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पहला स्वतंत्रता संग्राम - पाइका विद्रोह | Paika Vidhroh

By N.j / About :-8 years ago

पहला स्वतंत्रता संग्राम पाइका विद्रोह | Paika Vidhroh Detalied Story 

1857 का स्वाधीनता संग्राम जिसे सामान्य तौर पर भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, उसे पाठ्यपुस्तकों में बदलने की तैयारी की जा रही है. अब 1857 की क्रांति से पहले हुआ 1817 का पाइका विद्रोह पहला संग्राम माना जाएगा. केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा है कि 1817 के पाइका विद्रोह को अगले सत्र से इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' के रुप में स्थान मिलेगा. आइए जानते हैं क्या है पाइका बिद्रोह.

1817 में ओडिशा में हुए पाइका बिद्रोह ने पूर्वी भारत में कुछ समय के लिए ब्रिटिश राज की जड़े हिला दी थीं. मूल रूप से पाइका ओडिशा के उन गजपति शाषकों के किसानों का असंगठित सैन्य दल था, जो युद्ध के समय राजा को सैन्य सेवाएं मुहैया कराते थे और शांतिकाल में खेती करते थे. इन लोगों ने 1817 में बक्शी जगबंधु बिद्याधर के नेतृत्व में ब्रिटिश राज के विरुद्ध बगावत का झंडा उठा लिया.

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उस दौरान ओडिशा के राजा गजपति मुकुंददेव द्वितीय अवयस्क थे और उनके संरक्षक जय राजगुरु को अंग्रेजों ने पकड़ कर बर्बरतापूर्ण काट दिया गया. कुछ वर्षो के बाद सैन्य दल के मुखिया बक्शी जगबंधु के नेतृत्व में पाइका विद्रोहियों ने आदिवासियों और समाज के अन्य वर्गों के सहयोग से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध बगावत कर दी. ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह में पाइका लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. ‘पाइका’ मूलतः(Basically) भुवनेश्वर के पास खुर्दा के किसानों का असंगठित सैन्य दल था, जो युद्ध के समय राजा को सैन्य सेवाएं प्रदान किया करते थे. जबकि बाकी समय में खेती किया करते थे. राजा इनके सैन्य योगदान के लिए लगान रहित भूमि और ‘कर’ में छूट भी देते थे.

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यह शांतिकाल(Serenity) में अपने क्षेत्र की रक्षा भी किया करते थे. इसी वजह से इन्हें विशेष सम्मान प्राप्त था. पाइका लोगों को उनकी सेवाओं की वजह से राज्य में विशेष(special) सम्मान प्राप्त था. ऐसे में जब साल 1803 में अंग्रेजों ने उनके जमीन पर लगान वसूलने का फैसला किया तो पाइका समुदाय ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया. साल 1817 में आरंभ हुई यह चिंगारी आग बन कर बड़ी तेजी से फैली क्योंकि उनके लिए खुर्दा के शासक परंपरागत रूप से जगन्नाथ मंदिर के संरक्षक और धरती पर उनके प्रतिनिधि(Representative) के तौर पर राज किया करते थे.

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राजा को ओडिशा (खुर्दा) के लोग राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानते थे. राज्य के संरक्षक(Guardian), जय राजगुरु की निर्मम तरीके से हत्या करने से लोगों में भारी रोष था. इतनी वजह(Reason) काफी थी जिसने उन्हें ब्रिटिश राज को ख़त्म करने के लिए प्रेरित किया. चूंकि खुर्दा के राजा मुकुंददेव द्वितीय व्यस्क नहीं थे, इसलिए खुर्दा के शासन की बागडोर राज्य के सेनाध्यक्ष बक्शी जगबंधु और संरक्षक जय राजगुरु के हाथों में थी. ऐसे में अंग्रेजों(British) के द्वारा जय राजगुरु की हत्या करने के बाद जगबंधु ने पाइका लोगों को इकट्ठा(Gathered) करके ब्रिटिश राज के विरूद्ध विद्रोह कर दिया.

 

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मार्च 1817 के आरम्भ में घुमुसर के खोंड और खुर्दा के पाइका ने एक साथ मिलकर बानापुर पर हमला किया, जहां इन विद्रोहियों ने ब्रिटिश राज को दर्शाने वाली या उनके प्रतीकों को नष्ट करना शुरू कर दिया. विद्रोहियों ने अंग्रेजों के Police स्टेशन, कोषागारों और सरकारी इमारतों को अपना निशाना बनाया और उन्हें लूटने के बाद ध्वस्त करने लगे. पाइका विद्रोहियों( rebels) को कनिका, कुजंग, नयागढ़ और घुमसुर के राजाओं, जमींदारों, ग्राम(Village) प्रधानों और आम किसानों का पूरा समर्थन प्राप्त था. यह विद्रोह बहुत तेजी से प्रांत के अन्य इलाकों(Territories) जैसे पुर्ल, पीपली और कटक में भी फैल गया.

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अंग्रेजों को शुरुआती हमले(attack) का नुकसान अपना एक कमांडर लेफ्टिनेंट को खो कर उठाना पड़ा. 12 अप्रैल, 1817 को विद्रोही सेना ‘पुरी’ पहुंची, जहां उन्होंने भारी मात्रा में सरकारी सैनिकों और सरकारी अफसरों को भी नुकसान पहुंचाया. अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबाने के लिए कठोर(Rigid) कदम उठाए ताकि वो युद्ध में हारी जगहों को वापस पा सकें और फिर से शांति व्यवस्था बहाल कर सकें. इस दौरान दमन का व्यापक(Comprehensive) दौर चला, जिसमें कई लोगों को जेल में डाला गया और भारी संख्या में अपनी जान गंवाई. यह दौर अंग्रेजों के प्रताड़नाओं और अत्याचारों(Torture) का था, जिसे बड़ी संख्या में ओडिशा के लोगो ने झेला.


हालांकि शुरुआत में विद्रोही(Revolt) सेना ने कई लड़ाईयां जीती, लेकिन अंग्रेज़ इस उठती चिंगारी को बुझाने में सफल रहे. अक्टूबर 1817 में अंग्रेजों के खिलाफ चलने वाला यह विद्रोही युद्ध समाप्त हो गया. लेकिन इसके कई नेता भागने में सफल रहे. अनेकों विद्रोहियों ने साल 1819 तक अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा, लेकिन अंततः अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ा और मौत के घाट उतार दिया. बक्शी जगबंधु को भी साल 1825 में गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में रहते हुए साल 1829 में उनकी मौत हो गई.

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पाइका और घोंड समुदाय(Community) का अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ(Against) आवाज़ उठाना, ब्रिटिश राज के लिए भारी चुनौती था. साल 1817 का विद्रोह भारत के लोगों के स्वाभिमान की रक्षा का विद्रोह था, जिसकी भनक अंग्रेजों को पहले से थी. इसीलिए जल्द ही उन्होंने इस क्रांति(Revolution) को दबा दिया, ताकि समूचे भारत पर अपना मनमाना राज कर सकें. हालांकि अब तक इस लड़ाई को India के इतिहास(History) में पहली क्रांति के रूप में मान्यता नहीं मिली थी. लेकिन अब इसे आधिकारिक(Official) रूप से भारत सरकार(Government) ने मान्यता दे दी है.

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