वो घटना जब शिवाजी को औरंगजेब ने कैद कर लिया था | Shivaji Imprisonment by Aurangzeb In Hindi

वो घटना जब शिवाजी को औरंगजेब ने कैद कर लिया था | Shivaji Imprisonment by Aurangzeb In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-4 years ago
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भारत के गौरवशाली इतिहास में हमने मराठा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन में उनके जीवन से जुड़े कई किस्से जाने। लेकिन आज हम शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ा किस्सा जो 12 मई 1666 में घटित हुआ। जब शिवाजी को मुगल राजा औरंगजेब ने कैद कर लिया था। लेकिन मराठा राजा ने चतुराई दिखाते हुए औरंगजेब के चंगुल से भाग निकले। शिवाजी के जीवन से जुड़ी इस घटना को आज भी इतिहास में आश्चर्यजनक माना जाता है। तो चलिए आज मराठा राजा छत्रपति शिवाजी के जीवन की इस आश्चर्यजनक घटना के बारे में विस्तार से जानते है।

इस तरह घटित हुई यह घटना

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समय था साल 1665 का तब मराठा राजा छत्रपति शिवाजी को इस बात का अनुभव हुआ की यदि वो इस समय मुगल साम्राज्य को युद्ध की चुनौती देगें तो यह गलती होगी। इससे केवल उनके साम्राज्य को ही नुकसान होना है। तब शिवाजी महाराज ने मुगलों की अधिनता स्वीकार करने के बजाय उन्होंने मुगलो के साथ एक संधि करने पर विचार बनाया।

तब 11 जून 1965 को मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी व मुगल साम्राज्य के राजपूत सेनापति जय सिंह प्रथम के बीच पुरन्दर की संधि हुई। इस संधि से पहले ने मुगल सेनापति जयसिंह ने सेना के साथ पुरन्दर के किले को घेर लिया था। तब मजबूरी में शिवाजी को इस संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े।

मुगलो के साथ पुरन्दर की संधि होने के बाद मुगल राजा औरगजेब ने शिवाजी को उनके जन्मदिन पर आगरा आने के लिए निमंत्रण दिया। तब शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के जन्मदिवस पर आगरा जाने पर दिलचस्पी नही ली। लेकिन राजपूत राजा जयसिंह ने शिवाजी को समझाया व उनकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी ली तब शिवाजी महाराज ने आगरा जाने की सहमति पर हां की।

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औरंगजेब के जन्म दिवस पर आमंत्रण व राजा जयसिंह के सुरक्षा के वादे के साथ 11 मई 1666 छत्रपति शिवाजी अपने पु़त्र संभाजी व सेना के कुछ खास लोगो के साथ आगरा के लिए निकल पड़े। मुगल राजा के जन्मदिन का जश्न 12 मई का आयोजन था। शिवाजी महाराज 12 मई को आगरा औरंगजैब के किले पर पहुंचे। तब शिवाजी के स्वागत के लिए मुगल सेना के 2 सैनिको ने शिवाजी महाराज का स्वागत किया। शिवाजी महाराज को इस हरकत पर हैरानी हुई। आगरा महल में शिवाजी के प्रवेश की खबर राजा जयसिंह के पुत्र कुंवरसिंह ने औरंगजेब को इस बात की जानकारी दी।

एक बेहद ही सामान्य स्वागत के बाद शिवाजी महाराज औरंगजेब के दरबार में पहुंचे। तब औरंगजेब ने शिवाजी महाराज की तरफ न देखा न ही उनके हाल-चाल पूछें। इसके बाद शिवाजी महाराज को दरबार में मौजूद 5 हजार से ज्यादा दरबारियों के बीच खड़ा कर दिया व भरे दरबार में उनका अपमान किया गया।

