ प्रणों की रोचक व अविस्मरणीय कथाओं से भरी पड़ी है|
महाराणा प्रताप के बारे में कुछ तथ्य और जीवन परिचय:
- महाराणा प्रताप उपनाम- प्रताप सिंह
- प्रताप शासन काल- 1568-1597
- जन्म- 9 मई 1540
- प्रताप जन्मस्थान- कुम्भलगढ़ दुर्ग राजस्थान, भारत
- प्रताप की मृत्यु- 19 जनवरी 1597 (उम्र 56)
- पूर्वज- उदय सिंह द्वितीय
- प्रताप के कुल संतान - 17 पुत्र और 5 पुत्रियाँ
- प्रताप का उत्ताधिकारी- अमर सिंह प्रथम
- प्रताप की पत्निया - महारानी - अजबदे पुनवार
- प्रताप का पुत्र- अमर सिंह
- राजसी घर- सिसोदिया
- पिता का नाम - उदय सिंह
- माता महारानी - जयवंताबाई
- धर्म- हिन्दू
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महाराणा प्रताप में वीरता एव स्वतंत्रता के लिए प्यार तो उनके खून में बसा था। आख़िर वो महराणा सांगा के पोते एव उदय सिंह के पुत्र थे। एक ऐसा समय आया जब कई राज्यों के राजपूतों ने अकबर के साथ मित्रता कर ली थी, परन्तु मेवाड़ राज्य स्वतन्त्र ही बना रहा, जिससे अकबर बहुत अधिक क्रोधित हो गया था। उन्होंने राजस्थान के मेवाड़ राज्य पर हमला किया और चित्तौड़ के किले पर कब्जा कर लिया और उदय सिंह पहाड़ियों पर भाग गये लेकिन उन्होंने अपने राज्य के बिना भी स्वतंत्र रहने का फैसला किया। उदय सिंह की मृत्यु के बाद महराणा प्रताप ने इस जिम्मेदारी को संभाल कर लोगों के बीच एक सच्चे नेता के रूप में उभर कर सामने आये।
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प्रताप के पास मुगलों का बैर(hostility) करने का ठीक समय नहीं था क्योंकि उनके पास पूंजी (धन) का आभाव था और पड़ोसी राज्य भी अकबर के साथ मिल गये थे। अकबर ने प्रताप को अपने घर रात्रि भोज पर आमंत्रित करने के लिए मान सिंह को उनके पास अपना दूत बनाकर भेजा, जिसका मुख्य उद्देश्य उनके साथ बातचीत करके शांतिपूर्ण गठबंधन स्थापित करना था। परन्तु प्रताप स्वयं नहीं गये और अपने पुत्र अमर सिंह को अकबर के पास भेज दिया। इस घटना के बाद मुगल और मेवाड़ के बीच सबंधं अधिक बिगड़ गये तथा जल्द ही 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध शुरू हो गया।
प्रताप की सेना के मुकाबले मानसिंह के नेतृत्व वाली अकबर की सेना के पास अपार बल था, फिर भी प्रताप ने अपने विरोधियों का बड़ी वीरता के साथ मुकाबला किया। महाराणा प्रताप की मदद के लिए आस-पास की पहाड़ियों से भील जाती के आदिवासी भी आये थे। प्रताप एक सिंह की तरह बड़ी वीरता के साथ युद्ध लड़ रहे थे परन्तु दुर्भाग्य यह था कि दूसरी तरफ मानसिंह था। अंत में, जब मुगल सेना की विजय सुनिश्चित हो गई, तो प्रताप के लोगों ने उन्हें युद्ध के मैदान से हट जाने की सलाह दी। मुगल सेना के प्रकोप से बचने के लिए महान पुरूष-झलासिंह ने प्रताप सिंह की युद्ध से भाग निकलने में काफी मदद की थी। युद्ध में गंभीर रूप से घायल प्रताप को कोई मार पाता, उससे पहले ही वह अपनी बचाव के लिए अपने विश्वासी घोड़े चेतक पर सवार हो कर वह से भाग निकले भाग गये।
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प्रताप को अपने भगोड़े जीवनकाल जंगल में बहुत भयंकर(horrid) कठिनाई से मुकाबला करना पड़ा इतनी मुसीबतो के बाद भी वे स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे। भामाशाह जैसे भरोसेमंद पुरुषों की मदद से उन्होंने दोबारा युद्ध(war) लड़ा और प्रदेश के बहुसंख्या(Majority) हिस्सों में अपना राज्य पुनः गठित कर लिया। यद्यपि वह चित्तौड़ राज्य को पूर्णरूप से स्वतंत्र नहीं करा सके थे परन्तु प्रताप की मृत्यु अपने अनुयायियों(सेना के प्रमुख लोग) के बीच एक वीर शूरवीर(Knight) की तरह हुई।
महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक:
महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। युद्ध की विभीषिका के बीच राणा उदयसिंह ने चित्तौड़ त्याग कर अरावली पर्वत पर डेरा डाला और वहां उदयपुर के नाम से नया नगर बसाया जो उनकी राजधानी भी बनी। उदयसिंह ने अपनी मृत्यु के समय भटियानी रानी के प्रति आसक्ति के चलते अपने छोटे पुत्र जगमल को गद्दी सौंप दी थी। जबकि, प्रताप ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण स्वाभाविक(Natural) उत्तराधिकारी थे। उदयसिंह के फैसले का उस समय सरदारों और जागीरदारों ने भी विरोध किया था।
दूसरी ओर मेवाड़ की प्रजा भी महाराणा प्रताप से लगाव रखती थी। जगमल को गद्दी मिलने पर जनता में विरोध और निराशा उत्पन्न हुई। इसके चलते राजपूत सरदारों ने मिलकर विक्रम संवत 1628 फाल्गुन शुक्ल 15 अर्थात 1 मार्च 1576 को महाराणा प्रताप को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया
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हल्दीघाटी का युद्ध:
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महाराणा प्रताप स्वतंत्रता प्रेमी थे और इसी के कारण उन्होंने अकबर की आधीनता को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया जिसके लिए अकबर ने चार बार महारणा प्रताप के पास अपने शांति दूतों को भेजा था जिनमे प्रमुख थे- जलाल खान कोरची, मान सिंह, भगवन दस और टोडर मल| मुगलों के आगे झुकने से इंकार करने के कारण महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच इतिहास की अविस्मरणीय यादें देने वाला हल्दी घाटी का प्रमुख युद्ध लड़ा गया 18 जून 1576 को लगभग 4 घंटों तक चला युद्ध इतिहास के भयंकर युद्धों में से एक मन जाता है| महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व एक मुस्लिम सरदार हाकिम खान सूरी ने किया था और मुगलों का नेतृत्व आसफ खान ने| इस युद्ध में महाराणा प्रताप के सैनिकों की संख्या 20 हज़ार थीं जबकि मुगलों की 80 हज़ार, इतनी सशक्त और अपने से संख्या में अधिक सैन्यबल के आगे भी महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और अपने पराक्रम से इतिहास को स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली शौर्य की गाथाएँ दी| इतिहासकारों के मुताबिक युद्ध अनिर्णायक रहा परन्तु महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना ने मुगलों की सेना के छक्के छुड़ा दिए| इस युद्ध में महाराणा के प्रिय खोड़े चेतक की मिर्त्यु हो गई उसके बाद महाराणा प्रताप ने एक-एक कर कई किले जीते, मुगलों के अधिपत्य में आयी नरमी ने महाराणा प्रताप को एक बार फिर अवसर दिया और उन्होंने उदयपुर पर आक्रमण व 36 महत्वपूर्ण स्थानों पर भी अधिकार कर लिया| इसके 11 वर्षों बाद 29 जनवरी 56 वर्ष की आयु में अपने साम्राजय की नई बसी राजधानी में चावंड उनकी मृत्यु हुई|कहते हैं की उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर उनके दुश्मन रहे अकबर की आँखे भी अश्रुपूरित होने से खुद को रोक नहीं पाई क्योंकि अकबर जानते थे की राणा जैसा वीर सायद अब और कोई न होगा |
प्रताप का युद्ध से बच निकलना: History कथाएं बताती है कि महाराणा प्रताप के एक सेना नायक ने प्रताप के वस्त्रों को धारण(Holding) कर लिया और उनके स्थान पर लड़ाई में लड़ने लगा था और इस तरह महाराणा प्रताप वहाँ से बच निकल गये।
भामाशाह की सहायता- दानवीर भामाशाह ने सेनापति के रूप में प्रताप की सहायता की थी ताकि प्रताप मालवा पर उनकी लूट और मुगलों के खिलाफ लड़ाई जारी रख सकें।
अंतिम दिन- महारणा प्रताप एक जंगली दुर्घटना के कारण घायल हो गए थे इस कारण महाराणा प्रताप की मृत्यु 19 जनवरी 1597 को चावंड में हुई थी।
महाराणा प्रताप का सम्पूर्ण जीवन परिचय एवं इतिहास | Maharana Pratap History In Hindi




