पुष्यमित्र शुंग की जीवनी | Pushyamitra Shunga Biography In Hindi

पुष्यमित्र शुंग की जीवनी | Pushyamitra Shunga Biography In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-4 months ago
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शुंग वंश के स्थापक पुष्य मित्र शुंग का जीवन परिचय | All About Pushyamitra Shunga Biography in Hindi

  • पुष्य मित्र शुंग (शुंग वंश का संस्थापक)
  • जन्म- 185 ईसा पूर्व
  • मृत्यु - 149 ईसा पूर्व पटना
  • उत्तराधिकारी -  अगणिमित्रा

पुष्य मित्र शुंग मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक का सेनापति था जिसने मौर्य वंश का ही अंत करके लगभग 185 ई0 पूर्व शुंग वंश की शुरुआत की थी । जन्म से ब्राह्मण पुष्य मित्र शुंग ने मौर्य वंश के अंतिम राज़ा बृहद्रथ की हत्या कर स्वयं को राजा घोषित कर दिया था। पुष्य मित्र शुंग का राज्य 36 वर्षो तक चला। अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करने वाले इस सम्राट ने उत्तर भारत का अधिकतर हिस्सा अपने साम्राज्य में मिला लिया था। पंजाब के जालंधर में शुंग राज्य का शिलालेख मिलता है जिसके अनुसार पुष्य मित्र शुंग का साम्राज्य सांग्ला (वर्तमान सियालकोट) तक फैला था। इस बात की पुष्टि बौद्ध लेख “दिव्यावदान” भी करता है।

जीवन और शासन | Pushyamitra Shunga Biography In Hindi

Pushyamitra Shunga Biography

प्रारम्भ में पुष्य मित्र शुंग मौर्य वंश के अंतिम राजा बृहद्रथ का सेनापति था। एक दिन उसने सेना प्रदर्शन का आयोजन किया। यह प्रदर्शन सम्राट बृहद्रथ के सम्मुख किया जाना था। किन्तु ऐसा माना जाता है कि उस प्रदर्शन के दौरान पुष्य मित्र शुंग ने सम्राट बृहद्रथ की सेना के सम्मुख ही पीठ में चाकू घोपकर हत्या कर दी थी। इसके पश्चात वह विशाल मगध साम्राज्य का शासक बन बैठा। इस प्रकार शुंग वंश कि स्थापना हुई। पुष्य मित्र शुंग के गोत्र के बारे में कुछ मतभेद है, पतंजलि के अनुसार पुष्य मित्र शुंग का गोत्र भारद्वाज था, किन्तु कालीदास कि रचना ‘माल्ल्विकाग्निमित्रम’के अनुसार इसका गोत्र कश्यप था।  महाभारत के हरिवंश पर्व के वर्णन के अनुसार भी पुष्य मित्र शुंग का गोत्र कश्यप था। किन्तु जे0 सी0 घोष के अनुसार पुष्य मित्र शुंग द्वयमोश्यायन ब्राह्मण थे । यह गोत्र ब्राह्मणो कि एक द्वैत गोत्र मानी जाती है जो दो अलग-अलग गोत्रों के मिश्रण से बनी ब्राह्मण गोत्र होती है। कुछ विवरणो के अनुसार पुष्य मित्र शुंग ने वैदिक धर्म के पुनरुत्थान का कार्य किया । किन्तु उस पर धार्मिक क्रूरता का भी आरोप लगाया गया है। कुछ सूत्रों के अनुसार पुष्य मित्र शुंग ने बौद्ध धर्म के अनुयायियों का विनाश किया और बौद्ध धर्म को मानने वालों का व्यापक रूप से धर्म परिवर्तन कराया। हर्ष चरित मे बृहद्रथ को प्रतिज्ञ दुर्बल कहकर संबोधित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि राज्य अभिषेक के समय बृहद्रथ  वैदिक परंपरा के अनुसार होने वाली प्रतिज्ञाओं का पालन नहीं कर सका । जिसके कारण बृहद्रथ कि सेना उसके पक्ष में नहीं थी।

पुष्य मित्र शुंग का शासनकाल चुनौतियों से भरा हुआ था। विदेशी आक्रमणकारियों के साथ-साथ राज्य के अंदर होने वाले विद्रोहों का भी उसे सामना करना पड़ा।  मगध साम्राज्य से जो राज्य अधीनता त्याग चुके थे, पुष्य मित्र शुंग ने उन्हें अपने अधीन दोबारा लाने में सफलता प्राप्त की । पुष्य मित्र शुंग ने मगध साम्राज्य की सीमा को बढ़ाने का कार्य किया । मौर्य वंश कि निर्बलता से मौका पाकर यवनों ने कई आक्रमण किए थे। कालीदास की रचना माल्लिकाग्निमित्रम  के अनुसार पुष्य मित्र शुंग के कई युद्ध यवनों के साथ  हुए थे। “वसुमित्र” जो कि पुष्य मित्र शुंग का पोता था , ने यवनों को सिंधु नदी के तट पर परास्त किया था। इस प्रकार यवनों की पराजय ने मगध साम्राज्य के वर्चस्व को काफी हद तक बढ़ा दिया था।

