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क्रांतिकारी सुखदेव की जीवनी | Rebel Sukhdev Biography in Hindi

क्रांतिकारी सुखदेव की जीवनी | Rebel Sukhdev Biography in Hindi

In : Viral Stories By storytimes About :-11 months ago
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भारत माता के क्रांतिकारी पुत्र सुखदेव की स्वर्णिम जीवनी | All about Rebel Sukhdev Biography in Hindi

क्रांतिकारी सुखदेव एक ऐसा नाम जो भारत के आजादी के लिए स्वयं में ही एक क्रांति बन गए| ब्रिटिश साम्राज्य के शासन से पीड़ित भारतीय जनमानस के बीच से निकले क्रांतिकारी विचारधारा के इस समर्थक ने आजादी के लिए अंग्रेजों से आर-पार की लड़ाई लड़ने वाली विचारधारा का समर्थन किया और आजादी दिलाने वाली मुहीम का हिस्सा बने|

भारत माता के इस सपूत का पूरा नाम सुखदेव थापर था जिसका जन्म पंजाब प्रान्त के लायलपुर शहर में श्रीयुत रामलाल थापर और श्रीमती रल्ला देवी के घर विक्रमी सम्वत १९६४ के फाल्गुन मॉस में शुक्ल पक्ष सप्तमी तदनुसार 15 मई 1907 को अपराह्न पौने 11 बजे हुआ था| जन्म से 3 महीने पूर्व ही पिता का स्वर्गवास होने के कारण इनके ताऊ अचिन्तराम के सहयोग से इनकी माता श्रीमती रल्ला देवी ने इनका पालन पोषण किया था|

Sukhdev Biography

भारतीय इतिहास सदैव माँ भारती के इस महान सपूत का ऋणी रहेगा जिसने अपने प्राणो की आहुति देकर इस राष्ट्र को इसके जनमानस को अंग्रेजों के खून के आंसू रुला देने वाले जुल्मों से मुक्ति दिलायी| "रंग दे बसंती चोला" का गान करते-करते माँ भारती के इस सपूत ने भारत के आने वाले भविष्य को नयी दिशा देने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया| भारत राष्ट्र के इतिहास को गौरवशाली इतिहास का दर्जा दिया जाना भी इन्ही के अटूट देशभक्ति का वर्णात्मक अध्यन प्रस्तुत करने के कारण मिला है|

ये सर्वविदित है की भारत अपने अतीत में भले ही पूरी दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता रखता था परन्तु मध्य काल आते-आते भारत को विदेशी आक्रांताओं के कभी न भूल पाने वाले आक्रमणों व उनके शासन का सामना करना पड़ा| लगभग 700 वर्षों तक मुस्लिमों का शासन झेलने के बाद अगले 250 वर्षों में जब अंग्रेजों का शासनकाल प्रारंभ हुआ तो भारतीय जनमानस पर उनके द्वारा ढाये गए जुल्मों ने भारतीयों की सहनशीलता की सारी दीवारे डहा दीं और भारत में जगह-जगह इस शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल बज उठा|

Sukhdev Biography

और 1857 की क्रांति से प्रस्फुटित हुए भारतीय परिवेश ने इसी विचारधारा को आजादी मिलने तक प्रेसित कर दिया और जिसके परिणामस्वरुप शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे देशभक्त भी अंग्रेजों के खिलाफ चलाये जा रहे आंदोलन का एक हिस्सा बन गए| सुखदेव थापर ने बचपन के दिनों से ही अंग्रेजों के क्रूर अत्याचारों को देखा था, जो शाही ब्रिटिश सरकार ने भारत पर किये थे जिसने उन्हें क्रांतिकारियों से मिलने के लिए बाध्य कर दिया और जिसके चलते सुखदेव थापर ने भारत को ब्रिटिश शासन के बंधनो से मुक्त करने का प्रण किया|

सुखदेव थापर भारत की आजादी की लड़ाई को नई दिशा देने वाले हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (हेच, एस. आर. ए) के सदस्य थे और तो और उन्होंने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर पंजाब और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों के क्रांतिकारी समूहों को भी गठित किया था| इसके अलावा अन्य साथियों की सहायता से उन्होंने नौजवान सभा की स्थापना की थी|

Sukhdev Biography

सुखदेव थापर ने हमेशा इस बात पर ही बल दिया की भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भारत के युवाओं की भूमिका प्रबल हो और भारत में जन्म ले रही सांप्रदायिक वैमनस्य की भावना ख़त्म हो| युवा राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सुखदेव ने कई क्रांतिकारी गतिविधियों में जैसे वर्ष 1929 में जेल की भूख हड़ताल में सक्रिय भूमिका निभाई थी इसके अलावा 18 दिसंबर 1928 के लाहौर षड़यंत्र में भी उनके शासित कार्यों को भी भारत राष्ट्र के जीवित अस्तित्व तक हमेशा याद किया जाता रहेगा|

भारत में जब "साइमन कमिशन' के इंडिया में आने का विरोध हो रहा था और "साइमन गो बैक" के नारे लगाए जा रहे थे तब उस विरोध को भंग करने के लिए ब्रिटिश शासन द्वारा कराये गए लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय की हुई मौत का बदला लेने के लिए सुखदेव ने भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के साथ मिलकर 1928 में पुलिस उप - अधीक्षक (जो लालजी के मौत का जिम्मेदार था) जे. पी. सान्डर्स की हत्या कर दीं और दिल्ली में 18 अप्रैल 1929 सेंट्रल असेंबली में बम विस्फोट करने के कारण इनको

Sukhdev Biography

इनके सहयोगियों के साथ ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में बंद रहने पर सुखदेव ने गांधीजी को अंग्रेजी में एक पत्र लिखा था जिसमे उन्होंने लिखा था - "लाहौर षडयंत्र के तीन कैदियों को मौत की सजा सुनाई गयी है उन्होंने आगे लिखा देश में उनको अपराधी ठहराने  से इतना बदलाव नहीं आएगा जितना उनके द्वारा फांसी दिए जाने पर आएगा"  इस चिट्ठी के लिखे जाने के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा आनन्-फानन में सजा की तारीख को बदलकर और अगले दिन सुबह को दिए जाने के समय को बदलकर एक दिन पहले शाम को ही 23 मार्च 1931 को फांसी दे दीं गयी| सुखदेव को राजगुरु और भगत सिंह के साथ फांसी दी गयी| माँ भारती के इन सपूतों ने: 

" लगेंगे हर बरस मेले शहीदों की चिताओं पर
वतन पर मरने वालों का यही निशान होगा"

की भवन को सार्थकता प्रदान करते हुए इस संसार से विदा ली और भारत राष्ट्र पर वो ऋण छोड़ गए जिसका देश हमेशा ऋणी रहेगा| कहते हैं की इनके अंतिम संस्कार की भी अनुमति ब्रिटिश सरकार ने नहीं दी थी इनके शवों को काटकर मिटटी का तेल डालकर जला दिया गया था, बाद में बाकी हिस्सों को सतलज में प्रवाहित किया गया| इनके फांसी दिवस को आज भारत शहीद दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनाता है|