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संत रविदास जीवन परिचय | Saint Ravidas Biography In Hindi

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महान विचारक संत रविदास जीवन संघर्ष | All About Saint Ravidas Biography In Hindi
- संत रविदास का जन्म-1377 ईसवीसे 1398 के बीच माना जाता है
- जन्म स्थान- वाराणसी शहर के गोबर्धनपुर गांव
- पिता का नाम- संतो़ख दास (रग्घु)
- माता का नाम - कालसा देवी
- कार्यक्षेत्र - निर्गुणसंत और समाज सुधारक, कविताओ के माध्यम से सामाजिक सीख
- मृत्यु - 1540 ईसवी (वाराणसी)
संत रविदास मध्यकालीन भारत के महान कवि संतों में गिने जाते हैं । रविदास ने निर्गुण पंथ को अपनाकर ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त किया था । संत रविदास, कबीरदास की तरह ही, समाज में व्याप्त असहिष्णुता, धार्मिक अंधविश्वास, आडंबरों तथा जातिगत ऊँच नीच के प्रबल विरोधी थे। रविदास ने अपने जीवन के माध्यम से समाज को मानवतावाद और सभी धर्मों की समानता का उपदेश दिया था । 15 वीं शताब्दी के महान विचारकों में रविदास का नाम आता है । कबीर और रविदास दोनों ही गुरूभाई थे । इन दोनों सेंतो के गुरु स्वामी रामानन्द थे। उत्तर भारत की संत परंपरा को प्रभावित करने और उसे समाज के कल्याण के लिए सहजता पूर्वक अपना कर, रविदास ने मानवजाति का बड़ा कल्याण किया है। आध्यात्मिक रूप से समर्थ रविदास ने अपने समकालीन सभी प्रमुख संतों और विचारकों को प्रभावित किया है । संत रविदास का प्रभाव आज पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी देखने को मिलता है।
प्रारम्भिक जीवन
संत रविदास का जन्म 1377 के आस पास सीर गोवर्धन, काशी में , जो की वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य में आता है, हुआ था । इनके पिता श्री संतोष दस जी तथा माता श्रीमति कालसा देवी जी थीं। संत रविदास का विवाह श्रीमती लोनाजी के साथ हुआ था जिससे इन्हे एक पुत्र, विजय दास जी, की प्राप्ति हुई थी । संतों के साथ मेल जोल के कारण संत रविदास के अंदर भी ईश्वर भक्ति का संचार हुआ था । रविदास के परिवार का पैत्रक व्यवसाय जूते बनाने का था जिसे इन्होने भी अपना लिया था । इस कार्य को भी रविदास पूरी लगन और परिश्रम से किया करते थे । रविदास का व्यवहार बहुत ही मधुर और सरल था जिसके कारण लोग उनकी ओर खींचे चले आते थे । परोपकार और दयालुता तो उनके स्वभाव में ही थे । रैदास मूर्तिपूजा और धार्मिक आडंबरों में बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे । उनका मत था की यदि पवित्र और सच्चे हृदय से ईश्वर को पुकारा जाये तो ईश्वर अवश्य ही मिलते है। उनके विचारों में राम, रहीम, कृष्ण, अल्लाह, शिव और विष्णु एक ही ईश्वर के अलग अलग नाम हैं एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार एक बार उनके पड़ोस के लोग गंगा स्नान के लिए जा रहे थे किन्तु अपने जूते बनाने के कार्य में व्यस्तता के कारण रविदास गंगा स्नान के लिए जा न सके। अधिक आग्रह करने पर उन्होने कहा की यदि मन पवित्र हो तो किसी भी स्तान पर गंगा स्नान का पुण्य मिल सकता है। तभी से ये कहावत प्रचलित हो गयी की “मन चंगा तो कठौती में गंगा”। बचपन में रविदास ने पंडित शरदा नन्द की पाठशाला में अध्ययन के लिए दाखिला लिया था। विवाह के पश्चात भी रविदास का मन ईश्वर भक्ति पर ही लगा रहता था जिसके कारण वे अपने पारिवारिक व्ययसाय के लिए समय नहीं दे पाते थे । उनके इस प्रकार से अपनी जिम्मेदारियों की अवहेलना करने के कारण रविदास के पिता ने उन्हे अपने से और अपनी संपत्ति से अलग कर दिया था । रविदास ने भगवान राम के नामों का प्रतिकात्मक रूप से उपयोग किया और उनकी भक्ति को अपनी रचनाओं में शामिल किया ।
