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जलियांवाला बाग नरसंहार का दूसरा रूप मानगढ़ का नरसंहार | Mangarh Massacre in Hindi

जलियांवाला बाग नरसंहार का दूसरा रूप मानगढ़ का नरसंहार | Mangarh Massacre in Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-2 months ago
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भारत के इतिहस में एक दुखद घटना के अध्याय जलियांवाला बाग के भंयकर कांड को हुए 100 साल से ऊपर हो चुके है. जलियांवाला बाग में ब्रिटिश सेना की गोलियो से छलनी लोगो की चीखें आज भी हमारे कानों में गुजती है. वो दिन था 13 अप्रेल 1919 का जब जनरल डायर ने अपने एक आदेश पर जलियांवाला बाग में हो रही शांति सभा पर गोलिया बरसा दी और इस घटना में 379 निर्दोष सिखों की हत्या कर दी गई. ब्रिटिश सरकार ने 100 साल पहले घटी इस घटना को ब्रिटिश भारत के इतिहास की सबसे शर्मनाक व अपने इतिहास पर इसे एक धब्बा माना.  लेकिन अब तक इस मामले को लेकर ब्रिटिश सरकार ने औपचारिक रूप से माफी नही मांगी है.

17 नवंबर 1913 का वो काला दिन | Mangarh Massacre

Mangarh Massacre in Hindi

Source postcardhindi.news

13 अप्रेल 1919 को घटित हुए जलियांवाला बाग के नरसंहार इतिहास के पन्नों में जनरल डायर की क्रूरता से मरें निर्दोश लोगो की कहानी लिखी हुई है. आज भी जलियांवाला बाग में ब्रिटिश सेना के द्वारा बरसाई गोलियों के निशान इस नहसंहार के सबूत है. इतिहास की इन बातों को याद कर हर भारतीय की आंखे भर आती है. दोस्तो आज पुरी दुनिया में जलियांवाला बाग नरसंहार के बारे में जाना जाता है लेकिन 17 नवंबर 1913 को राजस्थान-गुजरात अरावली पर्वत की श्रंखला में मानगढ़ में हुए एक बर्बर नरसंहार की कहानी इतिहास के पन्नों से बाहर पड़ी हुई है. यही वजह है की आज मानगढ़ के नरसंहार के बारे में कम ही लोगो को जानकारी है. 17 नवबंर 1913 में हुए मानगढ़ के इस नरसंहार में बर्बरता से 1000 लोगो को मौत के घाट उतार दिया था.

मानगढ़ का नरसंहार | Mangarh massacre Histroy In Hindi

मानगढ़ के नरसंहार में बारे में जानने के लिए कई न्यूज एजेंसियों ने राजस्थान के बांसवाड़ा पंचमहल और डूंगरपुर जिलें में बसे भीलो से इस नरसंहार के बारे में जाना. वहा के स्थानीय लोगो के विचारो के अनुसार मानगढ़ के टेकरी में अग्रेजी सेना ने आदिवासी कबिलों के नेता वह समाज सुधारक गोविंद गुरु और उनके 1500 से भी ज्यादा भक्तों की हत्या कर दी थी.

“ भगत आंदोलन” से अग्रेजी नीतियों से बगावत | Mangarh Bhagat movement

Mangarh Massacre in HindiSource www.panchjanya.com

इस आंदोलन की शुरुआत होती है राजस्थान के डूंगरपुर जिलें वेदसा गांव से. इस गांव में एक व्यक्ति रहते थे गोविंद गुरु. जो बंजारा समुदाय से थे. 19 वीं सदी में उन्होंने गांव के भीलों को सशक्त करने के लिए “भगत आंदोलन” की शुरुआत की इस आंदोलन के तहत उन्होंने भीलों को पुर्ण शाकाहारी व शराब और मादक पदार्थें न अपनाने सीख दी. गुरु गोविंद के वचनों से प्रेरित होकर भीलों ने अंग्रेजी सरकार की सम्पूर्ण नीतियों का विरोध करते हुए सभी भील समुदाय के लोग बांसवाड़ा, संतरामपुर, डुंगरपुर एवं कुशलगढ़ के रजवाड़ो के साथ होते हुए बंधुआ मजदुरी के विरोध में शामिल हो गए. 

इस घटना में मारे गए लोगो के मौजूद वंशज इस बारे में बताते है की जब भीलो ने अग्रेजी हुकूमत को टेकरी को छोड़ने से मना कर दिया था. तब भीलो की एकता के आगे अंग्रेजी सेना बेबस हो गई और उन्होंने टेकरी में गोलीबारी करना शुरु कर दी. दोनो तरफ से भंयकर गोलीबारी शुरु हो गई और चारो तरफ लाशे बिछने लग गई इस दौरान एक अंग्रेजी अफसर ने इस गोलीबारी को तब रुकवा दिया जब उन्होंने देखा की गोली लगने से मौत हो चुकीं महिला से लिपट कर उसका बच्चा स्तनपान कर रहा है. इस गांव के 86 वर्ष के वीरजी पारघी ने इस बारें में बताते हुए कहा की इस कांड के दौरात उनके पिता सोमा जीवित बच गए थे. पिता सोमा जी की मृत्यु साल 2010 में 110 साल की उम्र में हुई थी. उन्हें उनके पिता इस गोलीबारी के बारे में बताते थे की अंगेजी सेना खच्चरों पर तोप जैसी वजनी बंदूकें लाद कर उन्हें एक गोल मैदान में दोड़ाते थे.

