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आखिर कैसे हुई अग्नि की उत्पत्ति | Aag Ki Utpatti or Rahasya

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आखिर कैसे हुई अग्नि की उत्पत्ति? | Check out the Detailed Information about Fire
गुरु वृहस्पति द्वारा कई प्रकार की अग्न्निवह बहुत अधिक महत्वपूर्ण(Important) (पूज्य) होने के कारण ‘महान’ कहा गया है। शंयु के पहले पुत्र भरद्वाज की पत्नी का नाम ‘वीरा’ था, जिसने वीर नामक पुत्र को शरीरयों का जन्म | मार्कण्डेय जी का कहना हैं कि- राजन! बृहस्पति जी की जो यशस्विनी पत्नी चान्द्रमसी (तारा) नाम से प्रसिद्ध थी, उसने पुत्ररूप में छ: पवित्र अग्नियों को तथा एक पुत्री को भी जन्म दिया।
How Was The Origin of Fire?
(दर्श-पौर्णमास आदि में) प्रधान आहुतियों को देते वक़्त जिस अग्नि के लिये सबसे पहले घी की आहुति दी जाती है, वह महान व्रतधारी अग्नि ही बृहस्पति का ‘शंयु’ नाम से प्रसिद्ध (प्रथम) पुत्र है।
चातुर्मास्य-सम्बन्धी यज्ञों में तथा अश्वमेध यज्ञ में जिसे पूजा(prayer) जाता है, जो सबसे पहले उत्पन्न होने वाला और सर्वसमर्थ है तथा जो कई वर्ण की ज्वालाओं से प्रज्वलित होता है, वह अनूठा शक्तिशाली अग्नि ही शंयु है।
शंयु की पत्नी का नाम था सत्या। वह धर्म की पुत्री थी। उसके रूप और गुणों(Qualities) की कहीं तुलना नहीं थी। वह हमेशा सत्य के पालन में तत्पर रहती थी। उसके गर्भ से शंयु के एक(one) अग्रिस्वरूप पुत्र तथा सर्वश्रेष्ठ व्रत(fast) का पालन करने वाली तीन कन्याएं हुईं।
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यज्ञ में सर्वप्रथम आज्यभाग के द्वारा जिस अग्नि की पूजा की जाती है, वही शंयु का ज्येष्ठ पुत्र ‘भरद्वाज’ नामक अग्नि बताया जाता है। सभी पौर्णमास यागों में स्रुवा से हविष्य के साथ घी उठाकर जिसके लिये ‘प्रथम आघार’ अर्पित किया जाता है, वह ‘भरत’ (ऊर्ज) नामक अग्नि शंयु का द्वितीय पुत्र है (इसका जन्म शंयु की दूसरी स्त्री के गर्भ से हुआ था।)
शंयु के तीन कन्याएं और हुईं, जिसका बड़ा भाई भरत ही पालन करता था। भरत (ऊर्ज) के ‘भरत’ नाम वाला ही एक पुत्र तथा ‘भरती’ नाम की कन्या हुई। सबका भरण-पोषण करने वाले प्रजापति भरत(bharat) नामक अग्नि(fire) से ‘पावक’ की उत्पति हुई।
भरत श्रेष्ठ! वह बहुत अधिक महत्वपूर्ण (पूज्य) होने के कारण ‘महान’ कहा गया है l शंयु के पहले(first) पुत्र भरद्वाज की पत्नी का नाम ‘वीरा’ था, जिसने वीर नामक पुत्र को शरीर प्रदान किया l
ब्राह्मणों ने सोम की ही भाँति वीर की भी आज्यभाग से पूजा बतायी है l इनके लिये आहुति देते समय मन्त्र का उपांशु अनुलेखन किया जाता है ll सोम देवता के साथ इन्हीं को द्वितीय आज्यभाग प्राप्त होता है l इन्हें ‘रथप्रभु,’ ‘रथध्वान’ और ‘कुम्भरेता’ भी कहते हैं l
वीर ने ‘सरयू’ नाम वाली पत्नी के गर्भ से ‘सिद्धि’ नामक पुत्र(sun) को जन्म दिया l सिद्धि ने अपनी प्रभा से सूर्य को भी ढक लिया l सूर्य के ढक जाने पर उसने अग्नि देवता सम्बन्धी यज्ञ का अनुष्ठान(Ritual) किया l आह्वान-मन्त्र (अग्निमग्न आवह इत्यादि) में इस सिद्धि नामक अग्नि की ही प्रशंसा की जाती हैl