संत रविदास और मीराबाई
संत रविदास को प्रसिद्ध कृष्ण प्रेमी संत मीराबाई का आध्यात्मिक गुरु मान जाता है । मीराबाई पर अपने गुरु रविदास का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था जिसका उल्लेख मीराबाई ने अपने गीतों और भजनों में किया है । जाती पांति के बंधनो को तोड़ने और धार्मिक आडंबरों को त्यागने के कारण संत रविदास को समाज का एक वर्ग पसंद नहीं करता था । किन्तु रविदास पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ता था की लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं । उनका मानना था की ईश्वर ने सभी को एक समान बनाया है और इसलिए सभी मनुष्य बराबर हैं। मीराबाई के भजनो और गीतों में भी इस प्रगतिशील विचारों का समावेश हुआ है। अपने गुरु रविदास की तरह ही मीराबाई ने भी ईश्वर की प्राप्ति के लिए पवित्र हृदय और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास को आवश्यक माना है उन्होने अपने गुरु के विषय
“गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी,चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी”।
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रविदास की रचनाएँ
अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ विनम्रता से व्यवहार करने और अपने जीवन में ईश्वर प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने का उपदेश ही संत रविदास की रचनाओ में मिलता है। रविदास ने अपनी एक रचना में लिखा है-
"कह रैदास तेरी भगति दूरि है ,भाग बड़े सो पावे। तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपीलक हवै चुनि खावे "
रविदास का मानना था की ईश्वर भक्ति बड़े पुण्य से मिलती है। इसलिए अपने जीवन के समय को ईश्वर भक्ति में ही लगाना चाहिए । जातिवाद के विषय में, उनके ही शब्दों में -
" जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।। "
ऐसा माना जाता है की एक बार उन्होने अपने एक ब्राह्मण मित्र की रक्षा एक शेर से की थी , जिसके बाद वो दोनों गहरे दोस्त बन गए थे । लेकिन उनकी इस दोस्ती से दूसरे ब्राह्मण जलते थे और इस बात की शिकायत वह के राजा तक की गयी थी । राजा ने रविदास के ब्राह्मण मित्र को भूखे शेर के आगे फेंक दिये जाने का हुक्म दिया , किन्तु उस शेर ने जब संत रविदास को अपने ब्राह्मण मित्रा की रक्षा के लिए खड़े देखा तो वह शेर वहाँ से चला गया । इस बात की ख्याति द्दोर दूर तक फ़ेल गयी और सामान्य जनता केसाथ साथ वह राजा भी संत रविदास का अनुयाई बन गाया ।
अपने जीवन से विनम्रता और शांति का उपदेश देने वाले श्रेष्ठ निर्गुण भक्त संत रविदास की मृत्यु 1540 में हुई । संत रविदास का जन्मोत्सव आज सारे विश्व में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है ,पंजाब राजस्थान ,हरियाणा,उत्तर प्रदेश ,महाराष्ट्र और दिल्ली मे रविदास की जयंती का पर्व एक बड़े पर्व के रूप में मनाया जाता है। रविदास के विचारो में सामाजिक बुराइयों के लिए और विभिन्न धर्मों की आडंबरों के लिए कोई स्थान नहीं था। कबीरदास ने रविदास के विषय मे अपने दोहों में काफी उल्लेख किया है। कबीरदास का मानना था की संत रविदास एक उच्च कोटी के निर्गुण संत थे। काशी के सीर गोवर्धन में स्थित इनके जन्म स्थान पर होने वाले उत्सव में काफी श्रद्धालु आते हैं । उत्तर प्रदेश की सरकार ने हाल ही में संत रविदास की जन्म स्थली को नए निर्माण करवाकर और भी विकसित करने का कार्य शुरू किया है।
संत रविदास जीवन परिचय | Saint Ravidas Biography In Hindi