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आगरा दरबार में प्रवेश के साथ दरबार में दरबारियों के सामने बार-बार अपमान होने के कारण शिवाजी महाराज की सहन शक्ति का बांध टूट गया। शिवाजी महाराज ने कहा की उन्हें यहां निमंत्रण देकर उनके साथ छल किया जा रहा है। इस पर कुंवर रामसिंह खड़े हो कर शिवाजी महाराज को समझाने की कोशिश करने लगे। शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के भरे दरबार में कहा - मुझे मौत का डर नही है। यह बात कहकर शिवाजी महाराज पुत्र संभाजी के साथ आगरा के दरबार से निकल पड़े। कुंवर सिंह भी औरंगजेब के आदेश पर शिवाजी के साथ निकल पड़े। बता दे की दोस्तो औरंगजेब व शिवाजी की यह आखिरी मुलाकात थी।

औरंगजेब के दरबार में अपमान होने के कारण शिवाजी महाराज 2 दिन तक औरंगजेब के दरबार में नही गए। तब दरबार में अधिकर दरबारियों ने शिवाजी महाराज को मौत की सजा देने के बारे कहां। लेकिन दरबार में हुई इस बात की खबर कुंवर रामसिंह को पता लगी तब कुंवर रामसिंह ने औरंगजेब को दरबार में जाकर कहा की वो ऐसा नही कर सकते शिवाजी महाराज ने आगरा में प्रवेश उनके पिता के भरोसे पर किया है। भले ही आप मुझे मौत की सजा दे सकते है। तब औरंगजेब ने दरबार में बेगम जहांआरा से कहा की इस बात का पता करो की राजा जयसिंह ने शिवाजी को आगरा प्रवेश से पहले कौन-कौन से वादे किए थे ? 
आगरा दरबार में औरंगजेब द्वारा अपमान के बाद शिवाजी महाराज ने कुछ भी खाने से भी इंनकार कर दिया। तब औरंगजेब के इशारो पर शिवाजी को राजा विट्टलदास की हवेली कैद कर दिया व उन पर कड़ा पहरा लगा दिया। किसी को भी उनकी अनुमती के बिना अंदर जाने अनुमती नही थी। तब शिवाजी महाराज को शक हो गया था की वो अब औरंगजेब की चगुल में फंस चुके है।

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तब इस स्थिति को भांपने के बाद शिवाजी महाराज ने 12 मई को एक संदेश भेजा उन्होंने औरंगेजब को लिखा की वो अपने किले की एक बड़ी धन राशी देने को तैयार, लेकिन इसके लिए एक शर्त उन्हें कैद से मुक्त करना होगा। लेकिन औरंगजेब ने इस बात पर कोई ध्यान नही दिया। शिवाजी महाराज ने 4 दिन बाद एक बार फिर चिट्टी लिखी जिसमें लिखा कि वो अब अपना आगे का जीवन एक फकीर बनकर बनारस में जीना चाहते है, लेकिन औरंगजेब इस बार भी शिवाजी की चाल में नही फंसा।

लगातार कोशिशों के बावजूद शिवाजी की कोई चाल औरंगजेब पर चल नही पा रही थी। कैद में रहते हुए शिवाजी महाराज की तबीयत भी बिगड़ने लगी थी। लेकिन शिवाजी महाराज ने हार नही मानी और लगातार औरंगजेब की कैद से भागने की योजनाएं तैयार करने लगे। एक दिन शिवाजी ने देखा की मुगल सैनिक बड़ी-बड़ी टोकरीयों में गरीब ब्राह्मण के लिए भोजन ले जा रहें है। तब शिवाजी ने इस बात की इच्छा जताई कि वो भी गरीब लोगो को खाना खिलाना चाहते है। तब शिवाजी महाराज ने मौका पाकर अपने हमशक्ल चचेरे भाई हिरोजी को अपनी जगह सुलाकर अपने पुत्र के साथ उन टोकरीयों में बैठ कर महल से बाहर निकल गए।

शिवाजी की योजना के अनुसार महल के बाहर उनकी सेना के विश्वासी सैनिक उनका वहां पहले से इंतजार कर रहे थें। संभाजी को वहां छोड़ने के बाद शिवाजी महाराज ने साधु का भेष बना कर रायगढ़ की और निकल पड़े।

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