 यज्ञों और बलियो के फिर से करवाया प्रारम्भ

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अयोध्या में प्राप्त शिलालेख के अनुसार पुष्य मित्र शुंग को दो बार अश्वमेध यज्ञ करने वाला बताया गया है। मगध के मौर्य शासकों  ने अहिंसा को अपना धर्म समझा था। जिसके कारण इन्होने यज्ञों और बली का बहिष्कार कर दिया था। पुष्य मित्र शुंग ने सम्राट बनने के बाद इन यज्ञों और बलियो के फिर से प्रारम्भ करवाया, कुछ स्त्रोतों  के अनुसार पुष्य मित्र शुंग के यज्ञों के पुरोहित पतंजली मुनि थे । इसीलिए उन्होने महाभाष्य में लिखा है –“ईह पुष्यमित्रम याज्यामः” अर्थात हम यहा पुष्य मित्र का यज्ञ करा रहे हैं । अश्वमेध के दौरान छोड़े जाने वाले घोड़े को सिंधु नदी के किनारे यवनों ने पकड़ा था। पुष्य मित्र शुंग के पोते वसुमित्र ने यवनों को परास्त कर वह घोडा छुड़वाया था। बौद्ध रचना दिव्यवदान के अनुसार पुष्य मित्र ने कई बौद्ध स्तूपों के विध्वंस कराया था। उसने कई बौद्ध भिक्षुओं कि हत्या भी कराई थी।

शुंग साम्राज्य की सीमा पश्चिम मे सिंधु नदी तक तथा दक्षिण मे नर्मदा नदी तक फैली थी। हिमालय से प्राच्य समुद्र तक फैले साम्राज्य को पुष्य मित्र ने मजबूत बनाया था।पुराणों के अनुसार पुष्य मित्र का शासन 36 वर्षों तक चला।  शुंग वंश में 9 शासक  हुए है जो इस प्रकार हैं- अग्निमित्र, वसूज्येष्ठ, वसूमित्र,अंध्रक, तीन अज्ञात शासक, भगवत ,तथा देवभूति। पुष्य मित्र शुंग की  राजधानी पाटलीपुत्र थी । शुंग साम्राज्य के समय भी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों मे राजकुमारों को वहाँ के राज्यपाल के रूप में नियुक्तकरने कि परंपरा चलती रही। उदाहरण के तौर पर पुष्य मित्र शुंग का पुत्र अग्निमित्र विदिशा का राज्यपाल था, तथा कौशल का राज्यपाल धनदेव था। इसके अतिरिक्त उनकी सेना का संचालन भी राजकुमारों के हाथ में ही होता था। शासन प्रबंध की यदि चर्चा करें तो ,शुंग वंश का शासन भी मौर्यो के समान केंद्रीयकृत था। जहा शासन कि सबसे छोटी इकाई ग्राम हुआ करती थी। किन्तु इस काल तक शासन के केंद्रीय नियंत्रण मे शिथिलता आ गयी। शुंग वंश के दौरान ही राज्य के विभिन्न भागों में सामंतवादी प्रवृत्ति का उदय होने लगा था। शासन अब अपने दूरदराज़ के क्षेत्रों को पूर्ण रूप से नियंत्रित करने में असक्षम होने लगा था। यही कारण था कि आने वाले समय में भारत कि शासन व्यवस्था मे सामंतवादी प्रवृत्ति हावी होने लगी। कुछ बौद्ध साहित्यों के अनुसार ग्रीक शासक  मिनिंदर जिसे मिलिंद भी कहा गया है, और शुंग सम्राट के बीच युद्ध हुआ था।

शासन काल के दौरान बौद्ध धर्म को नाकारा सन्यासियों और ब्राह्मणो को दिया अनुदान | Pushyamitra Shunga Biography In Hindi

पुष्य मित्र शुंग ने अपने शासन काल के दौरान होने वाले बौद्ध धर्म के व्यय को काफी कम कर दिया था। उसके द्वारा बौद्ध सन्यासियों को दिया जाने वाले उपहार भी खत्म कर दिये गए । हिन्दू धर्म से नाता रखने वाले सन्यासियों और ब्राह्मणो को काफी अनुदान दिया गया। इस प्रकार हम देखते है की भारतीय इतिहास मे एक महान मौर्य साम्राज्य के बाद पुष्य मित्र शुंग ने भारत के प्रथम ब्राह्मण राज्य की नीव रखी थी । यह शासन काल कुछ शताब्दियों तक चला जिसमें वैदिक धर्म की परम्पराओं को फिर से फलने फूलने का मौका मिला । किन्तु बौद्ध भिक्षुओं के ऊपर किए गए अत्याचार से प्राप्त हुई आलोचना से पुष्य मित्र शुंग बच नहीं सकते। पुष्य मित्र शुंग का शासन  काल इस विरोधाभास से हमेशा जुड़ा रहेगा।

शुंग वंश के शासक

  • पुष्यमित्र शुंग (185 - 149 ई.पू.)
  • अग्निमित्र (149 - 141 ई.पू.)
  • वसुज्येष्ठ (141 - 131 ई.पू.)
  • वसुमित्र (131 - 124 ई.पू.)
  • अन्ध्रक (124 - 122 ई.पू.)
  • पुलिन्दक (122 - 119 ई.पू.)
  • घोष शुङ्ग
  • वज्रमित्र
  • भगभद्र
  • देवभूति (83 - 73 ई.पू.)

पुष्यमित्र शुंग की जीवनी | Pushyamitra Shunga Biography In Hindi