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वाह रे बड़े मियां, बर्फी हिंदू और इमरती मुसलमान, वाह भई वाह

By SUSHIL KUMAR / About :-8 years ago

वाह रे बड़े मियां, बर्फी हिंदू और इमरती मुसलमान, वाह भई वाह
लंबा सा चोंगा नुमा कुर्ता, चौड़ा पायजामा, सिर पर लंबी सी टोपी और पांव में चर्र-मर्र करती जूतियां। यही पहचान थी दिल्‍ली दरबार में शाही शायर रहे मिर्जा असदउल्‍लाह खां गालिब की। गालिब सिर्फ एक नाम ही नहीं था बल्कि उर्दू की शायरी में वो मुकाम था जिसको पाने के लिए लोग उस वक्‍त भी तरसते थे और आज भी तरसते हैं। आज उन्हीं गालिब का 220वां जन्मदिन है। अव्‍वल तो गालिब को भी काफी तरसने के बाद दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब मिला था। इस खिताब को अदा करने वाले आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर थे। जफर खुद भी शायर थे लिहाजा शायरों की कदर करनी भी उन्‍हें आती थी। गालिब की एक बात बेहद खास थी। वो शेर कहते और कपड़े में गिरह लगाते जाते थे, बाद में गिरह खोलते जाते और सभी को दर्ज कर लेते थे। ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाना जाता है।

1850 में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने मिर्ज़ा गालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के खिताब से नवाज़ा। बाद में उन्हे मिर्ज़ा नोशा क खिताब भी मिला। वे शहंशाह के दरबार में एक महत्वपूर्ण दरबारी थे। उन्हे बहादुर शाह ज़फर द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार फ़क्र-उद-दिन मिर्ज़ा का शिक्षक भी नियुक्त किया गया। वे एक समय में मुगल दरबार के शाही इतिहासविद भी थे। 

गालिब के पूर्वज कई जगहों से होते हुए हिंदुस्तान पहुंचे थे। गालिब को फारसी की अच्छीे समझ भी इसलिए ही थी। पहले गालिब फारसी में ही अपने शेर कहते थे। इसके अलावा उनका पहले तखल्लुस भी असद हुआ करता था, लेकिन बाद में उन्होंने इसे बदलकर गालिब रख लिया था। 

गालिब उस्‍ताद जौक और मियां मौमिन के जमाने के शायर थे। लेकिन उस्‍ताद जौक का उस वक्‍त न सिर्फ दिल्‍ली में बल्कि बादशाह के यहां भी बड़ा रुतबा कायम था। लेकिन इन दोनों की कभी नहीं बनी। हमेशा ही दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी के रूप में ताउम्र कायम रहे। यही वजह थी कि अकसर एक दूसरे पर कसीदे पढ़ने से भी दोनों बाज नहीं आते थे। दौर शायरों का था तो एक दूसरे से मजे लेने का जरिया भी उनकी शायरी ही हुआ करती थी।एक बार जौक सड़क से पालकी पर जा रहे थे और मिर्जा जुआ खेल रहे थे। तभी उनका ध्‍यान किसी ने जौक की तरफ करवाया तो मिर्जा ने कहा “बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता”। इस पर जौक खफा हो गए। लिहाजा बादशाह के सामने उन्‍हें नीचा दिखाने की जुगत लगाई गई। उन्‍हें एक रात शाही मुशाएरे में बुलाया गया और उस्‍ताद जौक ने मिर्जा की पक्तियों पर अपना ऐतराज दर्ज कराया। लेकिन मिर्जा भी कहा मानने वालों में से थे। उन्‍होंने झट से बादशाह से कहा कि वो उनकी नई ग़ज़ल का मक़्ता है। 

कहते थे कुछ लोग हैं जिनकी रोजी-रोटी उन जैसे इंसानों से ही चलती है, फिर क्‍यों ऐसे लोगों को क्‍यों बेरोजगार कर उनके पेट पर लात मारी जाए। "गालिब" का कहना था कि "जरूरत थैले की हो तो बोरा मांगो, "निराश" नहीं होगे।"

गालिब के कुछ किस्‍से भी दिल्‍ली की गलियों में बेहद मशहूर थे। गालिब दरअसल उस शख्‍स का नाम था जो धर्म से ऊपर इंसान को समझता था। यही वजह थी कि दिवाली पर अपने माथे टीका लगवाने पर उन्‍हें कोई ऐतराज नहीं होता था। 

उस दौर में मिर्जा के इश्‍क में एक नाचने वाली जबरदस्‍त तरह से पागल थी। अक्‍सर उसकी महफिल में मिर्जा की नज्‍म सुनाई देती थी। आलम यह था कि कोतवाल के चलते दबाव से उसको दिल्‍ली की गलियां ही त्‍यागनी पड़ी। मिर्जा ताउम्र एक बच्‍चे की ख्‍वाहिश पाले रहे। हुए तो कई लेकिन कोई जी नहीं पाया। बार-बार उनकी ख्‍वाहिश दम तोड़ती हुई उन्‍हें दिखाई देती।

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