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बृहस्पति के दूसरे पुत्र का नाम ‘निश्च्यवन’ है l यह यश, वर्चस्(Virchs) (तेज) और कान्ति से कभी गिरा हुआ नहीं होता हैं l निश्च्यवन अग्नि केवल पृथ्वी की स्तुति करते हैं l वह निष्पाप, निर्मल, विशुद्ध तथा तेज:पुज्ज से प्रकाशित हैं l उनका पुत्र ‘सत्य‘ नामक अग्नि है; सत्य भी निष्पाप तथा कालधर्म के प्रवर्तक हैं ll
वह वेदना से पीड़ित होकर दर्द करने वाले प्राणियों को उस तकलीफ़ से प्रायश्चित (relief) दिलाते हैं l इसीलिये उन अग्नि का एक नाम प्रायश्चित भी है l वे ही प्राणियों द्वारा सेवित गृह और उपवन आदि में शोभा की सृष्टि करते हैं l
सत्य के पुत्र का नाम ‘स्वन’ है l जिनसे दुखित होकर लोग वेदना से स्वयं कराह उठते हैं l इसलिये उनका यह नाम पड़ा है। वे रोगकारक अग्नि हैं l (बृहस्पति के तीसरे पुत्र का नाम ‘विश्वजित’ है) वे पुरे संसार(world) की बुद्धि को अपने वश में करके स्थित हैं l इसीलिये अध्यात्मशास्त्र के विद्वानों(Scholars) ने उन्हें ‘विश्वजित्’ अग्नि कहा है l
भरतनन्दन! जो सभी प्राणियों के उदर में स्थित हो उनके खाये हुए पदार्थों को पचाते हैं l वे समस्त(all) लोकों में ‘विश्वभुक’ नाम से विख्यात(famous) अग्नि बृहस्पति के (चौथे) पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं l ये विश्वभुक अग्नि ब्रह्मचारी, जितात्मा तथा सदा(Forever) प्रचुर व्रतों का पालन करने वाले हैं l ब्राह्मण लोग पाकयज्ञों में इन्हीं की पूजा करते हैं l
पवित्र गोमती नदी इनकी प्रिय पत्नी हुई l धर्माचरण करने वाले द्विज(Bide) लोग विश्वभुक अग्नि में ही सम्पूर्ण कर्मों का अनुष्ठान करते हैं l जो अत्यन्त भयंकर वडवानलरूप से समुद्र का पानी सोखते रहते हैं l वे ही शरीर के अंदर ऊर्ध्वगति-‘उदान’ नाम से विख्यात हैं l ऊपर की ओर गतिशील होने से ही उनका नाम ‘ऊर्ध्वभाक’ है l
वह प्राणवायु के आश्रित एवं त्रिकालदर्शी हैं l उन्हें बृहस्पति का 5 पुत्र माना गया है l प्रति गृह्यकर्म में जिस अग्नि के लिये हमेशा घी की ऐसी धारा दी जाती है l जिसका प्रवाह उत्तराभिमुख हो और इस प्रकार दी हुई वह घृत की आहुति अभीष्ट(Desirous) मनोरथ की सिद्धि करती है l इसीलिये उस उत्कृष्ट अग्नि का नाम ‘स्विष्टकृत’ है
जिस समय अग्निस्वरूप बृहस्पति का क्रोध प्रशान्त प्राणियों पर प्रकट हुआ l उस समय उनके शरीर से जो पसीना निकला, वही उनकी पुत्री के रूप में परिणत हो गया l वह पुत्री अधिक क्रोध वाली थी l वह ‘स्वाहा’ नाम(name) से प्रसिद्ध हुई l
वह दारुण एवं क्रूर कन्या सम्पूर्ण भूतों में निवास करती है l स्वर्ग(heaven) में भी कहीं तुलना न होने के कारण जिसके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं है l उस स्वाहा पुत्र को देवताओं ने ‘काम’ नामक अग्नि(fire) कहा है l
आखिर कैसे हुई अग्नि की उत्पत्ति | Aag Ki Utpatti or Rahasya