अंग्रेजी सेना के सामने रखी थी यह मांगें | Mangarsh Kand Kab Huaa Tha

इस संम्पुर्ण ऐतिहासिक घटना की पुष्टि ऐतिहासिक शोध भी मौखिक रुप से बनें इस इतिहास की संम्पुर्णतय पुष्टि करते है. इस बारें में गुजरात यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बताते है की भीलों को गुरु ने अपने इस आंदोलन की शुरुआत साल 1890 में ही कर दी थी तब अग्नि देवता को इसका प्रतीक माना गया था. साल 1903 में गोविंद गुरु ने अपनी यह धुणी डुंगरगढ़ के टेकरी में स्थापित की. गोविंद गुरु के अनुसार ही भीलों ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने 33 मांगें रखी. इन मांगों में भीलों की मुख्य मांगें थी रजवाड़ो व अंग्रेजो द्वारा बंधुआ मजदूरी, अधिक लगान व गुरु के अनुयायियों पर किए जाने वाले उत्पीड़न से जुड़ी हुई थी. भीलो की इन सब मांगों पर रजवाड़ो व अंग्रेजी सरकार ने स्वीकार करने से बिलकुल मना कर दिया था.

पुंजा धिरजी ने संभाला आंदोलन का मोर्चा

Mangarh Massacre in HindiSource images.catchnews.com

मानगढ़ नरसंहार की शुरुआत से 1 महीने पहले हजारो भीलों ने मिल कर मानगढ़ की पहाड़ी को अपने अधिन कर लिया. सपाम भीलों का अब एक ही उद्देश्य था अंगेजो से पुर्ण आजादी. इन परिस्थितियों को देखते हुए अंग्रजो ने इस आंदोलन को समाप्त करने के लिए भीलों को सलाना सवा रुपये जुताई की पेशकश की. लेकिन भीलों ने अंग्रेजो की इस साल को समझ लिया और इसके लिए बिलकुल इनकार कर दिया. तब अंग्रेजो के खिलाफ पहली कार्रवाही की शुरुआत हुई मानगढ़ के पास स्थित संतरामपुर के थाने पर भीलों के द्वारा हमला कर दिया गय. इस पुरी घटना को गोविंद गुरु के करीबी पुंजा धिरजी और साथी पारघी एवं उनके समर्थकों साथ मिल कर दिया था. इस हमले में संतरामपुर के थानाधिकारी गुल मोहम्मद की मौत हो गई थी.

संतरामपुर घटना के बाद मांनगढ़ हुआ किले मे तब्दील

संतरामपुर में भीलों के द्वारा कि गई घटना के बांसवाड़ा, संतरामपुर, डूंगरपुर आदी जगहों पर गुरु के अनुयायियों का इन क्षेत्रों में पक्ष काफी मजबूत हो गया. तब अंग्रेजी सरकार ने भीलों को 13  नवंबर 1913 को मांनगढ़ के किले को छोड़ कर जाने की चेतावनी दी. इस बारें में लालशंकर बताते है की - “ सभी भीलो ने मिल कर मांनगढ़ के किले को पुरी तरह अपने किले के रुप में बदल दिया. भीलों ने किले के अंदर तलवारें बंदूक, और तमचें जमा कर लिए. भीलों ने इस किले से ही अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया क्योंकि गुरु के अनुयायियों को इस बात भरोसा था की गुरु अपनी ताकत से अंग्रेजो की गोलियो को ततैया में तब्दील कर देंगे”

मांनगढ़ में शुरु हुआ नरसंहार | Mangarh Massacre Ki Jankari

Mangarh Massacre in HindiSource www.newsplatform.in

मांनगढ़ के किलें पर पुर्ण रुप से भीलों का कब्जा होने के बाद अंग्रेजी सेना व रजवाड़ो के 3 अफसरों ने इस किलें को भीलों से अधिकार मुक्त करने की कार्रवाही करते हुए मानगढ़ किले को चारो तरफ से घेर लिया अंग्रेजी सेना ने पहले हवा में फायरिंग की और बाद में शुरु हो गया मानगढ़ का नरसंहार इस नरसंहार के पीछें मास्टरमाइंड था अंग्रेजी एजेंट  आ. ई हैमिल्टन इस नरसंहार में हजारो भीलों के सीने में गोलिया भर दी गई कई जख्मी हुए. इस कार्रवाही के बाद 900 से अधिक भीलों को जिंदा पकड़ा गया. 

गुरु को दी गई आजीवन कारावास की सजा

मानगढ़ के नरसंहार के बाद अंग्रेजी सेना ने गुरु गोविंद को पकड़ लिया और उन पर मुकदमा चला और उन्हें ब्रिटिश सरकार ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई. लेकिन साल 1919 में गुरु गोविंद के अच्छें व्यवहार और अनुयायियों के बीच लोकप्रियता के कारण जेल से रिहा कर दिया गया. लेकिन गुरु गोविंद का किसी भी अंग्रेजी रियासत में प्रवेश पर पांबदी लगा दी गई. जेल से रिहा होने के बाद गुरु गुजराज के लिंबडी के पास स्थित कंबोई में बस गए साल 1931 में उनकी मूत्यू हो गई. आज भी गुरु की वहां समाधी बनी हुए है जहां उनके भक्त आते है.

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